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12 अप्रैल का दिन

आज का दिन खास हैंसबको प्यारा सा अहसास हैंआज के दिन खिली थी एक कलीएक गाँव के गौबर से पूते आँगन में।देखकर दुनिया यह हल्की सी मुस्कराई थीचारपाई पर लेटे-2 नन्हें पैरों से फिर साईकिल चलाईपग-पग चलती रही, धीरे-धीरे बढ़ती रही ।सहेलियों संग गिटों से खेलती
 
सुशील कुमार छौक्कर
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आह...... होली पर बेटी, मेरा बचपन लौटा लाई।

नैना की होली। हम अपना बचपन देख नहीं पाते बस अपने बड़े बुजुर्गो से सुन ही पाते हैं, या एक आध घटनाएं हमारी स्मृति में बची रह जाती है। अगर हमें अपना बचपन देखना है तो अपने बच्चों के बचपन के संग हो लेना चाहिए और उस छूटे हुए बचपन को फिर से जीने के लिए। कुछ ऐसा
 
सुशील कुमार छौक्कर
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बेटी की बातें

बिल्ली दौड़ चूहा आयासाथियों नैना बेटी ने मेरा नया नाम बिल्ली ही रख दिया है। जब भी मेरे साथ खेलती है बस बिल्ली ही पुकारती है। बिल्ली अब दूसरा गेम खेलते है। बिल्ली अब चीडिया उड़ी,भैंस उड़ी खेलते है। बिल्ली अब चूहा दोड़ बिल्ली आई खेलते है ..........। जैसे ही
 
सुशील कुमार छौक्कर
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दो बीघा का किसान

किसान मैं दो बीघा का किसानपालता तीन मवेशी, पाँच इंसानएक कच्चा मकान टूटा साजिसमें खड़ा एक पेड़ बुढ्ढा सारामजी हमारे रुठे हैखेत हमारे सूखे हैकुएँ सूखने लगेचूल्हे बुझने लगेचारा खत्मदाना खत्मपेट उधारी से भरता हैपंसारी रोज तगादा करता हैपत्नी यह देख रोती
 
सुशील कुमार छौक्कर
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रिश्तें नाते

रिश्तें रिश्तों के धागे उधड़ने लगे हैंना जाने कैसे रिश्तें बनने लगे हैं।खेले थे जिनकी गौद में कभीअब वही भारी होने लगे है।सोचा था बुढ़ापे में मिल जाऐगी दो रोटीअब तो रोटी के साथ ताने भी मिलने लगे हैं।कैसी अजब समय की घड़ी हैपैसे रिश्तों को सीँचने लगे है।कल
 
सुशील कुमार छौक्कर