पसंद करें
0
नापसंद करें

बतूता का जूता

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता बतूता का जूता इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में थोड़ी हवा नाक में घुस गई घुस गई थोड़ी कान में कभी नाक को, कभी कान को मलते इब्नबतूता इसी बीच में निकल पड़ा उनके पैरों का जूता उड़ते उड़ते जूता उनका जा पहुँचा जापान
पसंद करें
5
नापसंद करें

तुम्हारे साथ रहकर/सर्वेश्वर

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारे साथ रहकर अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है कि दिशाएँ पास आ गयी हैं हर रास्ता छोटा हो गया है दुनिया सिमटकर एक आँगन-सी बन गयी है जो खचाखच भरा है कहीं भी एकान्त नहीं न बाहर, न भीतर । हर चीज़ का आकार