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गीत./नून, तेल, लकड़ी के पीछे....

अपनी सबसे लम्बी ग़ज़ल के बाद अब मै गीत विधा की ओर लौट रहा हूँ. गीत, नवगीत, ग़ज़ल, दोहे, नई कविता, बाल कविता, व्यंग्य, कहानी, लघुकथा, लेख ....जब जैसा मन हो जाये लिखना चाहिए.सृजन अपना आकार खुद-ब-खुद ले लेता है. मन अपनी विधा खुद चुन लेता है. अब एक गीत...सुधी
 
girish pankaj
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अमन के हम पहरुए है, हमारा काम चलना है,

बस्तर अशांत है, हिंसा का खेल खेलने वाले नक्सलियों के कारण. नक्सली विकास की बात करते है और हमेशा विनाश के दृश्य उपस्थित करते है. अरुंधती राय जैसी लेखिकाएं और कुछ छद्म बुद्धिजीवी नक्सलियों को महिमामंडित करते रहते है, जबकि नक्सलियों की हरकतें केवल निंदनीय
 
girish pankaj
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जय-जय, जय हे पंथ खालसा....

तेरह अप्रैल १९१९. हम भारतीय कभी भी भूल नहीं सकते इस मनहूस तारीख को, जब अमृतसर के जलियावालाबाग में क्रूर जनरल डायर ने सैकड़ों भारतीयों को गोलियों से भून दिया था. उस पर लिखना शुरू करूंगा तो लंबा इतिहास हो जायेगा. इस डायर को ब्रिटिश मीडिया ने, वहां के लोगों
 
girish pankaj