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पाखी

जब नदी किनारे बैठा कोईअंतर्मन को खोजे फंसा कोई हो अंतर्द्वन्द में, राह ना कोई सूझे तने भवें, चेहरा गुस्से से लाल तमतमा जाएमुट्ठी भींचे, दांत पीसकरसूरज को घूरे जाएजब हो हताश, वो हो निराश और दिल घबरा जाए वो हो बेचैन, मन व्याकुल हो पर राह नज़र ना आएतब चुपके
 
रवीन्द्र गोयल्
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मानवता सिखलाएं

बिल्ली कहती म्याऊँ-म्याऊँरुक जा चूहे अब मैं आऊँतुझको मैं खा जाऊँगी अपनी भूख मिटाऊँगीफिर जल्दी से पेड़ पे चढ़केचुपके से सो जाऊँगीचूहा बोला बिल्ली मौसीतुम तो कितनी प्यारी होहमको खाकर क्या पाओगीतुम तो राजदुलारी होहमें मारकर पछताओगीवापस घर कैसे जाओगीजिस राह से
 
रवीन्द्र गोयल्
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रंग

जिंदगी है एक कैनवाससपने हैं रंगख्वाहिशों की ऊंचाईयांहक़ीकत की जंगबहुत हंसी है हर पलक्योंकि तुम हो मेरे संगतुम सांसों में, तुम धड़कन मेंतुम आंखों में, तुम ही मन मेंतुम सुबह में, तुम शामों मेंतुम बातों मे, तुम रातों मेंतुम ही तो हो जज्बातों में, तुम गीत हो,
 
रवीन्द्र गोयल्
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फुलकारी

हर वक्त मुनासिब होता हैमंज़र मनमाफ़िक होता हैबढ़ने वाले कब रुकते हैंमुश्किल जीवन का सौदा हैसुख पल दो पल का धोखा हैजो उठता है और लडता है ये वक्त उसी का होता हैलक्ष्य वही हासिल करता हैजो पहला कदम बढ़ता हैडरपोक किनारे रहता हैतैराक नदी तर जाता हैदिल बाग-बाग हो
 
रवीन्द्र गोयल्