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श्याम गुप्त की पुस्तक समीक्षा : कर्मवीर , लाल बहादुर शास्त्री

पुस्तक समीक्षा ( संघात्मक समीक्षा पद्धति ) पुस्तक-- कर्मवीर , लाल बहादुर शास्त्री   ( काव्य कृति ),  रचनाकार--स्नेह प्रभा , प्रकाशक--गुंजन प्रकाशन, ऐ जी ११८,शालीमार बाग़ दिल्ली -८८., समीक्षक ---डॉ. श्याम गुप्त भारत के सच्चे लाल , लाल बहादुर
 
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मधु संधु की पुस्तक समीक्षा : धूप से रूठी चांदनी - गम्भीर विचारों का रागात्मक उच्छलन

अगर गम्भीर चिंतन की भावात्मक अभिव्यक्ति काव्य है तो धूप से रूठी चांदनी की चिंतन प्रभूत कविताएं निश्चय ही संवेदनशील पाठक को आन्दोलित करने की जादुई शक्ति रखती हैं। यह अतीत की यादें लिए अनजान सफर पर निकली कवयित्री के गुमसुम विचारों का उद्वेलन है। प्रवासी
 
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माटी के दीप-काव्य का उजाला (काव्य संग्रह)

माटी के दीप-काव्य का उजाला (काव्य संग्रह)समीक्षकः डा. महाराज सिंह परिहारहिंदी साहित्य के इतिहास में कविता ने ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह किया है। इसके माध्यम से ही हिंदी जन-जन तक पहुंची। गेयता और ध्वन्यात्मकता के कारण इसे लोगों का आत्मसात करने में परेशानी
 
डा. महाराज सिंह परिहार
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आबिद सुरती की काली किताब

  आबिद सुरती के 75 वें जन्म दिवस पर विशेष आपको लाल किताब के बारे में मालूम होगा. क्या आपको पता है कि ऐसी ही एक काली किताब भी है? जी हाँ, और इसके लेखक हैं – अपने आबिद सुरती. आपके लिए पेश है पुस्तक काली किताब के चंद चुनिंदा अंश. सबसे पहले, काली किताब
 
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श्याम गुप्त की पुस्तक समीक्षा : अमेरिकी प्रवासी भारतीय:हिदी प्रतिभाएं

पुस्तक- समीक्षा पुस्तक- -अमेरिकी प्रवासी भारतीय : हिन्दी प्रतिभाएं ( प्रथम व द्वितीय भाग ),  लेखिका -डा ऊषा गुप्ता , प्रकाशक -न्यू रायल बुक कंपनी , लालबाग , लखनऊ.;  समीक्षक --डा श्याम गुप्त.
 
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हिन्द स्वराज को पढ़ने के बाद

विज्ञानसम्मत व्याख्याओं से पदार्थ की जटिल बुनावट को समझने वाली अवधारणा जो अणु, परमाणु और न्यूट्रान, इलैक्ट्रान जैसी सूक्ष्मता को परिभाषित करने में सक्षम है, गांधी उस पर केन्द्रित दिखाई नहीं देते। बल्कि उससे परहेज करते हैं। इस परहेज या इंकार के बिन्दु
 
विजय गौड़
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चर्चा - लाज न आवत आपको

गत दिनों स्त्रीविमर्श, ऋषभ की कविताएँ और हिंदी-भारत समूह पर एक छोटी-सी कविता दी थी - लाज न आवत आपको, विस्मय कि उसपर काफी चर्चा हो गई. कवि का अपना पाठ तो कविता है, यों अपनी ओर से कुछ नहीं कहना है. लेकिन पाठक कि रचना धर्मिता और किसी भी रचना के अनेक पाठों
 
ऋषभ Rishabha
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पुस्तक समीक्षा : श्री बैंगनदेव नमोनम:

यदि किसी पुस्तक का नाम श्री बैंगनदेव नमोनमः जैसा आड़ा तिरछा हो तो वो आपका ध्यान खींचेगा ही. इस किताब के अंदर के पहले पन्ने पर लिखा है –“राष्ट्रभारती हिन्दी के 800-900 वर्षों के इतिहास में यह ग्रंथ इसलिए अमर रहेगा, क्योंकि अपने विषय का यह प्रथम और अन्तिम
 
Raviratlami
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नोकिया ५८०० – एक अदद टचस्क्रीन स्मार्टफोन की तलाश

जानिये कैसे एक टचस्क्रीन स्मार्टफोन की खोज खत्म हुयी जाकर नोकिया ५८०० ऍक्सप्रैस म्पूज़िक पर।
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मानव अपने पुरे जीवन काल ..................

मानव अपने पुरे जीवन काल में कई अवस्थाओं से होकर  गुज़रता  है . जिसमे ब्ल्यावास्था वो अवस्था है जिसमे शिशु संपूर्ण रूप से अपने माता - पिता पर निर्भर रहता है  अर्थात अभिभावक अपने अनुसार शिशु का पालन पोषण करता है . तत्पश्चात वह बाल्यावस्था
 
ana
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तुम इतने समीप आओगे मैंन कभी नहीं सोचा था......- डा. बुद्धिनाथ मिश्र

मधेपुरा की ऐतिहासिक साहित्यिक परम्परा को सम्वर्द्धित करते हुए बी. एन मंडल विश्वविधालय, मधेपुरा के वर्तमान कुलपति डा. आर. पी. श्रीवास्तव के सद्प्रयास से विश्वविधालय के सभागार में काव्य संध्या का एक महत्वपूर्ण आयोजन किया गया। विश्वविधालय स्थापना के 17
 
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समीक्षा—— कृति --शूर्पणखा-----

समीक्षा—— कृति --शूर्पणखा -(अगीत विधा- खंड काव्य), रचयिता—डा श्याम गुप्त- समीक्षक---मधुकर अस्थाना, प्रकाशन—सुषमा प्रकाशन , आशियाना एवम अखिल भारतीय अगीत परिषद, लखनऊ, मूल्य-७५/= नारी विमर्श का खन्ड-काव्य : शूर्पणखा समकालीन साहित्य में नारी-विमर्श बहुत
 
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आंच पहुंची आँगन तक

आँच-10 हरीश प्रकाश गुप्त ब्लाग पर इस माह आई एक काव्य रचना ने लोगों को बरबस आकर्षित ही नहीं किया बल्कि उनके अंतर्मन को भी स्पर्श किया। पाठकों की प्रतिक्रियाएँ इसका प्रमाण हैं। आज की आँच में मनोज कुमार की इस कविता - ‘मन तरसे एक आँगन को’ पर चर्चा की जा रही
 
करण समस्तीपुरी
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पुस्तक समीक्षा ................... समीक्षक---डा श्याम गुप्त.

पुस्तक---मधु- माधुरी , रचनाकार ---श्रीमती मधु त्रिपाठी , प्रकाशक --अखिल भारतीय अगीत परिषद् , राजाजी पुरम , मूल्य--१२५/=समीक्षक----डा श्याम गुप्त .समीक्षा------—- कृति --मधु-माधुरी ( गीत संग्रह) , रचनाकार—श्रीमती मधु त्रिपाठी, प्रकाशन---अ. भा. अगीत परिषद,
 
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संजय जनागल की पुस्तक समीक्षा : कथांजलि - पाठकों में आत्‍मीयता का भाव जगाती कहानियाँ !

संजय पुरोहित की ‘कथांजलि' पाठकों में आत्‍मीयता का भाव जगाती कहानियाँ ! संजय जनागल आजकल जो हिन्‍दी कहानियाँ विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में आ रही है, वह शिल्‍प के स्‍तर पर इतनी दुरूह होती है कि पाठक की रूचि होने के बावजूद भी वह कहानी पूरी पढ़ नहीं पाता। मेरे
 
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महिला दिवस पर महिला कलाकारों की कलाकृतियाँ

स्वराज भवन कलादीर्घा में महिला दिवस पर आयोजित महिला कलाकारों की कलाकृतियों में से कुछ कलाकृतियाँ -                       रचनाकार में और भी पसंदीदा सैकड़ों रचनाएँ पढ़ें - आलेख | उपन्यास | कविताएँ |
 
Raviratlami
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मीडिया में हिस्‍सेदारी

-पवन प्रकाश पत्रकारिता का समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन है 'मीडिया में हिस्‍सेदारी'। इसमें राइटर प्रमोद रंजन ने पत्रकारिता के नये स्‍वरूप की अपनी व्‍यख्‍या की है। इसमें पत्रकारिता के 150 वर्षों में हुए हर अंतर, चाहे वह टेक्निकल या फिजिकल हो, बताने की कोशिश की
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पत्रकारिता की सामाजिकी

-प्रकाश  'मीडिया में हिस्‍सेदारी' नामक यह पुस्तिका मीडिया के सामाजिक चरित्र, सत्‍ता और पूंजी से उसके संबंधों के साथ उसमें हाशिए के समाजों की भागीदार का तथ्‍यपरक आकलन करती है। विश्‍लेषक प्रमोद रंजन ने आंकडों और प्रमाणों के आधार पर स्‍पष्‍ट किया है कि
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खान हिट शिवसेना फ्लॉप

शुक्रवार को 'माय नेम इज खान' के रिलीज होते ही शिवसेना बोल्ड हो गयी । शिवसेना की सभी धमकियाँ धरी की धरी रह गयीं। इससे पहले राहुल गाँधी को मुंबई आने की धमकी के बाद भी शिवसेना कुछ नहीं कर पाई थी और अब खान की रिलीजिंग को रोकने की धमकी के बाद फिल्म का
 
अंकुर कुमार 'अश्क'
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एल. एन. भावसार के चमत्कारिक दृश्य चित्र

कलागुरू एल.एन.भावसार के दृश्य चित्रों में रंगों का अद्भुत समागम तो दिखता ही है, वर्षों की कला साधना व कूची से किए गए रियाज के चलते उनकी कलाकृतियों में लय और ताल के परिपूर्ण संयोजन दिखाई देते हैं. एलियाँस फ्रांसेज दीर्घा में प्रदर्शित एल. एन. भावसार के
 
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फिर सजी चौपाल : गुप्त के नवगीत पर परसुराम राय की समीक्षा

आँच-- परशुराम रायसमीक्षा के दूसरे अंक में श्री हरीश प्रकाश गुप्त की रचना ‘नवगीत’ लेते हैं जो 24 दिसम्बर 2009 को इसी ब्लाग पर देखने को मिली थी। नवगीत एक अद्यतन विधा है जिसमें कविता और गीत दोनों की विशेषताएँ देखने में आती हैं। हालाँकि बहुत स्पष्ट रूप से
 
करण समस्तीपुरी
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गिरीश कुमार वर्मा की पुस्तक समीक्षा : कादम्बरी मेहरा का कहानी संग्रह – पथ के फूल

पुस्‍तक समीक्षा यथार्थ की धड़कन -डॉ0 गिरीश कुमार वर्मा आधुनिक बोध एवं मानवीय संवेदनाओं को यथार्थ के धरातल पर मार्मिकता के साथ प्रस्‍तुत करने वाली कथाकार कादंबरी मेहरा का दूसरा कहानी-संग्रह ‘पथ के फूल' 14 दिसंबंर-2009 को उ0प्र0 हिंदी संस्‍थान, लखनऊ स्‍थित
 
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प्रेम अशक्य (Pyar Impossible) एक चित्रपट समीक्षा ;-)

आज म्हणजे गुरुवार दिनांक १४ जानेवारी रोजी मी हा चित्रपट पहिला. आता हा चित्रपट पाहण्यास कारण काय असे तुम्ही विचारलं (काही लोक येडा झाला का राव!! ह्या टोकाच्या भूमिकेला जातील). पण हा चित्रपट पाहायचा असा चंगच बांधला होता, अहो जरा विचार करा कि उदय चोप्रा
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इंडिया टुडे ने याद किया

इंडिया टुडे पढ़नेवालों के लिए तो नहीं किन्तु उनके लिए जो इंडिया टुडे नहीं पढ़ते या नहीं पढ़ पाते सिर्फ़ उनके लिए । मोह नहीं किन्तु जो छापा है इंडिया टुडे ने अपने 20 जनवरी, 2010 के अंक में उसे पाठकों के समक्ष रखने में क्या बुराई है ! तो लीजिए..... नया
 
जयप्रकाश मानस
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यशवन्‍त कोठारी की फ़िल्म समीक्षा - आलॅ इज वेल -थ्री इडियटस नहीं थ्री जीनियस

चेतन भगत के एक पूर्व उपन्‍यास पर बनी फिल्‍म फ्लाप हो गई थी। इसी भावना को लेकर फाइव पाइन्‍ट सम वन पर आधारित फिल्‍म थ्री इडियटस देखने गये थे। साहित्‍य रचनाओं पर फिल्‍में बनाना वैसे भी बड़ा जोखिम का काम है। मैंने उपन्‍यास के अंग्रेजी व हिन्‍दी संस्‍करण पढ़
 
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जिसकी दुनिया रोज़ बनती है !

हर उस आदमी की एक नहीं कई प्रिय पुस्तकें होती हैं, जो किताबों की दुनिया में रहता है। मैं भी किसी हद तक इस दुनिया में रहता हूँ और ऐसी दस किताबें हैं, जिन्हें मैं `मेरी प्रिय पुस्तक´ कह सकता हूँ। इन दस में पाँच कविता संकलन हैं और इन्हीं में शामिल है आलोक
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गूगल बाबा अब लेकर आए ग्रुप चैट

गूगल टॉक गैजेट पर अब ग्रुप चैट भी गूगल टॉक लंबे समय से हिन्दी चिट्ठाकारों का पसंदीदा मैसेंजर रहा है लेकिन इसमें एक प्रमुख कमी थी कॉन्फ्रैंस सुविधा का अभाव जिसके कारण जरुरत पड़ने पर याहू मैसेंजर आदि का प्रयोग करना पड़ता था। लगता है गूगल ने इस दिशा में क
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गूगल टॉक गैजेट पर एक नजर

गूगल टॉक हिन्दी चिट्ठाकारों का प्रिय मैसेंजर है। अब यदि घर से बाहर किसी अन्य पीसी पर इंटरनैट सर्फ कर रहे हों तो हम लोग अक्सर जीमेल में अंतर्निहित गूगल चैट का प्रयोग करते हैं। लेकिन इसके लिए एक तरीका और भी है - गूगल टॉक गैजेट का प्रयोग गूगल टॉक गैजेट
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स्पष्ट राजनीतिक चेतना की कविताएँ

(यह समीक्षा दैनिक जागरण के पुनर्नवा के लिए लिखी गई थी और जाहिर है इसकी कई सीमाएं भी हैं. अख़बार आपको कम लिखने को कहता है. मैं सोचता हूँ कभी पंकज की कविता पर एक लम्बा लेख लिखूंगा.) बहुत कम उम्र (सबसे कम?) में युवा-कविता का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल
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...तो मध्यप्रदेश में मंत्री मंडल विस्तार के बहाने, नगरीय निकाय चुनावों को साधने की कोशिश कि गई थी : राजनीतिक समीक्षा

प्रियेश कोठारी/पंकज व्यास, रतलाम  लोकसभा चुनाव के बाद काफी इंतजार करवाने के बाद आखिरकार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के नेतृत्व में मध्यप्रदेश मंत्री मंडल का विस्तार भाजपा ने किया, उसके बाद जो परिदृश्य बन रहा है, उससे करीब-करीब सबको समझ में आ जाना चा
 
pankaj vyas
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पत्रकारिता की सामाजिकी

-प्रकाश 'मीडिया में हिस्‍सेदारी' नामक यह पुस्तिका मीडिया के सामाजिक चरित्र, सत्‍ता और पूंजी से उसके संबंधों के साथ उसमें हाशिए के समाजों की भागीदार का तथ्‍यपरक आकलन करती है। विश्‍लेषक प्रमोद रंजन ने आंकडों और प्रमाणों के आधार पर स्‍पष्‍ट किया है कि
 
प्रमोद रंजन
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मीडिया में हिस्‍सेदारी

-पवन प्रकाशपत्रकारिता का समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन है 'मीडिया में हिस्‍सेदारी'। इसमें राइटर प्रमोद रंजन ने पत्रकारिता के नये स्‍वरूप की अपनी व्‍यख्‍या की है। इसमें पत्रकारिता के 150 वर्षों में हुए हर अंतर, चाहे वह टेक्निकल या फिजिकल हो, बताने की कोशिश की
 
प्रमोद रंजन
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मीडिया में हिस्‍सेदारी

पवन प्रकाश पत्रकारिता का समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन है 'मीडिया में हिस्‍सेदारी'। इसमें राइटर प्रमोद रंजन ने पत्रकारिता के नये स्‍वरूप की अपनी व्‍यख्‍या की है। इसमें पत्रकारिता के 150 वर्षों में हुए हर अंतर, चाहे वह टेक्निकल या फिजिकल हो, बताने की कोशिश क
 
प्रमोद रंजन
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यशवन्त कोठारी की पुस्तक समीक्षा – चेतन भगत का उपन्यास टू स्टेट्स – प्रेम कहानी से प्रेम विवाह तक

युवाओं के चहेते उपन्‍यासकार चेतन भगत का ताजा उपन्‍यास ‘ टू स्‍टेट्स' मुझे मेरे बेटे ने भेंट किया, इससे पहले चेतन के तीन उपन्‍यास भी मुझे नई पीढ़ी ने ही पढ़ने को दिये थे। मैंने पढ़े मगर गुण्‍ो नहीं। इधर चेतन ने टू स्‍टेटस ने कुछ टिप्‍स भी दिये हैं। जो
 
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समीक्षा - मेरे मुंह में ख़ाक

मेरे मुंह में खाक्”” मुश्ताक अहमद यूसुफी के उपन्यास का हिन्दी अनुवाद वीरेन्द्र जैन मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब - मेरे मुंह में खाक- के हिन्दी में प्रकाशित होने की सwचना के साथ ही इस बारे में कोई दूसरा विचार नहीं आया सिवाय इसके कि इसे खरीदना है और पढ
 
वीरेन्द्र जैन
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समीक्षा मेरे मुंह में ख़ाक -लेखक मुश्ताक अहमद यूसुफी

मेरे मुंह में खाक्”” मुश्ताक अहमद यूसुफी के उपन्यास का हिन्दी अनुवाद वीरेन्द्र जैन मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब - मेरे मुंह में खाक- के हिन्दी में प्रकाशित होने की सुचना के साथ ही इस बारे में कोई दूसर विचार नहीं आया सिवाय इसके कि इसे खरीदना है और पढन
 
वीरेन्द्र जैन
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हंस में छपा एक पाठक का 'निर्मम पत्र' और उससे उठते सवाल।

             मैं हंस क्यों पढता हूँ ?  क्या हंस सचमुच इतनी अच्छी पत्रिका है ?  क्या मैं इसके ब्रांड नेम से प्रभावित हो उसे खरीदता हूँ ,  या फिर केवल ऑफिस आने-जाने में लगने वाला समय बिताने के लिये ही इसे
 
सतीश पंचम
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हंस के सितंबर अंक में नामवर सिंह रहे राजेन्द्र यादव के निशाने पर । बहुत दमदार रहा सितंबर अंक का संपादकीय ।

      इस बार हंस का संपादकीय पढा तो लगा कि राजेन्द्र यादव ने नामवर सिंह को सही तरह से निशाने पर लिया है औऱ न सिर्फ निशाने पर लिया बल्कि तीर भी जमकर चलाया।  मुद्दा था हंस की गोष्ठी में नामवर सिंह द्वारा अतिथि संपादक अजय नावरिया पर
 
सतीश पंचम