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एक साथ तुम्हारा पाने को

मैं छोड़ के सारे बन्धन को, और तोड़ के सारी कसमों को, दिल हाथ में लेकर आई थी , एक साथ तुम्हारा पाने को। ना ये देखा , ना वो सोचा, ना इसकी सुनी, ना उससे कहा, मैं सब कुछ भूल के आई थी, एक साथ तुम्हारा पाने को। बाबुल की पुकार है कानों में, मेरी माँ की आंहे स
 
Rashi
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अकेला

आज अकेला हुँ , कल के साथ के लिए ,आज मै एक कदम चला, दो कदम साथ के लिये, मंजिल दुर है , साथ तो चलो दो कदम।
 
Dhiraj Shah
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