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हवा में उड़ता जाए रे… ’अप’

यहाँ कुछ देर से लगा रहा हूँ. जैसा अब आपमें से बहुत लोग जानते हैं, यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. ***** एक फ़िल्म थी पुरानी. नाम था मि. इंडिया. शायद देखी हो तुमने भी. मुझे बहुत पसंद है वो फ़िल्म. उसके कई मज़ेदार किस्सों में से एक मज़ेदार किस्सा
 
मिहिर
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दीया मिर्जा फिर हुई नाकाम?

इसमें कोई शक नहीं कि बाॅलीवुड की कुछ बहुत खूबसूरत एक्टेªसों में दीया मिर्जा का नाम शुमार किया जाता है और अपनी इसी खूबसूरती केContinue Reading »
 
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सिनेमा पर कार्यशाला

जामिया एमसीअसारसी के कुछ पूर्वछात्र फिल्मों से जुड़ी हुई एक कार्यशाला आयोजित कर रहे हैं। सिनेमा तकनीक में यदि आपकी रुचि हो और और आप कम समय में इसके मूलभूत सिद्धान्तों को समझना चाहते हों तो यह आपके लिये एक अच्छा मौका है। सिनेमाथैक नाम से शुरु हो रही इस
 
उमेश पंत
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सलमान का ट्वीटर पता

सलमान खान की ट्वीटर पर जुड़ने की खबर तो आई लेकिन उनका ट्विट्टर पता कम ही ज्ञात होने कारण नकली tweetars की मौज हो गयी, मैं भी जब वहां पर असली सलमान खान को खोजने गया तो वहां पर सेंकडों सलमान खान मिले. दिमाग चकरघिन्नी हो गया की भाई कोनसा असली सलमान [...]
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मैं सबके साथ काम करना चाहती हूं :कैटरीना कैफ

कैट बालीवुड की नई लक्स सुंदरी बन गई हैं। कैट अब कई दशकों तक ब्यूटी सोप के विज्ञापन करने वाली अभिनेत्रियों मधुबालाए हेमा मालिनीए श्री देवीए जूही चावलाए माधुरी दीक्षितए करीना कपूर एवं ऐश्वर्या राय की फेहरिस्त में शामिल हो गई हैं। इस संबंध में कैट कहती हैं
 
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काईटस….

खुप दिवसात सिनेमागॄहात जाउन कोणता सिनेमा पाहिण्याचा योग आला न्वहता.खरतर बरयाच काळात अगदि आवर्जुन सिनेमागॄहात जाउन पहावा असा कोणता नविन सिनेमा मला जाणवलाच नाही .पण ऋतिकच्या काईटस ची तर वाट मनापासुन पाहत होतो. खरतर मला तो पहिल्याच दिवशी पाहायचा होता.पण
 
देवेंद्र चुरी
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वर्धा के बाद इंद्रप्रस्‍थ विवि में भी गुंडई पर उतरे कुलपति

दो कवि, एक शाम [14 May 2010 | Read Comments | ] मिथिलेश श्रीवास्‍तव ♦ उस दिन हमने उस घटना को याद किया, जब दूरदर्शन पर आलोकधन्‍वा को बोलना सुनते हुए उनसे अगला प्रश्‍न करना मैं भूल गया। Read the full story »ये जातीय हत्‍याएं हैं [15 May 2010
 
अविनाश
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सा रे ग म प…

लहानपणापासुनच अगदि मनापासुन मी प्रेम केल ती गोष्ट म्हणजे संगीत.तानसेन नाही पण अगदि जातीचा कानसेन आहे मी लहानपणापासुन म्हणजे अगदि शास्त्रीय संगीत वैगेरे एकत नसलो तरी बरयाच क्लासिकल गाण्यांचा मनसोक्त आस्वाद घेतो.ती एकुन मला आनंद मिळतो ना अजुन काय हवे.तस हे
 
देवेंद्र चुरी
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बुला रहा है कोई मुझको, लुभा रहा है कोई.

बात पुरानी है, नब्बे का दशक अपने मुहाने पर था. अपने स्कूल के आख़िरी सालों में पढ़ने वाला एक लड़का राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में कैसेट रिकार्ड करने की दुकान खोलकर बैठे दुकानदार से कुछ अजीब अजीब से नामों वाले गाने माँगा करता. जो उम्मीद के मुताबिक उसे
 
मिहिर
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संगीत पर सिनेमा, चार साल और चार दिन की रिलीज

संपादकों की चिंतन बैठक [24 March 2010 | Read Comments | ] कुलदीप नैयर ♦ राजनीतिक दलों ने पैसा दिया और मालिक, उम्मीदवार सभी इस पाप में भागीदार रहे। इमरजेंसी में हम डर से और अब पैसे के लिए गिर गये। Read the full story »ये हृदयहीन कम्‍युनिस्‍ट!
 
अविनाश
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दायें या बायें..

जीवन के ट्रैफिक में मैं कहीं उलझा रह गया था, मौका अभय बाबू ने मार लिया था, मेरे देखने का छींका आज टूटा, उसी मीठी जलेबी का एक छोटा सा मजमून है..
 
Pramod Singh
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बीहड़ में सिनेमा : १६ मार्च से चम्बल घाटी में होगा जमावड़ा

बीहड़ कभी भी अपनी जगह नहीं बदलते पर बदल गए हैं बीहड़ों के रास्ते और उनकी उम्मीदें !उम्मीदों पर ग्रहण है तो आशाओ पर पानी की गहरी धार.जिसमे से बिना सहारे के निकलना बीहड़ों के खातिर चुनौती भी है और जरुरी भी.कभी बीहड़ो की ओर रुख किया तो उपेक्षा ही नज़र आई
 
रंगनाथ सिंह
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मखमली आवाज का वो जादुई स्पर्श ।

संगीत की ताकत, उसके जादू के जिन किस्सों को हम बचपन से सुनते आए हैं। उनकी हकीकत से रूबरू होना हो तो तलत महमूद की मखमली आवाज से होकर गुजरना होगा। तलत साहब की आज 86वीं सालगिरह है।1924 में लखनऊ के एक रवायती मुस्लिम परिवार में जन्में तलत महमूद को कुदरत ने
 
संदीप पाण्डेय
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सिनेमाई झरोखों से जिंदगी की झलक

अजय जी के पुरजोर इसरार पर मैंने महीनों टालने के बाद मेरी जिंदगी में सिनेमा के अनुभवों से जुड़ा ये एक पीस लिखा था, जिसे उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग चवन्‍नी चैप पर लगाया है। किताबों पर लिखते हुए उसी रौ में मैंने सिनेमा पर भी कलम घसीट डाली। क्‍या है, कैसी है, पढ़ने
 
मनीषा पांडे
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परदे पर प्यार के यादगार लम्हें

हर दौर की अपनी एक प्रेम कहानी होती है. और हमें वे प्रेम कहानियाँ हमारी फ़िल्मों ने दी हैं. अगर मेरे पिता में थोड़े से ’बरसात की रात’ के भारत भूषण बसते हैं तो मेरे भीतर ’कभी हाँ कभी ना’ के शाहरुख़ की उलझन दिखाई देगी. हमने अपने नायक हमेशा चाहे सिनेमा से न
 
मिहिर
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साउंड ऑफ म्युझिक …

मारीया!! नदीचं खळाळतं पाणी कसं वाहात असतं- कुठलाच धरबंद नसल्यासारखं? तसं व्यक्तिमत्व.कित्येक वर्ष मनामधे घर करुन बसलेली ही ज्युली कधी तरी रोजच्या जिवनात एकदम आठवते. काही तरी कारण असतं लहानसंच- पण “आय सिम्प्ली रिमेम्बर माय फेवरेट थिंग्ज व्हेन आय फिल
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किसका जूता, किसका सर...

यह पहली बार नहीं हुआ है और हर बार नजरअंदाज किया गया हैं फर्क सिर्फ यह है कि इस मर्तबा ‘इस बार बार की गलती’ के साथ ऐसी शख्सियत का नाम जुड़ा है जिसे हम गुलजार के नाम से जानते हैं और जो हमारी नजरों में पाकीजा एहसास की तरह दर्ज रहा है। बिल्कुल उनके लिखे गीत
 
संदीप पाण्डेय
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चोरी तो ये शाहरुख और करीना जैसे सिखाते हैं

शाहरुख, सलमान, करीना, कटरीना, आमिर, अक्षय, शाहिद, रितिक...और न जाने कितने कपूर और कितने खान और कितने बच्चन...सब जिम्मेदार हैं। सीधे-सीधे इल्जाम लगाना थोड़ा अटपटा लग सकता है। ठीक है कि ये लोग हाथ पकड़कर चोरी नहीं करवाते। बल्कि ये तो चोरी को रोकने के लिए
 
विवेक आसरी
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सल्लू मियां, तुम रह गए कुंआरे

सलमान खान में ऐसा क्या है कि लोग उनके इस कदर दीवाने हैं? सलमान खान में ऐसा क्या है कि यह दीवानगी भी उनकी फिल्मों को सुपरहिट नहीं बना पाती? सलमान खान में ऐसा क्या है कि इंडिया उनके बिना नहीं रह सकता? ऐसा क्या है कि उन्हें रफा-दफा करना हमारा सबसे पसंदीदा
 
संजय खाती
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हरिश्चंद्राची फैक्टरी

यह आलेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. इस बार फिर शुरुआत एक सवाल से करते हैं. अगर तुम्हें एक मूवी कैमरा (जिससे फ़िल्म बनाई जाती है) मिल जाये और उसके साथ यह छूट भी कि तुम किसी एक चीज़ का वीडियो बना सकते हो तो बताओ तुम किसका वीडियो बनाओगे? अच्छा जब तक
 
मिहिर
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अवतार को गालियां क्यों पड़ रही हैं?

कई साल पहले जेम्स कैमरन ने एक फिल्म बनाई थी, जिसमें दुनिया के सबसे मजबूत शिप के पहले सफर के दौरान एक जीनियस किस्म का लोफर एक हसीना का दिल जीतता है और आखिर में शिप के साथ समंदर में शहीद हो जाता है। 'टाइटैनिक' नाम की इस फिल्म के कई साल बाद कैमरन ने एक बार
 
संजय खाती
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अवतार को गालियां क्यों पड़ रही हैं?

कई साल पहले जेम्स कैमरन ने एक फिल्म बनाई थी, जिसमें दुनिया के सबसे मजबूत शिप के पहले सफर के दौरान एक जीनियस किस्म का लोफर एक हसीना का दिल जीतता है और आखिर में शिप के साथ समंदर में शहीद हो जाता है। 'टाइटैनिक' नाम की इस फिल्म के कई साल बाद कैमरन ने एक बार
 
संजय खाती
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भारतीय सिनेमा का इतिहास

सात जुलाई अठारह सौ छियासी भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अमर दिन है। उस रोज मुंबई (पूर्व नाम बंबई) के वाटकिंस हॉटल में ल्युमेरे ब्रदर्स ने छः लघु चलचित्रों का प्रदर्शन किया था। इन छोटी-छोटी फिल्मों ने ध्वनिविहीन होने बावजूद भी दर्शकों का मनोरंजन किया
 
जी.के. अवधिया
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इब्न-ए-बत्तुता

इब्न-ए-बत्तुता बगल मे जुता पहने जो करता है चुर्र~~~ हे गाण ऐकल असेलच तुम्ही,सध्यातरी बरयाच चार्टबस्टरस वर हेच गाण वरती आहे.इश्किया या विशाल भारद्वाज़च्या नव्या सिनेमातील हे गाण आहे.हो तोच तो कमिने वाला विशाल भारद्वाज़.चित्रपटसृष्टीत काही नाव अशी आहेत कि
 
देवेंद्र चुरी
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'3 इडियट्स' क्यों अलग है

अब सिनेमा देखने जाना ढाई-तीन घंटे के लिए रोजमर्रा की जिंदगी की किचकिच से पीछा छुड़ाना नहीं रह गया। किसी साइको ऐनलिस्ट ने तो इस ट्रेंड की बड़ी दिलचस्प व्याख्या की है। उसके मुताबिक इंडिया में लोगों को सिनेमा हॉल मां की कोख का एहसास दिलाता है। वहां का
 
प्रसून जोशी
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'3 इडियट्स' क्यों अलग है

अब सिनेमा देखने जाना ढाई-तीन घंटे के लिए रोजमर्रा की जिंदगी की किचकिच से पीछा छुड़ाना नहीं रह गया। किसी साइको ऐनलिस्ट ने तो इस ट्रेंड की बड़ी दिलचस्प व्याख्या की है। उसके मुताबिक इंडिया में लोगों को सिनेमा हॉल मां की कोख का एहसास दिलाता है। वहां का
 
प्रसून जोशी
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मीडिया के मनोरथ नहीं

सुधीश पचौरी(मीडिया समीक्षक)पत्रकारिता का काम खबर लेना-देना है। डराना-धमकाना नहीं। मीडिया अगर किसी कमजोर के पक्ष में खड़ा होना चाहती है तो भी यह ध्यान रखना जरूरी है कि कैसे खड़ा हुआ जाए। मीडिया ट्रायल टीआरपी लेने के लिए एक हड़बड़ी की पत्रकारिता का ट्रायल
 
अभिनव उपाध्याय
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एल्विस प्रेस्ली : द किंग ऑफ़ रोंक एंड रोल

बीसवीं सदी में विश्व संगीत को नयी दिशा देने वाले फनकारों की यदि कोई सूची बनाई जाये तो क्या वह एल्विस प्रेस्ली के जिक्र के बिना पूरी होगी. ८ जनवरी १९३५ को अमेरिका के निहायत गरीब परिवार में जन्मे एल्विस ने आधुनिक संगीत को देश-दुनिया की दीवारों से परे ले
 
संदीप पाण्डेय
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5.+1 ते 3Ϊ

एका मध्यमवर्गीय पंजाबी कुटुंबात २२ एप्रील १९७४ ला जन्म, १९९५ साली ‘ आयआयटी दिल्ली ‘ आणि १९९७ साली ‘ आयआयएम-अहमदाबाद ‘ मधून पास आउट तेही ‘ बेस्ट आऊटगोइंग स्टुडंट ‘ चं मेडल घेउन.हाँगकाँगमधील एका मोठ्या नामांकीत अमेरिकी
 
देवेंद्र
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चलो सनीमा देखें

सरकार सबको संयम दिखा रही है। कम खाओ, कम खर्च करो, सादगी में रहने का स्वभाव पाल लो, सब्जी मंहगी हो तो कंदमूल से गुजारा करो। गांधीवादी तप-यम-नियम करोड़ों को सिखाने के उपलक्ष्य में अगला नोबल शांति पुरस्कार सरकार-समग्र को मिल जाए तो क्या आश्चर्य। पूरी कैबिनेट
 
तरुण विजय
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समा गया थोडे-से प्यार में ज्यादा-सा जादू

थोडा मैजिक थोडा प्यार’ यूँ तो बच्चों की फिल्म है और बच्चों के लिए काफ़ी मज़ेदार भी है, पर उसकी शुरुआत होती है- फ़िल्म के नायक, बडे नामी बिजनेसमैन रनवीर तलवार (सैफ़ अली ख़ान) के गुस्से (न जाने क्यों?) व उसकी कार के हादसे से, जिसमें एक दम्पति की मृत्यु हो ज
 
satyadev tripathi
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भूतनाथ - भूत को देवदूत बनाता है आदमी

सिनेमा- भूतनाथ भूत को देवदूत बनाता है आदमी ... जी हाँ, बी.आर. चोपडा बैनर की फिल्म ‘भूतनाथ’ यही बताती है (इसलिए नाम देखकर इसे डरावनी वग़ैरह वाली फिल्म न समझें)। गोवा के एक भूत बँगले, जिसमें टैक्सी वाले व नौकर-चाकर तक नहीं आते, में रहने आये परिवार की मा
 
satyadev tripathi
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मेरे बाप पहले आप्

हास्य के साथ ‘कुछ और’ की खिचडी - काफ़ी फ़ीकी... यदि सिनेमा हाल में घुसते हुए प्रियदर्शन (लेखक-निर्देशक) मिल जायें, तो आप यही कहके उन्हें आगे कर सकते हैं- पहले आप। फिर दोनो पूरे तीन घंटे (हॉय, सम्पादित क्यों न किया या..र) बैठ पायें, तो निकलते हुए पूछिए
 
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लव स्टोरी- 2050 हैरी बावेजा लिखित-निर्देशित फिल्म ‘लवस्टोरी-2050’ में सना (प्रियंका चोपडा) व करन (हरमन बावेजा) को देखते हुए आधी फिल्म तक यही लगा कि 2050 का प्यार भी वही पहली नज़र वाला ही होगा- बिना किसी कारण व तर्क के...। फिर लडकी के पास बडा अच्छा घर
 
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‘जन्नत’ का रास्ता - ईमाँ या कुफ़्र...?

जन्नत’ का रास्ता - ईमाँ या कुफ़्र...? चचा ग़ालिब के ज़माने में शायद यह द्वन्द्व जिन्दा था, जब उन्होंने लिखा था - ‘ईमाँ मुझे रोके है, खैंचे है मुझे क़ुफ़्र...’, लेकिन आज वह बात नहीं रही - क़ुफ़्र का जलजला तारी है... और ईमाँ की बेसिक समझ ही नदारद हो गयी है...
 
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दे ताली

ताल ठोंकते-ठोंकते... हो गयी ‘दे ताली’... एक लडकी मम्मो (आयशा टाकिया) और दो लडके - पगलू (रीतेश देशमुख) व अभि (आफ़्ताब शिवदासानी)...लेकिन ‘एक फूल दो माली’ नहीं.. वैसे साँचे अब नहीं रहे - न जीवन में, न फिल्म में। आफ़्ताब तो हर दिन एक लडकी को दिल दे बैठता
 
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पुराने फॉर्मूलों को खींचतानकर बनी ‘महबूबा’ का क्या हो...? सफ़ाई देखिए कि करन (अजय देवगन) सपने में लडकी को देखता है और उसे पेंटिग्स में हू-ब-हू उतार लेता है !! स्टुडियो (सॉरी, बैठक है) भर रखा है.। फिर कमाल देखिए कि वह लडकी उसी शहर में है। तब मह्बूबा-मह
 
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- धूम धडाका

हास्य का अभिनय और अभिनय का हास्य... जो बाबा ने अपने ‘मानस’ के बारे में विनम्रता वश कहा था - ‘भनिति मोर सब गुन रहित, बिस्व बिदित गुन एक’, वही कठोर सत्य है - शशि रंजन लिखित-निर्देशित फिल्म ‘धूम धडाका’ का। बाबा में वह सत्य है -‘ एहि महँ रघुपति नाम उदारा
 
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अकेलेदम आतंकवाद को खत्म करने का ‘कॉंट्रैक्ट’ ... रामगोपाल वर्मा का नया हीरो आतंकवाद को खत्म करने का ‘कॉंट्रैक्ट’ लेता है और यह फिल्म का ही कमाल है कि वो ऐसा कर देता है - दो गैंगों का सफ़ाया...वरना तो इस बात में कोई माल नहीं है, यह रागोव को भी मालूम है
 
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इस्तानबुल का मिशन टाँय-टाँय फ़िस्स अपूर्व लखिया को लगा कि ‘शूट आउट’ को मिशन और ‘लोखंड्वाला’ को ‘इस्तानबुल’ कर देंगे, तो एक और हिट बन जायेगी; पर भूल गये कि वह एक वारदात थी, जिसके निशानात लोगों की जेहन में थे। सो, लोग गये देखने। और जैसा कि हर घटना के पी
 
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