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सारंगा तेरी याद में..

हंसी-मज़ाक की बतकही देखते-देखते तीखे झगड़े में बदल गई थी. ऑडिसियस (किताब उसी के हाथ में थी) ऊपर हवा में किताब लहराता भावुक होकर चीख रहा था, ‘आप भूलिए मत, अदम ग़ुलाम नहीं थे! उनकी तबियत हुई, चीन गए. लोकतंत्र व्‍यक्ति के विचार को ही नहीं, उसकी भौतिक गति का
 
Pramod Singh
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बच्‍चे की कहानी

देर रात जब झिंगुर अपना हल्‍ला मचा-मचाकर थक गए होते, और सब तरफ़ सन्‍नाटा छा जाने के बाद जब जागी आंखों के सपने में कहीं दूर से उठी चली आती मेले की आवाज़ें आत्‍मा में गड्ढे गोड़ना शुरु करतीं, मैं चिंहुककर और जल्‍दी-जल्‍दी अम्‍मां के पैर दबाने लगता. अम्‍मां
 
Pramod Singh
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कहानी की कहानी

“उनींदे के दरवाजे़ सपने के सुरंग में उतरते ही मुसाफिर को ख़याल हुआ वह ग़लत ठिकाने चला आया है, उसने खूब हाथ-पैर पटकने शुरु किये, मगर कहानी में एक मर्तबा कूद पड़ने के बाद अब क्‍या हो सकता था, भोला मुसाफिर लचीले तारों की महीन, नशीली दुश्‍वारियों में और-और
 
Pramod Singh
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संध्‍याराग के बाद अब मैं क्‍या गाऊं, नहीं, मम्‍मा, तुम बताओ!

टैरेस पर इतने लोगों को देखकर सोहा घबरा गई. ज्‍यादातर अनजाने चेहरे. पहली बात दिमाग में यही आई कि चुपचाप उल्‍टे पैर वापस लौट जाए. (उसी पल दिमाग में ब्‍लौंडी का बैलून भी पॉप-अप हुआ, ‘हां, लौट आओ वापस और आकर मेरा जीना हराम करो, राइट?’ ब्‍लौंडी का तकिया-कलाम
 
Pramod Singh
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रेल पर सवार औरत..

औरत कहती है मैं कभी तुम्‍हें दु:ख देने का सबब नहीं बनना चाहती, मगर मान लो ऐसा मौका बना कि तुम्‍हें तक़लीफ़ हुई, तब? मेरे बाबत ग़लत फ़ैसला सुनाओगे? अपनी नज़रों मुझे नीचे गिराओगे? आदमी देखता रहता औरत की तरफ़, चुपचाप सुनता. औरत के रोओं, पैर के नाख़ूनों पर
 
Pramod Singh
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असंबद्ध, संगीतबद्ध..

गाढ़ी रातों में आदमी बहेलिये की तरह कहीं बहुत दूर अपने में कुछ ढूंढ़ता बाहर जाता है, मछुआरे के जाल-सा गहरे कहीं उतरा डूबा हुआ, ख़ामोश. रात की परछाइयां पानी में ‘गुड़प’ डोलती हैं, ऊपर आती हैं. सोयी म‍छलियों के सिलसिले किस दावत की किस अफ़ीम ने हमको हमारी
 
Pramod Singh
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गिलहरी का बाघ..

औरत देखेगी मन के फांक से, कितना गहरे देख सकती हूं की झांक से, और फिर दिलटूटी आवाज़ में बुदबुदायेगी, ‘मैं तुम्‍हारा भरोसा नहीं करती. इसलिए तुमसे नफ़रत करती हूं, सुनो. और प्‍यार करती हूं इसलिए नफ़रत नहीं कर पाती!’ गोद का बच्‍चा एकदम-से गिर पड़े की तरह आदमी
 
Pramod Singh
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होगा जैसा जितना..

होंगी बहुत सारी कभी बर्फ़ की बरसात नहीं होगी जैसे स्निग्‍ध सितारों की आभा हमारी आत्‍माओं पर झरे सारी रात झरती रहे, खुले में नंगे पैर भागें वो सचमुच की चांदनी रात सी रात कब होगी, नहीं होगी दिखेगा जीवन नाखुश कुछ झुंझलाया-सा, अचक्‍के सामने पड़े पुराने गरीब
 
Pramod Singh
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कितनी भाषाओं कितनी सभ्‍यताओं में..

औरत कहती है मन की रेल पर ये जो तुम हसरतों की ऐसी मीठी, पगलायी लतरें बिछाये जाते, कुछ सूझता है मुझे कहां-कहां खींचे लिए जाते हो? यह समय है और कितना अच्‍छा है हम ज़ि‍न्‍दा हैं, मगर फिर? 'फिर क्‍या?', आदमी हंसता है चार वर्ष के बच्‍चे-सी निष्‍पाप हंसी.
 
Pramod Singh
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मछलीघर

गए इतवार भास्‍कर में एक कहानी छपी थी, उसी को चिपका रहा हूं. . भायंदर में जहां बोउ दी का घर है पीछे की खिड़की या जंगलेनुमा बालकनी से पीछे पटरियों का जाल, या सीधे-सीधे गाड़ि‍यों का आना-जाना नहीं दिखता, भोर से देर रात तक उनकी थरथरायी बेचैनी कानों में उत
 
Pramod Singh