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कैसा था वो पहला प्‍यार ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,नीशू तिवारी

बहुत दिन नहीं हुआ जॉब करते हुए .....पर अच्छा लगता है खुद को व्यस्त रखना........शाम की कालिमा अब सूरज की लालिमा को कम कर रही थी ......मैं चुप चाप तकिये में मुह धसाए बहार उड़ रही धुल में अपनी मन चाही आकृति बना कर ( कल्पनाओं में ) खुश हो रहा था .........कभी
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बिन-गौना हुए पर्स में रखी पत्नी की तस्वीर, घाटकोपर स्टेशन, बोल राधा बोल के अनूठे संस्मरण के साथ एक रापचीक अल्हड़पन ...........सतीश पंचम

        क्या कभी आपका कोई चोरी हुआ सामान वापस चोर ने लाकर रख दिया है ?  कुछ भी….चोरी हुआ  सामान जैसे…. मोबाईल, घडी, उस्तरा, छेनी, हथौडी……कुछ भी ?     क्या कहा ? संभावना
 
सतीश पंचम
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ऋषि जैमिनी कौशिक ‘बरूआ’ का संस्मरण - बने यूँ श्री बच्चन जी : प्रातः स्मरणीय!

सुबह सुबह फ़्लश की जंजीर के साथ, हिंदी साहित्य के परम प्रिय गायक और गीतकार श्री हरिवंश राय ‘बच्चन’ जी का याद आना उसी तरह की घटना समझे जैसे तो किसी यज्ञ के समय ताम्बूल पत्र के ऊपर अनुपस्थित पुंगीफल की बात पंडित जी महाराज को सहसा ही याद आ जाए! पढ़िये यह
 
Raviratlami
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पाज़ के बटन

उन्होने मुझसे कहा था " दो शेरों की बहन किसी चीज की चिंता नही करती"उस सड़क छाप बैद्य ने जब जाने कौन कौन सी दवा बता कर कहा था कि ये ६ महीने में दौड़ने लगेगी तो मैने रो कर विरोध किया था कि "मुझे तमाशा मत बनाओ, ये कुछ नही कर पायेगा।" और उन्होनेसमझा के कहा था।
 
कंचन सिंह चौहान
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रजिया मिर्ज़ा का संस्मरण : सलाम एक ग़रीब की महानता को

अम्मी को “केंन्सर’ होने की वजह से अम्मी को लेकर मुझे बारबार रेडीएशन के लिये बडौदा ओंकोलोजी डिपार्टमेंन्ट में जाना होता था। शरीर के अलग अलग हिस्सों के “केन्सर” से जूजते लोग और उनकी मृत्यु को थोडा दूर ले जाने कि कोशिश करते उनके रिश्तेदारों से मिलना लगा
 
रवीन्द्र प्रभात
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हरीश चंदर : झुग्गी नं. 208 से निकला आईएएस

  दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले दिहाड़ी मजदूर के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में तय किया आईएएस का सफर। यह कहानी है एक जिद की, यह दास्तां है एक जुनून की, यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की। यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी
 
Raviratlami
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हम आपको तकलीफ देना नहीं चाहते

जावेद साहब अपने किसी काम से बेंगलोर आये हुए थे। उम्मीद कर रहा था कि आजकल में मुझसे मिलने आयेंगे। फोन करके उन्होंने बताया कि वे कल का लंच मेरे साथ करेंगे क्यों कि लंच के बाद ही उन्हें ट्रेन पकड़नी है। नहीं तो मिलना नहीं हो पायेगा। मैंने कहा कि आप आइए। लंच
 
मथुरा कलौनी
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“अब भी बाकी है, आशा की एक किरण” (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक)

पिछले कई वर्षों से मैं दो-मंजिले पर रहता हूँ। मेरे कमरे में तीन रोशनदान हैं। उनमें जंगली कबूतर रहने लगे थे। वहीं पर वो अण्डे भी देते थे, परन्तु कानिश पर जगह कम होने के कारण अण्डे नीचे गिर कर फूट जाते थे। मुझे यह अच्छा नही लगता था। एक दिन कुछ फर्नीचर
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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" दाने-दाने पर ............................................................

इन दिनों अपनी बहन के नए मकान के वास्तुपूजन के लिए नासिक आई हूँ.........अभी फ़्लेट में बहन के परिवार के अलावा कोई रहने नहीं आया है ..........." कामवाली बाई " जो उसके पुराने मकान में काम करती थी, नए मकान में भी काम करना चाहती थी, मगर घर ज्यादा दूर होने से आ
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'भगवान् ने एक इमरोज़ बनाकर सांचा ही तोड़ दिया : सरस्वती प्रसाद

इमरोज़ !यानि - आज रब की दें इबादत में सर झुक जाता है !इमरोज़ !ओस नहाई भोर या पूनम की रात ...कोई इतना सहज, सरल ,पारदर्शी हो सकता है-यह सुबह,शाम,उनके बारे में सुनते हुए जानाइमरोज़ !प्यार के बेमिसाल स्तम्भमधुरतम भावनाओं की सच्चाई हैं-स्फटिक की तरह...अमृता
 
रवीन्द्र प्रभात
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संस्मरण स्मृति शेष जब्बार ढाकवाला

संस्मरणमेरा दोस्त जब्बार ढाकवालावीरेन्द्र जैन्मैं कह नहीं सकता कि कैसे हम लोगों का परिचय दोस्ती में और दोस्ती से उस रिश्ते में बदल गया जिसे खून के रिश्ते से भी बड़ा रिश्ता कहा जाता है। सिलसिलेवार याद करने पर कुछ कड़ियाँ जुड़ती नज़र आती हैं।बात 1994 से शुरू
 
वीरेन्द्र जैन
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आज ब्लोगजगत को उत्सव परंपरा निभाने की बहुत जरूरत है : अजय कुमार झा

मैं समय हूँ !"परिकल्पना परिकल्पना की दे अमित आनंद.मिलें शतदल कमल से हम, गुँजा स्नेहिल छंद..रचें चिट्ठों का अभी मिल, नया ही संसार.बात हो केवल सृजन की, सब तजें तकरार..गोमती से नर्मदा मिल, रचे नव इतिहास.हर अधर पर हास हो, हर ह्रदय में हो प्यास.. "उत्सव के
 
रवीन्द्र प्रभात
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यशवन्त कोठारी का संस्मरण : मेरी षष्टिपूर्ति - बकलम खुद

आखिर गिरते पड़ते जीवन का साठवां वसन्त या पतझड़ आ पहुँचा। सोचता था सन्दर्भ, प्रसंगवश या अभिनन्दन करा लूं। मगर नहीं हो पाया। वर्षों पहले धर्मयुग ने पण्डित गोपाल प्रसाद व्यास से पूछा था षष्टिपूर्ति पर कैसा लगता है। मस्तमौला व्यास जी ने लिखा था-साठ के है, नहीं
 
Raviratlami
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संस्मरण- स्मृति शेष मुनीन्द्रजी

संस्मरण स्मृति शेष मुनीन्द्रजी- जो पौधों को सींचना जानते थे वीरेन्द्र जैन दक्षिण समाचार के ताज़ा अंक से ही मालूम हो सका के गत 16 अप्रैल को मुनीन्द्रजी नहीं रहे। मेरे मन में बचपन से ही एक साहित्यकार-पत्रकार बनने का सपना पलता रहा था किंतु इस काम के
 
वीरेन्द्र जैन
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आठवीं रचना ( डा श्याम गुप्त )

कमलेश जी की यह आठवीं रचना थी | अब तक वे दो महाकाव्य, दो खंड काव्य व तीन काव्य संग्रह लिख चुके थे | जैसे तैसे स्वयं खर्च करके छपवा भी चुके थे | पर अब तक किसी लाभ से बंचित ही थे | आर्थिक लाभ की अधिक चाह भी नहीं रही| जहां भी जाते प्रकाशक, बुक सेलर ,वेंडर,
 
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नन्हें फूल- रोज़ ही एक नया मज़ेदार कि़स्सा.....(संस्मरण).....मनोशी जी

"अब के इस मौसम में नन्हेंफूलों से महकी गलियाँ हैं"इस शेर को जब लिखा था तो वो प्यारे-प्यारे, छोटे-छोटे बच्चे थे दिमाग़ में, जिन्हें पढ़ाने का मौक़ा मिला है इस साल। कक्षा किंडर्गार्टन से कक्षा दूसरी तक के बच्चे, ४ - ७ साल तक के।शुरुआत में बड़ी परेशानी होती थी।
 
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....गांव की कुछ यादें

आज अजय कुमार झा जी की पोस्ट पढ़ रही थी, पढ़ते-पढ़ते अपना गाँव बहुत-बहुत याद आने लगा.हमारा गाँव इसलिए क्योंकि वहां हमारे दादा-परदादा रहे. पुश्तैनी मकान, ज़मीन सब वहीं है. ये अलग बात है, कि हमें गाँव में रहने का मौका केवल छुट्टियों में मिलता था, वो भी तब
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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संस्मरण : जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

आदरणीय श्री चंद्रजी / गुप्त जी, आपका लेख पढ़ते ही मैंने अपनी मम्मी को फोन लगाया और आपके बारे में पूछा...तो ज़िक्र दाल-बाटी का, आप सब दोस्तों की महफ़िल का और आपकी पत्नी के कर्मठ स्वभाव का हुआ....स्वर्गीय श्री ओम प्रकाश शर्माजी मेरे नानाजी एक महान लेखक ही
 
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रोयीं आँखें मगर..५(अंतिम)

sansmaran Tuesday, March 10, 2009रोई आँखें मगर.....५ मेरे ब्याह्के कई वर्षों बाद एक बार मैं अपने मायके आई थी कुछ दिनोके लिए। शयनकक्ष से बाहर निकली तो देखा बैठक मे दादाजी के साथ एक सज्जन बैठे हुए थे। दादा ने झट से कहा,"बेटा, इन्हे प्रणाम करो!'मैंने किया
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उसका खजाना ....

इसे आप संस्मरण कह लीजिए या कोई कहानी पर है ये आपबीती ................मेरे लिए इस घटना के मायने अलग है ..........ये वो घटना है ,जिससे मेरे सोचने का तरीका बदला है ...............बात उन दिनों की है जब मै और मेरी बेटी नागपूर गए थे ..............और ट्रेन में
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इमरोज:एक दुनिया प्यार की

"तुझ में शामिल होकर ही, लम्हा-लम्हा जीता हूँ जिन्दगी " इमरोज जी से मिलना हुआ,कुछ दिनों पहलेपर आज भी सब वैसा ही टटका और ताजा है पहले से कोई परिचय नही था,लेकिन मिलने के लिए समय इस तरह से दे दिया कि लगा कोई पुरानी परिचिता हूँ जो जब चाहे तब आ जायेमन को भा
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तुम, मैं...और हमारी असल सूरतें...........अनिल कान्त जी

सुनो आँखें बंद करो...क्यों...अरे बंद करो ना...पहले बताओ फिर...आँखें बंद करने पर मैं तुम्हें कहीं ले चलूँगा...कहाँ...ओह हो...कहता हुआ मैं उसकी आँखों पर अपनी नर्म हथेलियाँ रख देता हूँ...मैं तुम्हें अपनी फेवरेट जगह ले जा रहा हूँ अपने घर के पीछे का दरवाजा
 
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अलीबाग का समुद्रतट ..............................घुघूती बासूती

होली के समय चार दिन को बड़ी बिटिया व उसका पति यहाँ आए। बच्चे जब घर आते हैं तो जीवन भी घर आता है। हम लोग होली से अगले दिन अलीबाग घूमने गए। सारा रास्ता प्राकृतिक सौन्दर्य से भरा हुआ था। मुम्बई के पेड़ों व जंगली उगे पेड़ों को देखकर यही लगता है कि यहाँ का
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रोई आँखे मगर....3

मुझे गर्मियोंकी छुट्टी की वो लम्बी-लम्बी दोपहारियाँ याद है, जब हम बच्चे ठंडक ढूँढ नेके लिए पलंगके नीचे गीला कपड़ा फेरकर लेटते थे। कभी कोई कहानीकी किताब लेकर तो कभी ऐसेही शून्यमे तकते हुए। चार साढे चार बजनेका इंतज़ार करते हुए जब हमे बाहर निकलनेकी इजाज़त
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संस्मरण तिलक ब्रिज के...

बात उन दिनों की है जब अपन पत्रकारिता की पढाई पूरी करके नौकरी ढूँढने के अभियान पर थे. हमारे कॉलेज ने एडमिशन के समय जो वादे किये थे वो कोर्स ख़तम होते-होते धराशायी होते नज़र आये. अंततः अपनी क्लास का हर शख्स सड़क पर था, या फिर कुछ ने हायर एजुकेशन के
 
Sachin Rathore
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नानी की कहानी.............( संस्मरण) .......पस्तुति - दिव्या पांडे जी

मेरी नानी बहुत प्यारी थी ....वो सभी को प्यार करती थी ...क्या लिखूं उनके बारे में ...शब्द नहीं है मेरे पास ...अब वो नहीं हैं ....बहुत याद आती है उनकी....उनसे मिलना बस गर्मियों की छुट्टियों में ही हो पाता था ... उनके बारे में ज्यादा तो मम्मी से ही जानने को
 
हिन्दी साहित्य मंच
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“पिता जी को पड़पोते ने साबुन मलकर नहलाया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज का बिल्कुल ताजा संस्मरण पोस्ट कर रहा हूँ!मेरे पिता जी की आयु इस समय 90 वर्ष की है। इस उम्र में भी वे अपने दैनिक कार्य स्वयं ही करते हैं। यों तो उनके लिए निचली मंजिल पर भी स्नानगृह बना है। मगर उसमें गीजर नही लगा है। इसलिए पूरे जाड़ों-भर वह प्रति दिन
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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भगत सिंह की जेल नोटबुक से...........

    शहीदी दिवस पर भारत माता के वीर पुत्रों के चरणों में कोटि-कोटि नमन  पृष्ट २७ पर लिखे हुए शेरदिल दे तू इस मिजाज का परवरदिगार देजो ग़म की घड़ी को भी ख़ुशी से गुजार दे  ________________________________सजा कर मय्यत-ए-उम्मीद 
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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दीनदयाल शर्मा : बहुमुखी प्रतिभा के धनी, लेखक-संपादक-शिक्षाविद पर साहित्यकारों-विद्यार्थियों के कुछ संस्मरण

राजस्थानी पर्व "गणगौर "   को दीनदयाल शर्मा के जन्मदिन पर कुछ लेखक मित्रों ने उन पर संस्मरणात्मक आलेख लिखें हैं - प्रखर व्यक्तित्व के धनी: दीनदयाल शर्मा मझली कद काठी, सरल लेकिन सुग्राही दृष्टि के सामान्य चेहरा लेकिन तीक्ष्ण बुद्धि के
 
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राजेश कुमार मिश्र का यात्रा संस्मरण : प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतिमान - सिक्किम

(सिक्किम का गुरूडोंगमार झील) प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतिमान :सिक्किम प्रस्तुति – डॉ0 राजेश कुमार मिश्र मन को आह्लादित करने की असीम क्षमता यदि किसी के पास है,तो वह है-प्रकृति का विराट् सौंदर्य। सौभाग्यशाली व्यक्तियों को ही प्रकृति की गोद में पहुंचकर
 
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.......यादें स्कूल की जो आज भी ताजा हैं .......( यशवंत मेहता "फ़कीरा")

हर विद्यार्थी को अपने विद्यालय से लगाव होता हैं और जब वो अपनी शिक्षा पूरी कर विद्यालय छोड़ता हैं तो यह लगाव प्रेम में बदल जाता हैं. वो शिक्षको की डांट-फटकार जिसके कारण विद्यार्थी जीवन में आसूं निकल आते थें वही डांट-फटकार मीठी लगने लगती हैं. दोस्तों के
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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संजय जनागल का संस्मरण : यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र

प्रथम पुण्‍यतिथि 4 मार्च पर! आज भी याद आते हैं चन्‍द्र जी ! - संजय जनागल   आदरणीय चन्‍द्र जी की रचनाएं पढ़ता रहा था वर्षों से। पढ़ने की रूचि थी...पाठ्‌यपुस्‍तकों में भी उनकी कहानियाँ पढ़ी। सामान्‍य ज्ञान की पुस्‍तकों में भी उनका नाम पढ़ता रहा था
 
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गली में आज चाँद निकला

सबकी तरह मैं भी माँ से कहानियाँ सुनते बड़ी हुई। उन कहानियों के विषय अधिकतर देशभक्ति के हुआ करते थे। राणा प्रताप का राष्ट्र प्रेम से मौत तक समझौता ना करना। उनकी बच्ची का कहना वो कौन शत्रु है जिसने, हम सब को वनवास दिया है एक छोटी सी पैनी सी तलवार मुझे भी दे
 
कंचन सिंह चौहान
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छत्तीसगढ़ यात्रा : भाग १

इस बार की होली मजेदार रही . दरअसल हुआ यों कि भिलाई स्टील प्लांट भिलाई के वार्षिक कविसम्मेलन का निमंत्रण था . प्लांट अधिकारी श्री  दीपक खरे जी के बुलावे पर श्री प्रदीप चौबे (ग्वालियर), श्री सांड नर्सिंघपुरी (नरसिंह पुर) श्री शशि कान्त यादव (विदिशा)
 
योगेन्द्र मौदगिल
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पूर्वजों की रीत हूँ मैं....

होली की शुभ-कामनाएं और ईद-मिलाद-उल-नवी का मुबारकबाद ! कल सायं से ही मुझे अपनी एक कविता की अन्त्य-पंक्तियाँ "भूल बैठे सब जिसे वह पूर्वजों की रीत हूँ मैं....." याद आ रही है। कविता मैं इस ब्लॉग पर प्रकाशित कर चुका हूँ।क्रूर काल का ग्रास हूँ !किन्तु अमित
 
करण समस्तीपुरी
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तुम्हारा एक गुमनाम ख़त .........अनिल कांत जी

कभी जो उड़ती थी हवाओं के साथ तेरी जुल्फें तो हवा भी महक जाया करती थीअब तो साँस लेना भी गुनाह सा लगता हैयाद है ना तुम्हे ...जब उस शाम रूमानी मौसम में ....चन्द गिरती बूंदों तले .... और उस पर वो ठंडी ठंडी सर्द हवा .....कैसे तुम्हारी जुल्फें लहरा रही थीं
 
हिन्दी साहित्य मंच
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बड़े मियां ने बचा लिया नहीं तो हम निम्बू पानी पी जातें ---- (यशवंत मेहता)

जौंक कहते हैं न"क्या-क्या मजा ने तेरे सितम का उठा लिया  हमने भी लुफ्ते-ज़िन्दगी अच्छा उठा लिया"  तो जनाब हमने भी बोर्ड परीक्षा के सितम उठाये, दिन रात कमरे में बंद रहे , फ़ोन और गेम्स उठवाकर दूसरे कमरे में रखवा दिए. हमारे वालिद साहब हमसे
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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वे सीलोन के दिन, उर्दू सर्विस की रातें......

कुछ दिन हुए, आकाशवाणी रीवा से तनुजा दी का फोन आया कि तुम्हारा फीचर रि- ब्रॉडकास्ट हो रहा है सुन लो. दरअसल एडिटिंग के बाद मैं अपने इस फीचर को सुन ही नहीं पाई थी. पहली बार जब प्रसारित हुआ तब भी नहीं सुन पाई थी. लेकिन हाय री किस्मत!! आज लाईट नहीं थी. और घर
 
वन्दना अवस्थी दुबे
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अच्छा व्यक्ति -------- पहली कहानी और मैं बन गया "घोस्ट राईटर" (यशवंत मेहता)

मैं जब 9-10 वर्ष का था तब मैंने अपनी पहली कहानी लिखी थी. मैंने यह कहानी लिखकर मम्मी को दी तो उन्होंने विभागीय पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए दे दी. पत्रिका में विभाग के लोगो का साहित्य प्रकाशित होता था सो मम्मी को मजबूरन कहानी में अपना नाम देना पड़ा और
 
यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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...वो पहली पप्पी बचपन के अनिल कपूर की.....(यशवंत मेहता)....

बचपन मुक्त होता है, चिन्ता से, कोलाहल से। बचपन उन्मुक्त होता है, जैसे जैसे हम बचपन से बाहर निकलते है वो आजादी कहाँ खो जाती है, कोई नहीं जानता। इसी आजादी में दिवाना बन मैं गलियों में टायर घुमाता फ़िरता था, कन्चें खेलता था। एक छ्त से दुसरी छत, पतंग लुटने
 
यशवन्त मेहता "सन्नी"