पसंद करें
0
नापसंद करें

यदि इस संग्रह का शीर्षक ही किताब होता

कथाकार सुरेश उनियाल की कहानी किताब मौजूदा दुनिया का एक ऐसा रूपक है जिसमें पूंजीवाद लोकतंत्र के भीतर के उस झूठ और छद्म को जो एक सामान्य मनुष्य की स्वतंत्रता के विचार को गा-गाकर प्रचारित करने के बावजूद बेहद सीमित, जड़ और अमानवीय है, देखा जा सकता है। वह
 
विजय गौड़
पसंद करें
2
नापसंद करें

मदद की पुकार ब्लोगर्स की तरफ से...यदि इच्छा हो जाए तो...

अविनाश वाचस्पति जी की तरफ से प्राप्त मेल से इस सूचना को आप सभी की जानकारी के लिए....यदि इच्छा हो जाए तो.....यह सूचना नुक्‍कड़ पर Build a better future के रजनीश ने और पिछले दिनों मीडिया मंत्र पर श्री पुष्‍कर पुष्‍प ने लगाई थी। जिसमें मुख्‍यमंत्री को लिखे
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
पसंद करें
2
नापसंद करें

हम नित बढ़ रहे हैं असामाजिकता की तरफ

काम की अधिकता और समय की कमी का रोना आज लगभग सभी के साथ होता जा रहा है। कई बार विचार आता है कि जब हम बहुत कुछ नहीं करते तब हमारी व्यस्तता की ये हालत है और यदि कहीं कुछ अधिक सा करने लगे होते तो????अकसर लोगों को कहते सुना है कि फलां काम के लिए समय नहीं
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
पसंद करें
3
नापसंद करें

तस्वीरें जो बोलती हैं-भाग 5

लीजिये फ़िर से भारत को तस्वीरों के माध्यम से देखने-समझने के लिये प्रस्तुत है मेरी ये पोस्ट.पहले और द्वित्तीय,तृतीय,चतुर्थ भाग के बाद आज फ़िर से उसी श्रंखला को दोहराने का मन हो चला तो मेरे द्वारा सहेजकर रखी गयीं इन तस्वीरों को पोस्ट के रूप में प्रस्तुत कर
पसंद करें
2
नापसंद करें

लाशों के बँटवारे हैं ~~

  लाशों के बँटवारे हैं मुट्ठी में पर नारे हैं * चाँद जब ग्रहण में था वे बोले क्या नज़ारे हैं * डूब गय साहिल पर ही जितने कश्ती उतारे हैं * फूल से खिले हैं जो मत छूना ये अंगारे हैं * जमीं पे पाँव रखते नहीं चढ़े हुए जो पारे हैं * ताकि शिनाख़्त हो सके हमने
पसंद करें
5
नापसंद करें

खिलाड़ी के पांवों से भी फूटती है संगीत की स्वर लहरियां

जीवन का उबड़-खाबड़पन भी उनके चित्रों में ऐसा समतल होकर उभरता है कि उम्मीदों भरा एक संसार आकार लेने लगता है। दो फलकों पर फैले चित्रों को त्रीआयामी बनाने के लिए चित्र को बहुत गहराई में उकरने की बजाय वे दो अलग-अलग फलकों पर उनको रचते रहे। उनकी डाइगनल श्रैण
 
vijay gaur/विजय गौड़
पसंद करें
10
नापसंद करें

एक कप काफी पांच पानी

देहरादून १३ अप्रैल २००९ दिल्ली में मोहन सिंह पैलेस का कॉफी हाऊस अड्डा था कथाकार विष्णु प्रभाकर जी का। विष्णु जी और भीष्म साहनी वहीं बैठते थे। कवि लीलाधर जगूड़ी की स्मृतियों में विष्णु प्रभाकर के उस कॉफी हाऊस में बैठे होने का दृश्य उतर गया। कथाकार विष्
 
vijay gaur/विजय गौड़