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उ का है गोरी...

कभी-कभार ऐसा होता है कि मन नहीं लगता। अब नहीं लगता तो नहीं लगता। ऐसे में हम त दोइए काम करते हैं। एक कहीं घूमने भाग जाते नहि त इंटरनेट पर बैठिए। न कोनो चिक-चिक, झिक-झिक। कल अइसन ही हुआ। कुछेक दोस्तों के संग हंसी ठिठोली शुरू हो गई।अब, आप लोगन के त दिमाग
 
सुभाष चन्द्र
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नारी की टूटती वर्जनाएं

औरतों को लक्षित करके किसी मशहरोमारुफशायर ने कहा है कि- मैं कभी हारी गई, पत्थर बनी, गई बनवास भी, क्या मिला द्रोपदी, अहिल्या,जानकी बनकर मुझे। इस पंक्ति को आधुनिकता के चादर में लपेट कर आज की नारी तमाम वर्जनाओंको तोडऩा चाहती और उन्मुक्त आकाश में विचरण कर
 
सुभाष चन्द्र
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यहां आना मना है

देश के अंदर ही जब सुरक्षा बलों को आने-जाने में सोचना पड़ा, तो स्थिति की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। आजकल, ऐसे ही हालातों से गुजर रहा है छत्तीसगढ़। नक्सलियों को खोजने के लिए ऐसा लग रहा है कि सारी रणनीतियां फिर से बनानी होंगी। देश आजाद होने के
 
सुभाष चन्द्र
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किसान और विकास का गणित

जब विकास का पहिया घूमता है तो वह अपने संग कई अच्छाई और बुराई को लेकर साथ चलता है। अच्छाई का अर्थ यह कि विकास होनेवाला है और बुराई का तात्पर्य उस सच से है जो प्रथम दृष्टया दिखता नहीं है। जहां विकास होने हैं, वह के मूल निवासी को विस्थापितों की जिंदगी ज
 
सुभाष चन्द्र
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बादल की कविता

प्रकोप एक बवंडर आया और चला गया साथ ही छोड़ गया एक चेतावनी ऐ मानवों, अपनी अमानवीय हरकतों से बाज आओ जिससे त्रस्त है सारी पृथ्वी और सहन नहीं कर पा रहा सगस्त सृष्टिï भी अगर तुम मेरे नियमों का उल्लंघन करोगे तो मैं भी तेरे अस्तित्व को मिटा डालूंगा जहां कोई
 
सुभाष चन्द्र
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...तो समाप्त हो जाएगी पृथ्वी

वैश्विक गर्मी या ग्लोबल वार्मिंग।ÓÓ यह दो शब्द दशकों से मानवजाति के लिए चिंता का सबब बने हुए हैं। पृथ्वी का तापमान बढ रहा है और इससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है। क्या हम विनाश की तरफ बढ रहे हैं या फिर विनाश की शुरूआत हो चुकी है? क्या अभी भी हमारे
 
सुभाष चन्द्र
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शहरी विस्तार और खाद्यान्न संकट

देश की बहुसंख्य आबादी की निर्भरता और स्वतंत्राता आन्दोलन की प्रतिबद्धताओं के चलते आजद भारत की सरकारें आरंभ से ही कृषि और ग्रामीण विकास की बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाती रही हैं। यह भी कहा जाता रहा है कि कृषि भूमि का गैर कृषि उपयोग के लिए अधिग्रहण नहीं किया जा
 
सुभाष चन्द्र
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ठिठुरते ठाकरे

महाराष्ट्र की राजनीति में ढलान पर पहुंच चुके बाल ठाकरे की छटपटाहट अब सामने आने लगी है। किसी की सोच से भी परे होगा कि ठाकरे परिवार का कोई सदस्य शिवसेना छोड़कर धुर विरोधी कांग्रेस में शामिल हो सकता है। लेकिन ऐसा हो रहा है। बाल ठाकरे की बहू स्मिता ठाकरे
 
सुभाष चन्द्र
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नया दौर

बीनती हूँ तुमसे अपने सपने लेकर उन्हें आकाश में भरती हूँ उड़ान उन्मुक्त स्वतंत्र तुम्हारी ढेर साराी प्रेम हिदायतों के साथ जहाँ सितारों को हथेलियों में भरकर उनसे लिखती हूँ बादलों पर एक श्वेत कविता ''तुम मेरे संवदेना पुरूष होÓÓ टटोलती हूँ इन शब्दों को अ
 
सुभाष चन्द्र