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मिलाने वाली...

घर से दफ्तर.. दफ्तर से घर.. किताबों और टीवी से ऊब चुका हूँ... राजीव से बात नहीं हो पाई है.. संजय से कब मिला था... याद नहीं राकेश की भी कोई ख़बर नहीं... कभी-कभी सोचता हूँ... मैंने पीना क्यों छोड़ दिया ?
 
विवेक वशिष्ठ
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व्रत

निश्चय-बुद्धि ही व्रत है।
 
प्रेमलता पांडे
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अपनी पसंद

जिसको जो पसंद है वह तो वहीं जाएगा। फिर जबरदस्ती काहे ले जाएँ?
 
प्रेमलता पांडे
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हम बड़े !!!

कभी-कभी भाव और विचार गले तक भर जाते हैं तो पलटना चाहो न चाहो पलट ही जाते हैं। ऐसी ही एक उलटन-पलटन।
 
प्रेमलता पांडे
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महिला और समाज

अगर सोच सकारात्मक है तो क्या कुछ बदल नहीं सकता?- समाज, दुनिया और पुरुष सभी कुछ। ज़रुरत बस इच्छा और शक्ति की है कुछ करने की ठानने की है। आओ सब मिलकर दिशा बदल दें सोच की।
 
प्रेमलता पांडे
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ग़म न करो

तेरे दया धर्म नहीं मन में, तो बापू चले गए तेरे मन से!
 
प्रेमलता पांडे
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कुछ इधर-उधर की…

देश, काल और परिस्थियाँ जीवन इतना बदल देती हैं कि विचारों में अंतर की गहरी खाई खुद जाती है।
 
प्रेमलता पांडे