पाखी
जब नदी किनारे बैठा कोईअंतर्मन को खोजे फंसा कोई हो अंतर्द्वन्द में, राह ना कोई सूझे तने भवें, चेहरा गुस्से से लाल तमतमा जाएमुट्ठी भींचे, दांत पीसकरसूरज को घूरे जाएजब हो हताश, वो हो निराश और दिल घबरा जाए वो हो बेचैन, मन व्याकुल हो पर राह नज़र ना आएतब चुपके
Apr 28 2010 10:37 AM



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