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हत्यारे

(एक)हत्याराअब नहीं रहारात के अंधेरों का मुहताजमुक्त अर्थव्यवस्था केपंचसितारा सैलून मेंसजसंवर करनिःसंकोच घूमता हैन्याय की दुकानो सेसत्ता के गलियारों तकनये चलन के बरअक्सपहन लिए हैंत्रिषूल के लाॅकेटऔरअपने हर शिकार को कहता हैआतंकवादी!(दो)टूटते परिवारों केइस
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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देखूंगा एक पूरा स्वप्न

अरसा पहले लिखी यह कविता आज नये साल की शुभकामनाओं के साथ) नये साल में नये साल में लिखूंगा एक पूरी कविता. गाऊंगा पूरे स्वर में कोई मुक्तिगान। ढ़ूढ़ूंगा कुछ पूरे दोस्त। भले नया न हो पर देखूंगा एक पूरा स्वप्न। जीना चाहूंगा एक पूरी ज़िदगी। भटकूंगा पूरेपन की
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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हमारे समय में

(यह कविता कोई सात साल पहले लिखी गयी थी और उस समय अक्षर पर्व में प्रकाशित भी हुई थी। पता नहीं क्यूआज इसे पोस्ट करने का जी हुआ)हमारे समय मेंशेरखतरनाक से दयनीय में तब्दील हो चुका हैऔर मनुष्यों की सारी चिंताजानवरों के इर्द गिर्द सिमट गयी है। हमारे समय में
 
अशोक कुमार पाण्डेय