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सास गारी देवे...

दिल्ली-६ का गाना सास गारी देवे...तो आपको याद होगा ही। एक बार फिर ये गाना सुर्खियों में है। लेकिन इस बार इसको पब्लिसिटी प्रादेशिक फिल्म की वजह से मिल रही है। जैसा कि आपको पता है कि ये गाना एक लोकगीत है और ये छत्तीसगढ़ की संस्कृति से जुड़ा है। अब ये गाना
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गजनी, गजनवी और गजराज

मुहम्मद गोरी जो खुद भी सेलजुक तुर्क था यानी वह महान हिन्दू राजा गज के नाम पर चले तुर्कों के एक वंश का प्रतिनिधि था जो नए धर्म की खातिर अपनी वंश परम्परा भूलकर, अपनों की ही धर्म, संस्कृति और सभ्यता को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए बार बार पसीना बहाता रहा… भारत
 
अजित वडनेरकर
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हाल कैसा है जनाब का!!

भा षा लगातार परिवर्तित होती है। यह बदलाव एक भाषा पर दूसरी भाषा के शब्दों की आमद के जरिए भी होता है और प्रभावशाली भाषा के भाषिक संस्कार अपना लेने से भी होता है। इसके अंतर्गत किसी एक भाषा बोली पर लम्बे समय तक सम्पर्क होने की वजह से एक भाषा के व्याकरण नियम
 
अजित वडनेरकर
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आलूबड़ा और बड़ का पेड़…

भा रतीय शैली के व्यंजनों में एक बेहद आम शब्द है-बड़ा। उत्तर भारत में यह बड़ा के रूप में प्रचलित है तो दक्षिण भारत में यह वड़ा कहलाता है। इसके वडा और वड़ी रूप भी प्रचलित हैं। इस नाम वाले कितने ही खाद्य पदार्थ प्रचलित हैं मसलन मिर्चीबड़ा, भाजीबड़ा,
 
अजित वडनेरकर
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इखि ई पिरथिमा ये हि जलम मां

नरेन्द्र सिंह नेगी जी द्वारा गाये बहुत से गाने ऐसे है जिनमें उपमायें, भाव पूरी तरह से नये तरीके हैं। कुछ गाने आप पहले भी सुन चुके हैं जैसे रोग पुराणु कटे ज़िन्दगी नई ह्वैगे, तेरु मुल – मुल हैंसुणु दवाई ह्वैगे या फिर त्यारा रूप कि झौल मां, नौंणी सी ज्यू
 
प्रबंधक
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उपाय, निरुपाय और जूतमपैजार

आज के दौर में निरुपाय लोग शत्रु के साथ सरेआम जूतमपैजार पर उतर आते हैं। अब कौटिल्य की कूटनीति तो राजा-रईसों के लिए थी, गरीब मजलूमों का उपायचतुष्टय तो हर रोज बदलता है। त रकीब अथवा युक्ति के अर्थ में उपाय शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है। उपाय बना है
 
अजित वडनेरकर
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साँस छिन आस-औलाद तुमारी हमारी डाली – झम्म

उत्तराखंडी लोक गायक पर्यावरण को बचाने, पेड़ों को ना काटने का संदेश देते हुए लोकगीत गाते रहे हैं। ऐसे ही कुछ गीत हम पहले ही आपको सुना चुके हैं जैसे आवा दिदा भुलौं आवा, नांग धारति की ढकावा , डाळि बनबनी लगावा या डाल्यूं ना काटा चुचो डाल्यूं ना काटा, या फिर
 
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अंतर्धान हुआ अंतर्यामी…

पिछली कड़ी-अंदरखाने की बात और भितरघात सं स्कृत का अंतर शब्द बड़ा करामाती है। इससे बने अंतर्धान और अंतर्यामी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होते हैं। इन दोनों शब्दों में अंतर की महिमा झलक रही है। इन पर बात करने से पहले इस अंतर को कुछ और जान लें जिसका अर्थ मूलतः
 
अजित वडनेरकर
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धार मां कु गेणुं पार देख ऐ गे

इस साइट पर आप इससे पहले नरेन्द्र सिंह नेगी जी का गाना “मुल-मुल कैकु हैंसणि छै तू” सुन चुके हैं, जिसमें एक युवती जंगलों के पौधों को अपना मित्र मानते हुए उनसे अपने दिन की बात कह रही है। इसी तरह जंगलों में अपने मवेशियों को चराने गये दल के एक
 
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संत कबीर के दोहे-शब्द का महत्व चुंबक के समान

सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देयबिना समझै शब्द गहे, कछु न लोहा लेयसंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सुनकर कुछ सीखता और उस पर विचार करता है उसे वह सुख प्रदान करते हैं। बिना सोचे समझे ग्रहण कर बोलने वाला व्यक्ति कोई लाभ नहीं ले पाता। यही
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संत कबीर दर्शन-बाहर का दरवाजा बंद कर, अन्दर का खोलो (andar ka darvaja kholo-kabir darshan)

भारत के महान संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं------------------------------------------------------ सुमिरन सुरति लगाय के, मुख ते कछु न बोल बाहर के पट देय के, अंतर के पट खोल मन का एकाग्र और वाणी पर नियंत्रण करते हुए परमात्मा का स्मरण करो। आपनी बाह्य
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रहीम संदेश-जहां छल की संभावना हो वहां से दूर रहें

कविवर रहीम कहते हैं किरहिमन वहां न आइए, जहां कपट को हेतहम तन ढारत ढेकुली, सींचत अपनो खेतवहां कतई न जाईये जहां कपट होने की संभावना है। रात भर ढेंकली कोई किसान चलाता रहे पर कोई कपटी उसके खेत का पानी अपनी खेत की तरफ कर ले ऐसा भी होता है।वर्तमान संदर्भ में
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संस्कृति का विश्लेषण

संस्कृति बतौर संघर्ष-स्थलके एन पणिक्कर चित्र यहां से साभार(यह आलेख-अंश कन्नूर विश्वविद्यालय, केरल में 28 से 30 दिसम्बर 2008 के दौरान हुए भारतीय इतिहास परिषद के 69 वें अधिवेशन में दिए गए अध्यक्षीय भाषण पर आधारित है और इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, खण्ड
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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मां तुझे सलाम

दुनिया ही क्या समूची सृष्टि में मां को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। पशु-पक्षी जगत से लेकर मानव जगत में मां की महिमा अपरंपार है। सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को जन्म देने वाली मां को विश्‍व की समस्त संस्कृतियों में सबसे बड़ा दर्जा दिया गया है। भारत में तो मातृ
 
प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi
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घाघरी का घेर, ब्योलि बौ-सैमन्या बौ

प्रस्तुत गाना नेगी जी के लोकप्रिय गानों में से एक है। बारात में आया हुआ एक युवक (देवर) अपनी होने वाली भाभी (दुल्हन) के साथ सामान्य परिचय व हल्की-फुल्की मजाक कर रहा है। ऐसे ही काल्पनिक संवाद के आधार पर यह गाना बना है। देवर अपनी भाभी के साथ परिचय बढाना चाह
 
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आस्था का अखाड़ा और दशनामी-1

  उ त्सवों और पर्वों के लिए ख्यात भारतीय संस्कृति में चार माह तक चलनेवाला कुम्भ पर्व सदियों से भक्ति और आस्था का परम प्रतीक बना हुआ है। देश के चार प्रमुख तीर्थों पर बारह वर्ष के अंतराल पर यह विराट आयोजन होता है। प्राचीनकाल में देश के करोड़ों
 
अजित वडनेरकर
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झांकिए इस एलबम में

"एलबम में भी है जो बना है लैटिन के एल्बस elbus से जो इसी मूल से निकला है और जिसमें शुभ्रता का भाव है। एल्ब का एक अर्थ चर्च में पहना जाने वाला सफेद चोगा भी होता है। एल्बस से बने लैटिन के एलबम का अर्थ था सफेद या शुभ्र।. अंग्रेजी के रास्ते हिन्दी में
 
अजित वडनेरकर
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सांस्कृतिक आतंकवाद तो हम लोग ही पैदा कर रहे हैं...

देश की वो समस्याएँ जो सभी को दिखाई दे रहीं हैं उनका तो निदान दिख नहीं रहा और इसके बीच हमारा दिमाग दूसरे प्रकार की समस्या को देखने में लगा है। वैसे भी समाज के प्रति जो भी कुछ थोड़ा सा भी कर्तव्य समझता होगा उसको प्रतिदिन किसी न किसी समस्या से रूबरू होना
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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एक गरीब की दास्तान…

नि र्धनता, विपन्नता के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित शब्द हैं गरीबी और गरीब। गरीबी रेखा जैसा शब्द युग्म आज की भौतिकवादी संस्कृति की सबसे जरूरी राजनीतिक आर्थिक टर्म बन चुका है और इसमें मुहावरे की अर्थवत्ता समा गई है। गरीबी एक बीमारी है, गरीबी अभिशाप है,
 
अजित वडनेरकर
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तुम भी सूणां मिन सुणियाली, गढ़वाल ना कुमौं जालि

असली लोककलाकार वही है जो जनता की भावना को अपनी कला के माध्यम से प्रसारित करे। सच्चे कलाकार का यह दायित्व नरेन्द्र सिंह नेगी जी सदैव निभाते रहे हैं। पहाड़ की जनता के दुखदर्द और उनकी अपेक्षाओं को अपने गीतों के माध्यम से समाज के बीच रखने का उन्होने हमेशा
 
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गरा रा रा ऐगे रे बरखा झुकि ऐगे

नरेन्द्र सिंह नेगी द्वारा गाये गये सभी गीतों में इस गाने की एक विशेष पहचान है। नेगी जी ने इस गाने के माध्यम से यह सजीव दृश्य सामने रखा है कि एक छोटे से गांव में अप्रत्याशित रूप से बारिश की बूंदे गिरने लगे तो सामान्य जीवन किस तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है।
 
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रंग नीलु उंचा अगास को – दिखैंणा कुई नीलु

नरेन्द्र सिंह नेगी के गानों में कोमल मानवीय भावनाएं तथा जीवन का सार अन्तर्निहित रहता है। यह सुन्दर गाना देखिये-एक युवक किसी अत्यन्त सुन्दर युवती से कुछ सवाल पूछ रहा है। सामान्य रूप से देखने पर इस गाने के बोल प्रेमी द्वारा प्रेमिका को रिझाने के लिये बोले
 
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एक लोक गायक का गीत राजस्थानी लोकवाद्य रावणहत्था के साथ

रावण हत्था राजस्थान का एक लोक वाद्य है जो बांस के एक तने पर नारियल के खोल, चमड़े की मँढ़ाई और तारों की सहायता से निर्मित किया जाता है। पश्चिमी राजस्थान के पर्यटन स्थलों पर इस वाद्य को बजाने वाले आप को आम तौर पर मिल जाएंगे। लेकिन इस वाद्य की संगत में गाने
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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चरस, रहंट और घट्टी

अ नाज पीसने की चक्की को घट्टी भी कहा जाता है। यह बना है संस्कृत के अरघट्ट से जिसका मतलब भी घूमना, चक्कर लगाना, गोल पहिया आदि है। अरघट्ट बना है अरः+घट्टकः से। अरः का अर्थ है नुकीले दांतोवाला पहिया। अरः बना है ऋ धातु से जिसमें घूमना, परिक्रमा, चक्रण, जाना,
 
अजित वडनेरकर
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सात समौंदर पार च जाणा ब्वै, जाज मां जोंलु कि ना

नरेन्द्र सिंह नेगी जी के अधिकांश गीत पारम्परिक लोकसंगीत की विभिन्न विधाओं पर आधारित होते हैं। प्रस्तुत लोकगीत "खुदेड़ गीत" का एक बेहतरीन उदाहरण है। "खुदेड़ गीत" उत्तराखण्ड के विरह वेदना, स्मृति और वियोग से भरे पारम्परिक गीत हैं। (खुद+एड़,
 
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[नाम पुराण-5] घाटी, घटाटोप, दुर्घटना और जमघट

...घाट या घाटी से जुड़े कई स्थान नाम हमारे आसपास मौजूद हैं जैसे उत्तराखण्ड में फूलों की घाटी या राजस्थान में हल्दी घाटी... बा दल या मेघ के लिए घटा शब्द भी प्रचलित है। शृंगार गीतों में घटा, काली घटा शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। यहां भी मिलन का भाव ही है।
 
अजित वडनेरकर
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[नाम पुराण-4] एक घटिया सी, घाटे की शब्द-चर्चा

पिछली कड़ियां-A.[नामपुराण-1]B.[नामपुराण-2]c.[नामपुराण-3] न दी-तटीय बस्तियों के साथ घाट शब्द का प्रयोग भी बहुधा मिलता है। ये घाट सिर्फ स्नान घाट नहीं थे बल्कि इनका अर्थ भी समृद्ध व्यापारिक केंद्र से ही था। गवरी घाट, कालीघाट आदि। हिन्दी मे प्रचलित घाट ghat
 
अजित वडनेरकर
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उदाहरण स्वरूप अपहरण और मनहरण

... उदाहरणम् का अर्थ है दृष्टांत देना, वर्णन करना, परिचयात्मक गीत या कविता की पंक्तियां जैसे स्तुतिगान आदि।  सं स्कृत की हृ धातु में ग्रहण करना, लेना, प्राप्त करना, ढोना, निकट लाना, पकड़ना, खिंचाव या आकर्षण, हरण जैसे भाव हैं। हृ धातु से बना है हृत्
 
अजित वडनेरकर
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कार्य क्षेत्र दर्पण:- सेवा, श्रम, व्यवसाय

कभी विश्व गुरु रहे भारत की धर्म संस्कृति की पताका,विश्व के कल्याण हेतू पुनः नभ में फहराये!                       श्री राम जय राम जय जय राम
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समाज दर्पण:-

विश्व गुरु रहा वो भारत, इंडिया के पीछे कहीं खो गया!  श्री राम जय राम जय जय राम जय श्री राम        श्री राम  जय राम जय जय राम जय श्री राम जय जय  श्री
 
तिलक रेलन
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किस्सा-कोताह ये कि…

कि सी प्रसंग को विस्तार से बताने के बाद उसका सार प्रस्तुत करते हुए अक्सर कहा जाता है कि किस्सा-कोताह ये कि...इसका अभिप्राय होता है समूचे प्रकरण का निष्कर्ष सामने रखना या संक्षेप में कहानी बताना। किस्सा कोताह दरअसल अरबी और फारसी के दो शब्दों से मिलकर बना
 
अजित वडनेरकर
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नाम में क्या रखा है… [नामकरण-1]

आश्रय का निर्माण होने के बाद उसका नामकरण करने की परिपाटी भी प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। यह आश्रय चाहे राष्ट्र हो प्रांत हो, नगर हो अथवा ग्राम, हर आश्रय का एक नाम ज़रूर होता है। हर काल में लोगों ने अपने निवास-ठिकाने बदले हैं और नई स्थिति में उनका नया
 
अजित वडनेरकर
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संग्रहालय की चीज़ बनाना चाहती है सरकार आदिवासियों को

एक ओर सामाजिक-आर्थिक प्रगति के झूठ के प्रचार और अपने लूट को ढंकने वाली सत्ता संस्कृति के विज्ञापन और दूसरी ओर अराजक तरीके से किए जा रहे उपभोक्ता उत्पाद कंपनियों के विज्ञापन, बिहार में आजकल पहली नजर में इसी की भरमार दिखती है. जनता के बुनियादी सवालांे को
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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अतिशय की महिमा अनंत

आ मतौर पर हिन्दी में अतिशय शब्द का प्रयोग बहुत सारा, काफी, बहुलता, अत्यधिक, ज्यादा के अर्थ में होता है। काव्यशास्त्र में एक अलंकार का नाम भी इससे जुड़ा है जिसे अतिशयोक्ति (अतिशय + उक्ति) अलंकार कहते हैं। नाम से ही स्पष्ट है कि बहुत बढ़ा-चढ़ा कर कही गई
 
अजित वडनेरकर
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लाइहराओबा : मणिपुरी संस्कृति :धार्मिक-अनुष्‍ठान

देवराज"सनालैबाक" (स्वर्ण-भूमि) के नाम से विश्‍व भर में विख्यात मणिपुर भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थित राज्य है । बाईस हज़ार तीन सौ छप्पन वर्ग कि०मी० क्षेत्रफ़ल वाला यह राज्य संस्कृति , समाज और प्रकृति-वैभव की दृष्‍टि से अपने प्राचीन
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रोग पुराणु कटे ज़िन्दगी नई ह्वैगे, तेरु मुल – मुल हैंसुणु दवाई ह्वैगे

नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने बहुत से प्रेम-गीत गाये हैं लेकिन उनके गाये कुछ प्रेम गीत ऐसे  हैं जिसमें प्रेम को लेकर एक नये तरीके के उपमानों का प्रयोग किया गया है उदाहरण के लिये उनके गाये त्यारा रूप कि झौल मां, नौंणी सी ज्यू म्यारु को ही लें जिसमें
 
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रोग पुराणु कटे ज़िन्दगी नई ह्वैगे, तेरु मुल – मुल हैंसुणु दवाई ह्वैगे

नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने बहुत से प्रेम-गीत गाये हैं लेकिन उनके गाये कुछ प्रेम गीत ऐसे  हैं जिसमें प्रेम को लेकर एक नये तरीके के उपमानों का प्रयोग किया गया है उदाहरण के लिये उनके गाये त्यारा रूप कि झौल मां, नौंणी सी ज्यू म्यारु को ही लें जिसमें
 
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रोग पुराणु कटे ज़िन्दगी नई ह्वैगे, तेरु मुल – मुल हैंसुणु दवाई ह्वैगे

नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने बहुत से प्रेम-गीत गाये हैं लेकिन उनके गाये कुछ प्रेम गीत ऐसे  हैं जिसमें प्रेम को लेकर एक नये तरीके के उपमानों का प्रयोग किया गया है उदाहरण के लिये उनके गाये त्यारा रूप कि झौल मां, नौंणी सी ज्यू म्यारु को ही लें जिसमें
 
श्री भीष्म कुकरेती जी
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डॉ श्याम गुप्त का आलेख ---नई सदी में नारी--नारी मुक्ति का मार्ग व आरक्षण

नई सदी में नारी ( डा श्याम गुप्त ) पश्चिमी जगत के पुरुष विरोधी रूप से उभरा नारी मुक्ति संघर्ष आज व्यापक मूल्यों के पक्षधर के रूप में अग्रसर हो रहा है । यह मानव समाज के उज्जवल भविष्य का संकेत है। बीसवीं सदी का प्रथमार्ध यदि नारी जागृति का काल था तो
 
Dr. shyam gupta
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आज रंग है ऐ माँ रंग है री

बसंतोत्सव सही मायनों में समस्त मानव जाती की खुशियों का पर्व है, लेकिन बसंतोत्वस व होली का पाकीजा पर्व हिन्दोस्तानी तहजीब में खास स्थान रखता है। हिन्दोस्तान में सूफीयो के यहा तो हज़रत निज़ामुद्दीन के काल से ही बसंतोत्सव का पर्व बड़ी धुमधाम से मनाया जाता रहा
 
परेश टोकेकर 'कबीरा'