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एक पूरा बरस : अधूरा समझौता

तुमने ठीक ही लिखा है-- न आने पायें उदासी के झोंके ,फुहारें दर्द की न पड़ें सुबह-शाम,आँखों में परछाइयाँ बादलों कीथमें केवल, जमें नहीं सावन में .--- यह सब कुछ  चाहता हूँ  मैं भीपर दोस्त,एक  पूरा बरस होता
 
prkant
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सावन बदल गया है

सावन नही रहा भीगा भीगा सासावन नही रहा गीला गीला साफुहारों को सावन तरस रहा है सावन बदल गया हैमंद है बादलों का शोरमोर नहीं नाच रहे चारो ओ़र कारे बादलों को सावन तरस गया हैसावन बदल गया हैथम गयी है किसानों की थापखो गई है मेंढकों का आलापपानी के रंग को सावन तरस
 
arun c roy
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सावन के बहने

सुबह - सुबह दरवाजे पर दस्तक हुई . उनींदी आखों से दरवाजा खोला तो हैरान रह गई . उम्मीदों भरी टोकरी में यादों के सिलसिले ... हरियाली में डूबी पूरी कायनात , तन ही नहीं मन को भी भिगोती बूंदों की सौगात लिये जो शख्स खड़ा था उसका चेहरा जाना - पहचाना तो बिलकु
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झुकी आई बदरिया सावन की, सावन की, मनभावन की

वे युवा हैं। हैंडसम हैं। मखमली आवाज के धनी हैं। चाहते तो इंजीनियरिंग में कैरियर बना सकते थे, एकदम चमकीला। लेकिन यह राह बीच में ही छोड़ी और सुर की उजली राह पकड़ी। कैंसर से पिता की मृत्यु हुई तो मां ने हिम्मत बढा़ई। धीरे-धीरे सारेगमप से होते हुए आलाप ल
 
ravindra vyas
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