मौन
बैठ ले कुछ देर,आओ, एक पथ के पथिक सेप्रिय, अंत और अनंत के,तम-गहन-जीवन घेर। मौन मधु हो जाएभाषा मुकता की आड़ में,मन सरलता की बाड़ मेंजल-बिन्दु-सा बह जाए । सरल, अति स्वछंदजीवन, प्रात के लघु पात सेउत्थान-पतनाघात सेरह जाए चुप, निर्द्वंद्व । सूर्यकांत त्रिपाठी
Sep 08 2009 02:46 PM



Shuffle








