बतूता का जूता
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता बतूता का जूता
इब्नबतूता पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
घुस गई थोड़ी कान में कभी नाक को, कभी कान को
मलते इब्नबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता उड़ते उड़ते जूता उनका
जा पहुँचा जापान
Feb 13 2010 04:43 PM



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