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यह मॉल है या कि अजायबघर है.. ?

पुन: आपका स्वागत है परिकल्पना पर अभी पिछले चरण में रश्मि रविजा जी ने बड़े ही सार्थक और नपे-तुले शब्दों में मॉल संस्कृति के बिभिन्न पहलूओं पर डाला .......परिचर्चा के बाद आईये निखिल आनंद गिरि की एक कविता पर नज़र डालते है जो मॉल संस्कृति पर केन्द्रित है
 
रवीन्द्र प्रभात
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हमारे देश की अधिकाँश जनता की बुनियादी जरूरतें नहीं पूरी हो पातीं

अधिकार प्यार का ..ओ रूपसी,आज तुमने अपनी पर्ण-कुटी के द्वार नहीं खोले,बस भीतर ही खिलखिलाती रही,चिडियों का समूह दानों की प्रतीक्षा में है,जरा खोलो तो द्वार,मैं भी देखूं तुम्हारा आरक्त चेहरा,बिखरे सघन बाल,फ़ैल गए टीकेवाला चेहरा,जानूँ तो सही-किसे ये अधिकार
 
रवीन्द्र प्रभात
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बजट का क्या? देख लेंगे बाद में और फिर क्रेडिट कार्ड किस मर्ज़ की दवा है ?

स्वागत है आपका पुन: परिकल्पना पर चिराग जैन की कविता प्रस्तुति से पूर्व मैं आपको भिन्न-भिन्न चिट्ठाकारों की राय से अवगत करा रही थी विषय था आज की मॉल संस्कृति  सकारत्मक या  नकारात्मक ?==================================================इस बारे
 
रवीन्द्र प्रभात
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सबल और निर्बल के बीच की खाई को और चौड़ा करने की साजिश आज की मॉल संस्कृति

स्वागत है आपका पुन: परिकल्पना पर एक सुन्दर और खुशहाल सह अस्तित्व को मूर्तरूप देने की दिशा में प्रतिबद्ध परिकल्पना ब्लॉग की महत्वपूर्ण सामूहिक पहल यानी ब्लोगोत्सव-२०१० की परिकल्पना
 
रवीन्द्र प्रभात
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उदारीकरण की प्रक्रिया ने हमारे देश में एक नव धनाढ्य मध्यमवर्ग को जन्म दिया है

स्वागत है पुन: आपकापरिकल्पना पर पिछली कड़ी में  मैंने शिखा वार्ष्णेय जी से जानने की कोशिश की कि उनकी नज़रों में मॉल संस्कृति का असर हमारे समाज में सकारात्मक है या नकारात्मक ?आईये मैं इसी परिचर्चा को आगे बढाती हूँ और चलती हूँ वाणी शर्मा जी के पास यह
 
रवीन्द्र प्रभात
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यार ये कैसी है इज्जत कांच की ?

स्वागत है आप सभी का पुन: परिकल्पना पर !विराम से पूर्व मैं  बात कर रही थी  मॉल संस्कृति के बारे में !... हालांकि, सच्चाई यही है कि मौजूदा समय में किराने की दुकानों और शॉपिंग मॉल दोनों में ही अच्छी-खासी खरीदारी हो रही है।
 
रवीन्द्र प्रभात
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ब्लोगोत्सव-२०१० : ..मॉल , यानी.....शोखियों में घोला जाये,फूलों का शबाब

मॉल , यानी.....शोखियों में घोला जाये,फूलों का शबाब,उसमें फिर मिलाई जाये-थोड़ी सी शराब..........दुनिया कहाँ- से- कहाँ आ गई!मॉल जाने का नशा -सा हो चला है,लेबल लगे कपड़े,( एक ही प्रिंट के),डब्बा बंद खाना,कटी सब्जियां ,आधी सिंकी रोटी...किसी भी दिन
 
रवीन्द्र प्रभात