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पाती-दर-पाती

मेरे द्वारा लिखी पिछली पोस्‍ट 'एक पाती यह भी' पर एंटीवायरस के संपादक-साहित्‍यकार श्री नीरज दइया ने अपने विचारों भरी पाती 'विरोध के लिए विरोध नहीं' लिखी।इसमें उठे सवालों का जवाब मेरे द्वारा दिया गया वहीं उन्‍हीं का प्रत्‍युत्‍तर भाई नीरज ने अपनी पोस्‍ट
 
दुलाराम सहारण
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एक पाती यह भी

मैंने नहीं सोचा था कि ऐसे किसी विषय पर मुझसे लिखना हो जायेगा।किसी काम को गलत होते देखते हैं तो दो ढंग की प्रतिक्रियाएं होती हैं। पहली, उसकी निंदा करना और दूसरी, उन गलतियों या कमियों से कुछ सीखते हुए स्‍वयं बेहतर करना। मैं देखने का दूसरा ढंग काम में लेने
 
दुलाराम सहारण
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बाल साहित्‍य की सुध ली साहित्‍य अकादेमी ने

किसी भी भाषा का विस्‍तार तीव्र गति से तभी हो सकता है जब वह भाषा प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी हो। स्‍कूल में बच्‍चा पहुंचते ही घर में अपनी मां से सीखी भाषा को न छोड़े और उसी में पढ़ते हुए आगे बढ़े तो ठाठ ही निराले होते हैं। लेकिन यह खुशकिस्‍मती कुछ भाषाओं तक
 
दुलाराम सहारण