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मेरी कहानियां

मुझे ,उस औरत की शक्ल ,बार बार याद आ रही थी . उसकी साड़ी का रंग मेरी आखों में कौंध जा रहा था ।उसका चेहरा मोम की मूरत जैसा था .....एक डर भी मुझसे चिपका हुआ था ...कहीं वह भूत तो नहीं था । मैं, मनको समझाता हुआ सफ़र कर रहा था ......बस वेल्वाई में रुकी सभी लोग
 
भंगार
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होली तो ससुराल

बावरे फकीरा एलबम की लांचिंग में व्यस्तता के कारण पुराना हास्य ठेल रहा हूँ ......... ताली बजाओ भाई जी होली तो ससुराल की बाक़ी सब बेनूर सरहज मिश्री की डली,साला पिंड खजूर साला पिंड-खजूर,ससुर जी ऐंचकताने साली के अंदाज़ फोन पे लगे लुभाने कहें मुकुल कवि होल
 
"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा "