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एक सच ये भी .....

हम किसी भी वस्तु विशेष को कब जानना चाहते हैं? कब किसी कि तरफ हमारा आकर्षण बढ़ता है और हम उसके तरफ खींचे चले जाते है? ये बहुत ही साधारण से सवाल हैं परन्तु क्या इनके जबाब भी इतने ही साधारण हैं, वैसे तो हाँ कह कर सीधे – सीधे कहा जा सकता है कि जब कोई किसी
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झूठ के पांव

झूठ के पांवझूठ के पांव निकलते देखा है सच पे सवार होते देखा है कान्हा की आड़ में, लीला का नाम ले, कदाचार देखा है पवनसुतों के सीने में,व्याभिचार देखा है मर्यादा पुरुशोत्तमों को करते, भ्रष्टाचार देखा हैअपनी आयु लीलने को, जानकी को लाचार देखा है दूर
 
रचना दीक्षित
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धन तेरस

क्यों खफा हो ...मुझसे ....., पिछले धन तेरस में ....., सोने की करधनी तो ली थी ...., इस बार वो कह रही ......, हीरों का नेक्लेश लूँगी ॥ ...जुगाड़ के जुए में ....., धन तेरस को जेब कट गई । सब कुछ हारा ....पर एक रात के लिए ॥ उसकी पत्नी जीत गया .... देर रात
 
भंगार
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सच के साईड इफेक्ट्स

पिछले कुछ दिनों से न्यूज़ चैनल "सच का सामना"रियलिटी शो को बंद करवाने के लिए मचे बवाल के न्यूज़ से भरा रहा...आखिरकार इसे जारी रखने की मान्यता मिल ही गई.....सोचने की बात तो ये है कि क्या ये इतना बड़ा मुद्दा था...जिसे मंत्रालय में उठाया गया...?.....देखा जाए
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यह कैसा सच! और किसका सच?

वाह भई वाह! गांधी जी ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उनके द्वारा सच के पक्ष में की गई बातें किस तरह कुतर्क बन जाएंगीं. वाह! सब जैसा चल रहा है उसे चलने दो, कोई नंगा हो कर सरे आम घूमें अपनी नंगई को अपनी पहलवानी और बहादुरी बता कर खुद ही तमगे बांध ले. और समाज
 
योगेश समदर्शी
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