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पश्चाताप :मानस खत्री

एक लड़की थी. उसका नाम था डिंकी. वो अपने माता-पिता की एकलौती संतान थी. दोनों ही उससे बहुत प्यार करते थे. डिंकी पढने के साथ-साथ विद्यालय की सारी गतिविधियों में सबसे आगे रहती थी. परन्तु उसमें एक कमी थी. वो घर में कोइ काम नहीं करती थी. जब भी उसकी माँ उससे
 
Manas Khatri
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जीवन में खुश रहने का रहस्य :मानस खत्री

हम जब कोई कार्य शुरू करते हैं तो ये आवश्यक नहीं है कि हमें पहली बार में ही उसमें सफलता प्राप्त हो. किसी कार्य को करने में चाहे कितनी बार भी असफलता का सामना करना पड़े फिर भी अपनी सफलता के बारे में आशावादी रहना चाहिए. यदि हमारा उद्देश्य सही है तो हमें
 
Manas Khatri
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श्रम से चलता है ये जीवन :मानस खत्री की कविता

आपदाओं से मत घबराओ, सदा इन्हें स्वीकार करो, जीवन में कुछ करना है तो, मेहनत से तुम काम करो. पत्थर पिघल जाएंगे पल में, मिटटी बन जाएगी सोना, श्रम से चलता है ये जीवन कुछ पाने को है, कुछ खोना
 
Manas Khatri
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हौसले को कभी टूटने न दें :मानस खत्री

मध्यांतर का समय था. कुछ छात्र विद्यालय के पास से जा रहे थे. तभी एक विद्यार्थी ने दुसरे से कहा की मेरे परिवार का बहुत बुरा हाल है. अभी कुछ ही दिनों पहले मेरे नाना के साथ बहुत बड़ी दुर्घटना हुई है. यह दुर्घटना एक बम धमाके की वजह से हुई है. वो मदन के नाना
 
Manas Khatri
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सबसे मीठा क्या :मानस खत्री

एक गुरु के पाँच शिष्य थे. गुरु जी उन्हें अपने आश्रम में शिक्षा प्रदान करते थे. एक दिन गुरूजी ने शिष्यों से कहा, "जो मेरी परीक्षा में सफल होगा, उसे ही अपना योग्य शिष्य बनाऊंगा". पाँचो शिष्यों ने कहा, "गुरूजी आप हमारी परीक्षा ले सकते हैं". गुरूजी ने एक दिन
 
Manas Khatri
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युवा और फैशन :मानस खत्री की हास्य कविता

आज कल के युवा वर्ग का प्रेम सिर्फ फैशन है, इसीलिए तो लेते हर माँ-बाप टेंशन हैं. मोबाइल-Sms का २४ घंटे का Communication है, मात्र पैसा कमाना ही उनका निर्धारित Profession है. समय व्यर्थ करते हैं वो दिखाने में अपनी स्टाइल, इसीलिए बदल रही है सबकी Life-Style.
 
Manas Khatri
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धरती माँ को बचाना है :मानस खत्री की कविता

पृथ्वी माता के रूप में, वर्षा-गर्मी और धूप में, हम सबका यही सहारा है. ये पृथ्वी ही घर हमारा है. प्रेम हमे देती ये माता, इसका आँचल हमे है भाता.
 
Manas Khatri
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दिल उदास और लब खामोश

दिल उदास है, लब खामोशजिंदगी में कहीं उम्मीद अभी बाकी है,अब अपनी गुस्ताखियों पर भी ऐतराज़ होता है, छोड़कर सभी मुझे बेगाना समझने लगे,ज़रा कोई बताये तो हमारी खता,कि बरसों चाहने का सिला क्या होता है,क्या होता है जब उनकी याद आती हैऔर मन मसोसकर रह जाता हैछोड़कर
 
चन्दन कुमार
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जीने से पहले मरना

आज जीवन जीने वाला,कितनी बार मरता है,हर पल जीने से पहले, वह कई मर्तबा मरता हैमरने की सोचना आज नियति है, जीना बस एक झूठा सपना है,हर सपना रात के अँधेरे में,एक नयी उम्मीद जगाता है,सुबह सपना भी टूट जाता है,टूटना सपने की नियति है, ठीक उसी तरह जैसे, जीने के बीच
 
चन्दन कुमार
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हम तो कीमत कि दाद लिखे: कनिष्क कश्यप

मेरी राखों कि नीलामी की तुमने जो कीमत लगायी है वह कीमत दुनिया पूछेगी हम तो कीमत कि दाद लिखे
 
kanishka kashyap
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बावरिया, मुँहनोचवा और कच्छा-बनियान :मानस खत्री

क्या मिलता है तुम्हे बहा कर रक्त? क्यों बर्वाद करते हो इसमें अपना अमूल्य वक़्त? छोड़ दो इन भयानक कर्यों को, बन जाओ अच्छे इन्सान, करते हो लोगों की नींदें हराम, आतंक मचा रखा है तुमने तमाम, सहमा हुआ है नगर का हर इन्सान, अब तेरे पापों का घड़ा भर चुक है,
 
manasfaizabad
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खैराती में खुद्दारी ! : रश्मि प्रभा

ये तो धागों की कमी थी तो जब जहाँ जैसा मिला उससे रफू कर दिया काफी नाम है इस खैराती ज़िन्दगी के पैबन्दों की इस कारीगरी के आगे आत्मा में लगे घावों की क्या बिसात
 
Rashmi Prabha
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बुनियाद नहीं बदलती…… : रश्मि प्रभा

अपने सुकून के लिए समुद्र मंथन मत करो हर बार अमृत नहीं निकलता और गर निकल भी जाए तो उसे असुरों को समर्पित करना तुम्हारी विशालता नहीं कायरता है ! तुम अच्छी तरह जानते हो ढाँचे के क्षणिक रद्दोबदल से बुनियाद नहीं बदलती !
 
Rashmi Prabha
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पड़ोसी :मानस खत्री की हास्य कविता

सुबह होते ही मुँह उठाये चले आते हैं, मुफ्त की चाय पी जाते हैं. कपडा धोने के लिए तो "सर्फ" भी नहीं लाते हैं, हर रविवार को एक मुट्ठी मांग ले जाते हैं, हमारे भी हैं पड़ोसी एक, विचारों के हैं वो बहुत ही नेक. हमसे कुछ मांगने की जगह हमें ही दे जाते हैं, ज़रूरत
 
manasfaizabad
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शादियाँ:मानस खत्री की हास्य कविता

लोगों को शादी का विषय है इतना भाया, की कई निर्माताओं ने इस पर हिट फिल्म भी है बनाया. जब भी मौसम है शादियों का आता, सभी का दीवाला निकल जाता. लोग अधिक लोगों को देते हैं इनविटेशन,
 
kanishka kashyap
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मोक्ष: रश्मि प्रभा

वो तुम्हारे अपने नहीं थे जिन्हें साथ लेकर तुमने सपने सजाये सूरज मिलते सब अपनी रौशनी के आगे एक रेखा खींच ही देते हैं ! शिकायत का क्या मूल्य
 
kanishka kashyap
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जबलपुर : सृजन, विचार और संगठन की त्रिवेणी

जबलपुर की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत शानदार है। जबलपुर स्वाद, उन्मुक्तता और मोहब्बत में बनारस के करीब है। जबलपुर के बारे में कहा जाता है कि यहां काम करने की स्वतंत्रता भी है और भटकने और चहलकदमी करने की सुविधा भी। जबलपुर की खयाति सृजन, विचार और संगठन
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हम अशआर यूँ पिरोते रहे बस याद तुम आती रहो

हम अशआर यूँ पिरोते रहे बस याद तुम आती रहो खिल उठेंगे गे तमन्नाओं के फूल शबनम बन छाती रहो तुम्हे ढूंढ़ते तुम तक आ जाऊं गर मद्धम ज्योत जलाती रहो झिलमिला उठेगा समां वस्ल से बस फासले यूँ मिटाती रहो रूह भी एक हो जाएँगी करीबियां यूँ बढाती रहो जुग्नुयें लोट
 
kanishka kashyap
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रामायण मीमांसा -१ : क्या रामायण के गर्भ में सच यह था ?

क्या राम का आशय " मन' से है ? यानि जो हमेशा रमता रहे , कभी भी शांत ना रहने वाला अस्थिर . क्यों 'राम' हीं नाम रखा गया ? क्या दशरथ, का मतलब शरीर है जिसका पुत्र है मन यानि राम . दश+ रथ = यानि वह रथ जिसे दस द्वारा संचालित किया जाता हो . शरीर को दस इन्द्रियां
 
VICHARMIMANSA DESK
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सभी मिट्टी के घरौंदे टूट गए :गज़ल

तरस गए शब नींद को तश्नगी से लब तरस गए नाखुदा ने पुकार भी कि कई अब्र फिर भी बरस गए
 
kanishka kashyap
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उफ़ ये गर्मी ! शब्द भी बीमार हो गए हैं: रश्मि प्रभा

कच्चे आम ले आई हूँ इसे भी आजमाना है शब्दों को बचाना है कुछ कहना है और सुनना है ..
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जिस शाम गए थे तुम, ना शाम वो ढलती है :ग़ज़ल

हर रोज दीवारों पर तस्वीर बदलती है, जिस शाम गए थे तुम ना शाम वो ढलती है लम्हों में जिए थे कभी ,अब उम्र बितानी है जुबान से ना जो निकले , आँखों से बतानी है वो जंजर होती शाख , हर रात सिसकती है जिस शाम गए थे तुम, ना शाम वो ढलती है सफों पे ताराशुं मैं , तेरे
 
kanishka kashyap
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वो भारत देश है मेरा.. : रश्मि प्रभा

फिर कोई डाल नहीं ,सोने की चिड़िया नहीं... पंख - विहीन हो जाता है भारत.... शतरंज की बिसात पर,चली जाती हैं चालें... तिथियाँ भी मनाई जाती हैं साजिश की तरह...
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नयी शताब्दी कथेतर गद्य की: प्रो. रामबक्ष

उदयपुर। कल्पनाशीलता का पुराना युग समाप्त हो गया है और अब इसकी आंशिक संभावना गद्य में ही दिखाई दे रही है। तथ्य के प्रति बढ़ रहा आकर्षण बताता है कि पाठक अब ठीक-ठीक जानना चाहता है। यही कारण है कि नयी शताब्दी में कथेतर गद्य विद्याओं को पारम्परिक विधाओं की
 
समकालीन जनमत
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दिल्ली पुस्तक मेला में जसम का अभियान

जन संस्कृति मंच ने अपने घोषित कार्यक्रम के तहत आज से विश्व पुस्तक मेले में साहित्यकारों और पाठकों के बीच साहित्य के कारपोरेटाइजेशन के खिलाफ अभियान के शुरुआत की। आज पुस्तक मेले के गेट न. 12 पर कवि आलोचक विष्णु खरे, कवि शोभा सिंह, कथाकार योगेन्द्र आहूजा,
 
समकालीन जनमत
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सैमसुंग प्रायोजित साहित्य अकादमी पुरस्कार का बहिस्कार करें

जन संस्कृति मंच ने बहुराष्ट्रीय उपभोक्ता उत्पाद कंपनी सैमसंग के साथ मिलकर साहित्य अकादमी द्वारा दिए जा रहे टैगोर साहित्य पुरस्कारों की कड़ी भर्त्सना की है और लेखकों-साहित्यकारों से उनके बहिष्कार का आह्वान किया है।साहित्य अकादमी द्वारा ये पुरस्कार सोमवार,
 
समकालीन जनमत
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तनहा दिल मेरा

पुराने साल को अलविदा, नए को सलाम करता है हर दिल... पर कुछ ऐसे भी हैं, जिनकी कई यादें जुड़ी हैं, पुराने साल से... उसकी राहें, गलियां नए साल में भी वही पुरानी यादें दिलाएंगी.... दिल कसमसा कर रह जाएगा एकबार फिर... फिर किसी की पहलू की तलाश में खो जाएगा म
 
चन्दन कुमार
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मीडिया विमर्श का वार्षिकांक समर्पित है मीडिया और महिलाएं विषय पर

भोपाल। महिलाएं आज मीडिया के केंद्र में हैं। मीडिया उन्हें एक औजार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। मीडिया ने स्त्री को बिकने वाली वस्तु बना दिया है। मीडिया और स्त्री के बीच बनते नए संबंधों को उजागर करती है मीडिया विमर्श का नया अंक। जनसंचार के सरोकारों पर क
 
जयप्रकाश मानस
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यादें शेष रह जाती हैं

जब तन्हा होता हूं तो तुम्हारी याद आती है, जब भीड़ में होता हूं, फिर भी तुम्हारी याद आती है, क्या करूं तुम्हारे बग़ैर सिर्फ़ तुम्हारी ही याद आती है। कोहरे की धुंध में कहीं खो गई वो यादें, जो मुझे कभी परेशान किया करती थी, यादें आती हैं, यादें जाती भी ह
 
चन्दन कुमार
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हमें बताना.....

हमें बताना नहीं आता ग़म के साथ ए हसीना हमें जीना नहीं आता मोहब्बत तो हम भी करते हैं, मगर ठुकराए इज़हार पर पीना हमें नहीं आता मयख़ाने की शिरक़त हम अक्सर किया करते हैं, मगर बस्ल ए इंतज़ार में, आंखे भिगाना हमें नहीं आता क़ॉलेज के गेट पर हो खड़े, राह तेर
 
वरुण कुमार सखाजी
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हमें नहीं आता

हमें बताना नहीं आता ग़म के साथ ए हसीना हमें जीना नहीं आता मोहब्बत तो हम भी करते हैं, मगर ठुकराए इज़हार पर पीना हमें नहीं आता मयख़ाने की शिरक़त हम अक्सर किया करते हैं, मगर बस्ल ए इंतज़ार में, आंखे भिगाना हमें नहीं आता क़ॉलेज के गेट पर हो खड़े, राह तेर
 
वरुण कुमार सखाजी
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हमें नहीं आता

हमें बताना नहीं आता ग़म के साथ ए हसीना हमें जीना नहीं आता मोहब्बत तो हम भी करते हैं, मगर ठुकराए इज़हार पर पीना हमें नहीं आता मयख़ाने की शिरक़त हम अक्सर किया करते हैं, मगर बस्ल ए इंतज़ार में, आंखे भिगाना हमें नहीं आता क़ॉलेज के गेट पर हो खड़े, राह तेर
 
वरुण कुमार सखाजी
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मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आप को

कल रात एक मित्र से फूलन देवी और उनपर बनी फ़िल्म पर चर्चा होती रही और संयोग से उसके बाद ही कविता कोष पर अदम गोंडवी की इस रचना पर नजर गयी, आप भी पढ़ें - संदीप आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको जिस गली में भुखमरी की य
 
संदीप पाण्डेय
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लुट गयी ये ज़मीं, लुट गया आसमां

कुछ घाव ऐसे होते हैं जो कभी नहीं भरते हैं। वक़्त इन घावों पर मरहम लगाकर इनकी टीस कुछ कम करने की कोशिश जरूर करता है लेकिन दर्द की स्मृतियों को भुला पाना क्या इतना आसन होता है? भारत-पाकिस्तान विभाजन का घाव तो पूरे देश को मालूम है लेकिन इस घाव का असली द
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चंदन का ब्लॉग

मित्र- कथाकार चंदन पाण्डेय ने ब्लॉग पर लिखने की पहल कर दी है। यूँ दस्तक तो उसने काफी पहले दे दी थी लेकिन उसका कहना है की अब वह इस पर नियमित रूप से लिखेगा। हालाँकि अभी किसी तरह का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी पर फ़िर भी चंदन के ब्लॉग पर अब तक जो पोस्ट आय
 
संदीप पाण्डेय
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संगमन के बहाने कथा-साहित्य की जनपक्षधरता पर विमर्श

हिन्दी साहित्य में गंभीर पहचान बना चुके ´संगमन´ का 15वां आयोजन उदयपुर में 2 से 4 अक्टूबर 2009 को हुआ। नगर के समीप गांव बेदला स्थित आस्था प्रशिक्षण केन्द्र में आयोजित इस समारोह के सहयोगी जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड विश्वविद्यालय) के जन
 
समकालीन जनमत
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कहानी

झारखंड का प्रकाश स्तम्भ साहित्यकार राधकृष्ण जी की एक अनुपम कृति- एक लाख संतानवे हजार आठ सौ अट्ठासीसमय व्यतीत होता जा रहा है ओर यह कहानी अभी तक चल रही है। मगर इस कहानी के शीर्षक को लेकर भ्रम हो जाता है, क्योंकि शीर्षक के साथ कहानी की संगति नहीं बैठती।
 
Arun Kumar Jha
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गुलजार की नज्‍म 'सूर्य ग्रहण'

कल सुबह सूर्य ग्रहण है। पूर्ण सूर्य ग्रहण। खग्रास सूर्य ग्रहण। खास चश्‍मा पहनें और यह अद्भुत खगोलीय घटना जरूर देखें। तब तक गुलजार साहब की यह नज्‍म पर पढ़ें- 'सूर्य ग्रहण' कॉलेज के रोमांस में ऐसा होता था/ डेस्क के पीछे बैठे-बैठे/ चुपके से दो हाथ सरकते
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तमाशा दुनिया का

हररोज़ सरे बाज़ार होता तमाशा भले ही चोर नज़रों से पर, देखता तमाशा दुनिया का... हररोज़ होता बेरोजगार नौजवान जेब भरते नेता, किसान करते आत्महत्या, फिर भी हम करते भारत-निर्माण..... संसद से सड़क तक, जन से जनपथ तक, कहां खो गया इंसान, चलो ढूंढें अपना स्वाभि
 
चन्दन कुमार
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ब्‍लॉग साहित्‍य नहीं है। कन्‍फर्म.

मैंने दो प्रवृत्तियां स्‍पष्‍ट तौर पर देखी हैं। पहली जो परिवर्तन हो रहा है उसे स्‍वीकार नहीं करना और दूसरी कि जो नया है उसे पुराने के भीतर फिट करने का प्रयास करना। अपनी बात कहने से पहले एक किस्‍सा सुनाना चाहता हूं। कुछ दिन पहले हमारे ग्रुप में बात हो
 
सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi