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प्रकांड, गैंडा और सरकंडा

संस्कृत की कण् धातु में निहित हिस्सा, शाखा, भाग, लघुतम अंश जैसे अर्थों से ही इसमें अध्याय या प्रसंग का भाव विकसित हुआ। घास प्रजाति के पौधे के लिए भी कांड शब्द प्रचलित हुआ जिसमें बांस से लेकर गन्ना भी शामिल है। किसी वृक्ष की शाखा, डाली अथवा तने को भी कांड
 
अजित वडनेरकर
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काना राजा और काक दृष्टि

ए क आंख वाले व्यक्ति को परिनिष्ठित हिन्दी में एकाक्ष या एकाक्षी कहते हैं। जिस तरह से दृष्टिहीन को सौजन्यतावश सूरदास की संज्ञा दी जाती है वैसे ही एक आंखवालों को समदर्शी भी कहा जाता है। समदर्शी अर्थात जिसकी निगाह में सब समान हैं । इस रूप में समदर्शी तो
 
अजित वडनेरकर
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अजगर करे न चाकरी…

अ जगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।। इस दोहे में अजगर निरीह जंतुओं को भकोसने की वजह से नहीं बल्कि अपने निकम्मेपन की वजह से बदनाम हो रहा है। सर्प प्रजाति के इस विशालकाय जंतु का अजगर नाम हिन्दी में खूब लोकप्रिय है। मलूकदास ने
 
अजित वडनेरकर
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अंदरखाने की बात और भितरघात

बोलचाल में अंदरखाना शब्द का खूब प्रयोग होता है जिसका अर्थ है भीतरी कक्ष। हालांकि इस अर्थ में इसका इस्तेमाल नहीं होता बल्कि सिर्फ भीतरी या आंतरिक या अंदर की जैसे भाव ही अंदरखाना में निहित हैं। अंदरखाना में मुहावरे की अर्थवत्ता है जैसे अंदरखाने की बात।
 
अजित वडनेरकर
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“शहीद” का शहादतनामा

हि न्दी की विकास यात्रा के दौरान सैकड़ों वर्षों में अरबी-फारसी के हजारों शब्द दाखिल होते रहे हैं जो अब बोलचाल की भाषा में इस कदर घुलमिल गए हैं कि उनके विदेशज होने का आभास भी नहीं होता। शहीद या शहादत भी ऐसे ही शब्द हैं। किसी पवित्र उद्धेश्य की खातिर
 
अजित वडनेरकर
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नकलनवीस के नैन-नक्श

अरबी में नक्ल अर्थ स्थानान्तरण भी है। गौर करें कि किसी दस्तावेज की अनुकृति बनाना दरअसल मूल कृति की छवि का स्थानान्तरण ही है। अ रबी का नक़ल शब्द अनुकरण के विकल्प के तौर पर हिन्दी में कुछ इस क़दर प्रचलित हुआ कि अब नकल शब्द के लिए कोई दूसरा शब्द ध्यान ही
 
अजित वडनेरकर
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नकदी, नकबजन और नक्कारा

लो गों की भाव-भंगिमाओं को हाव-भाव के साथ प्रस्तुत करने को नकल करना या नकल उतारना कहते हैं। ऐसा करनेवाला व्यक्ति नक़लची या नक्काल कहलाता है। नकलची में ची तुर्की-फारसी का प्रत्यय है और नक्काल में आल प्रत्यय हिन्दी का लगा है। कुछ बदले हुए अर्थों में इसे
 
अजित वडनेरकर
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कबूतर, कबूतरबाजी और उल्लू

स भी परिंदे यूं तो चंचल और मासूम होते हैं मगर कबूतर चंचल कम और मासूम ज्यादा होता है। ऐतिहासिक इमारतें और ऊंचे स्मारक इसे बहुत पसंद है सुस्ताने के लिए। कबूतरों को दाना खिलाना लोगों को बेहद पसंद है मगर इसकी बीट से भी लोग उतने ही परेशान रहते हैं। मान्यता है
 
अजित वडनेरकर
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बुर्जुआ वर्ग का बुर्ज

बु र्जुआ वर्ग का जिक्र अक्सर जनवादी, समाजवादी, साम्यवादी बहसों के दौरान होता है। पूंजीवाद के संदर्भ में बुर्जुआ का अर्थ है उस मध्यवर्ग से है जिसका झुकाव पूंजी निर्माण की ओर होता है। जिसके जरिये पूंजीपतियों के हित साधे जाते हैं। भारोपीय मूल का बुर्जुआ
 
अजित वडनेरकर
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बैसाखी और बैसाखनंदन

बै साखी पर्व को लेकर हिन्दी के शुद्धतावादी हमेशा भ्रम का शिकार रहे हैं। वे हिन्दी में बैसाखी शब्द के इस्तेमाल के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि विकलांगों को सहारा देने वाली छड़ी बैसाखी कहलाती है इसलिए बैसाखी पर्व को वैशाखी लिखना सही है। मैं इसे दुराग्रह
 
अजित वडनेरकर
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पंचों का प्रपंच यानी दुनिया है फानी…

आ म बोलचाल की भाषा में तत्सम शब्दों की बजाय तद्भव शब्दों के बढ़ते जाने की प्रवृत्ति होती है। भाषा में जो तत्सम शब्द बचे रह जाते हैं उसकी वजह उनमें निहित अर्थ शक्ति होती है अथवा तद्भव शब्द में अलग अर्थवत्ता का विकसित हो जाना भी है। प्रपंच भी एक ऐसा ही आम
 
अजित वडनेरकर
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फुटपाथ, सम्पादक का प्यादा और पदवी…

ब ढ़ती व्यावसायिक होड़ में महत्वाकांक्षी व्यक्ति पद की दौड़धूप में जानमारी कर रहे हैं। इसमें हर वर्ग का आदमी शामिल है। नौकरीपेशा से लेकर आत्मनिर्भर तक, समाजसेवी से राजनेता तक सब। आखिर ये पद, उपाधि या पदवी है क्या? भारोपीय भाषा परिवार के पद शब्द की
 
अजित वडनेरकर
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[नाम पुराण-7] दुबे-चौबे, ओझा-बैगा और त्रिपाठी-तिवारी

...ब्राह्मणों का एक कुलनाम त्रिपाठी भी प्रसिद्ध है। कुछ विद्वान इसका अर्थ त्रि+पाठिन् बताते है अर्थात तीनों वेदों का पाठ करनेवाला ब्राह्मण। इसकी व्युत्पत्ति त्रिपदी से भी बताई जाती है… ज्ञा न की परम्परा का व्यक्ति की पहचान से गहरा रिश्ता है। आमतौर पर
 
अजित वडनेरकर
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नेहरू, झुमरीतलैया, कोतवाल और भोपाल

...आबादी के साथ नहर शब्द तो नहीं जुड़ा मगर नहर किनारे रहने की वजह से एक कश्मीरी पंडित परिवार की पहचाननेहरू हो गई... जलस्रोतों के किनारे धर्म-संस्कृति का भी विकास हुआ। जल से जुड़ी पुण्य की अवधारणा ने ऋषि-मुनियों को भी नदी तट पर वास करने का अवसर दिया।
 
अजित वडनेरकर
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आपके लिए राजस्थान से साहित्य का ‘सम्बोधन’

पत्रिका: सम्बोधन, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर09, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: क़मर मेवाड़ी, पृष्ठ: 186, मूल्य:20रू.(त्रैवार्षिकः 200रू.), ई मेल: qamar.mewari@rediffmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. (02952)223221, 09829161342, सम्पर्क: संपादक सम्बोधन, पो.
 
अखिलेश शुक्ल
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सिन्धु से इंडिया और वेस्ट इंडीज़ तक…[नामकरण-2]

मू ल स्थान के नाम से अपने समूह की पहचान जोड़ने की प्रवृत्ति भारत के सभी समुदायों में इसे देखी जा सकती है। खासतौर पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा बसने वाले जनसमूहों ने अपनी पहचान को क्षेत्र विशेष के साथ जोडा। राजेश खन्ना के नाम के साथ जुड़ा खन्ना उपनाम
 
अजित वडनेरकर
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तूफाने-हमदम और बवंड़ा-बवंड़ी

तू फान हिन्दी का आम शब्द है। तेज हवा या चक्रवात के लिए इसका इस्तेमाल होता है। पारिभाषिक रूप में समुद्री सतह पर तेज बारिश के साथ चलनेवाले तेज अंधड़ को तूफान कहते हैं मगर हिन्दी में इस शब्द का साधारणीकरण और सरलीकरण दोनो हुआ है। तूफान शब्द का इस्तेमाल अब
 
अजित वडनेरकर
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यारी-दोस्ती और जारज संतान…

किसी स्त्री के आशिक के अर्थ में जारः शब्द की अर्थवत्ता फारसी के यार में भी कायम है। प्राचीनकाल के किसी भी समाज में बिना विवाह हुए किसी महिला का पुरुष से मैत्रीपूर्ण संबंध उचित नहीं माना जाता था। हि न्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त दस संज्ञासूचक शब्दों की अगर
 
अजित वडनेरकर
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औरत लफ़्ज में क्या ख़राबी है?

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस दु नियाभर में नारीवादी सोच के लोग औरत aurat शब्द को लेकर ख़फ़ा रहते हैं। उनकी निगाह में महिलाओं के लिए यह बेढंगा और बेइज्जती भरा लफ्ज़ है। आज भी हिन्दी भाषी क्षेत्र की कोई महिला खुद के लिए औरत  शब्द सुन कर कब तमक जाए, कहा
 
अजित वडनेरकर
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सहज की खोज में सहजिया

रो जमर्रा की बोलचाल में सहज शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। आखिर यह सहज है क्या? सरल, सामान्य, सुगम या साधारण जैसे अर्थों में सहज शब्द का प्रयोग होता है। वैसे सहज का अर्थ है प्रकृत या साधारण रूप में रहनेवाला। सामान्य बोलचाल से लेकर अध्यात्म तक इस शब्द की
 
अजित वडनेरकर
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माई नेमिज खान बहादुर पठान [1]

इ न दिनों खान नाम चर्चा में है। माई नेम इज़ खान फिल्म विवाद में है। विवाद में लाने के सारे तत्व फिल्म के जन्म से जुड़े हैं। इसके बावजूद इस शब्द से जुड़ी जातीय पहचान का मिथ आज भी उतना ही रहस्यमय और आवरणों में लिपटा है। ऐसा नहीं कि खान के जातीय पहचान से
 
अजित वडनेरकर
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कोई वाकौ देवांग कहै है…

क भी देवांग नाम के कपड़े  का नाम सुना है? आज जिसे हम टेपेस्ट्री के नाम से जानते हैं, किसी ज़माने में उसका नाम देवांग था। रेशम से मिलती-जुलती किस्म के एक चमकदार कपड़े को ताफता कहते हैं। यह धूपछांही भी कहलाता है क्योंकि इसका ताना एक रंग का होता है और
 
अजित वडनेरकर
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जड़ से बैर, पत्तों से यारी

स तही सोच-समझ और मतलबपरस्ती के लिए एक कहावत है जड़ से बैर, पत्तों से यारी । इसी तरह खुद को प्रतिष्ठित करने या दूसरे को नुकसान पहुंचाने, पूरी तरह नष्ट कर देने के अर्थ में हिन्दी में दो मुहावरे आमतौर पर इस्तेमाल होते हैं । जड़ जमाना और जड़ उखाड़ना। यहां
 
अजित वडनेरकर
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लबाड़ी की लप-लप और प्रलाप

हि न्दी समेत कुछ बोलियो में बातूनी व्यक्ति के लिए लबार, लबाड़ी, लबारी या लबासी जैसा शब्द खूब प्रचलित है। लबाड़ना एक क्रिया है जिसका अर्थ है लूटना-खसोटना, ठगना वगैरह। लबारी की अर्थवत्ता में चोर, दुष्ट और ठग का भाव भी है। मूलतः लबारी में बोलने का भाव है।
 
अजित वडनेरकर
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साहसी, उद्यमी और बलात्कारी

हिम्मतवर और दिलेर को हिन्दी में साहसी कहते हैं और पराक्रम दिखाने का यह गुण साहस कहलाता है।  साहस का रिश्ता है संस्कृत की सह् धातु से जिसमें चेष्टा, प्रयास, आगे बढ़ना, जीतना जैसे भाव हैं। सह् का रिश्ता संस्कृत के प्रसिद्ध उपसर्ग सह् से नहीं है जिसमें
 
अजित वडनेरकर
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कँवर साब का कुँआरापन

कम् धातु में निहित स्नेह और अनुराग जैसे भावों के बावजूद इन्सान अपनी ही संतान यानी कुमार/कुमारी में फर्क करने लगा संबंधित कड़ी- जवानी दीवानी से युवा-तुर्क तक बि न ब्याहे युवक या युवती के लिए कुँआरा/कुँआरी शब्द प्रचलित हैं। एक खास आयु तक विवाह संयोग न
 
अजित वडनेरकर
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मामा शकुनी, सुगनचंद और शकुन्तला

दु नियाभर के समाजों में हर अच्छी शुरूआत के लिए शगुन-विचार करने का रिवाज है। बोल-चाल की हिन्दी में इसे सगुन बिचारना या सगुन-बांचना भी कहते हैं। नया काम मंगल बेला में हो जाए, ऐसे कार्य जो पुण्य प्राप्ति की आकांक्षा रखकर किये जाने हैं, उनके संबंध में
 
अजित वडनेरकर
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लिफाफेबाजी और उधार की रिकवरी

संबंधित कड़ी- जल्लाद और जिल्दसाजी लिफाफा से जुड़े कई मुहावरे प्रचलित हैं जैसे बंद लिफाफा। आमतौर पर गूढ़ और अबूझ व्यक्ति के लिए यह उपमा है… न कली लोगों का चरित्र अक्सर एक कृत्रिम आवरण avaran में लिपटा रहता है जिसके जरिये वे जैसे होते है, उससे अलहदा दि
 
अजित वडनेरकर
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जल्लाद की जल्दबाजी और जिल्दसाजी

कि सी को जान से मार डालनेवाला हत्यारा कहलाता है, किन्तु न्याय के अन्तर्गत मृत्युदण्ड पाए व्यक्ति को मौत के हवाले करनेवाले को जल्लाद कहते हैं। हिन्दी में इसके लिए वधिक शब्द है। वधिक शब्द वध् धातु से निकले वधः से निकला है जिससे बना है हिन्दी का वध शब्द
 
अजित वडनेरकर
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नाखुदा हम जिसे समझ बैठे…

म नुष्य के शरीर का महत्वपूर्ण अंग है कान । इसकी व्युत्पत्ति हुई है संस्कृत की कर्ण् धातु से जिसकी व्यापक अर्थवत्ता है और इससे बने अनेक शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं। कर्ण् धातु में छेदना, प्रवेश करना, घुसना जैसे भाव शामिल हैं। कान की संरचना के संदर्भ म
 
अजित वडनेरकर
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सब मवाली… गज़नवी से मिर्ची तक

पिछली कड़ियां- 1. बिलैती मेम, बिलैती शराब .2. औलिया की सीख, मुल्ला की दहशत ... किसी भी धर्म के  नवदीक्षितों को मूल संस्कृति में दोयम दर्जे का समझा जाता है... हि न्दी में असभ्य, उजड्ड के भाव उजागर करनेवाला एक शब्द है मवाली । हिन्दी फिल्मों में बद
 
अजित वडनेरकर
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मुफ्ती के फ़तवे…[संत-11]

मुफ्तियों को शरीयत के आईने में लोगों को राह दिखाने की जो जिम्मेदारी मिली थी उसमें धीरे-धीरे राजनीति प्रमुख होती चली गई। चिन्तन(क़ियास) का स्थान रूढिवादी सोच ने ले लिया। इ स्लामी संतों की आध्यात्मिक श्रंखला में ही आते हैं मुफ्ती । हालांकि मुफ्ती शब्द
 
अजित वडनेरकर
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बांकी चितवन और बांके की करतूत…

साठ के दशक की मुंबइया फिल्मों में अक्सर अक्सर खलनायक का नाम भी बांके हुआ करता था चां खूब बन-ठन कर रहनेवाले व्यक्ति को हिन्दी में बांका भी कहा जाता है। अब यह कहने की ज़रूरत नहीं कि बांका जो भी होगा वह सजीला भी होगा। कोई भी व्यक्ति या तो पैदाइशी सुंदर
 
अजित वडनेरकर