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नियमित होना क्या है?

हमारे सामने नियमित कोई चीज़ बहती जाती है। उसकी गती और समय की अवधि उसको फोर्स देती है। जिसको लेकर वो अपने होने अहसास हो निरंतर गाड़ा करती जाती है। ये तो एक प्रक्रिया है, जो उसको जिन्दा रखती है। लेकिन, क्या हमें पता है कि हम उस नियमित और निरंतर गति मे कैसे
 
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झूठ क्या है?

मेरे एक साथी ने मुझसे ये सवाल किया। पहले तो लगा की ये क्या सवाल है? लेकिन उसके बाद में इसे संभावनात्मक रूप से देखने और समझने की कोशिश की तो इसमें किसी खास दायरे को बनाया भी और तोड़ा भी। अगर सब कुछ अनुभव है तो और सब सच है तो झूठ क्या है? झूठ एक
 
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Trickster City Book - पढ़िये जरूर

कहते हैं - दिल्ली शहर में रेड लाइटें नहीं होती, होते हैं तो बस, अजनबियों के हाथ।जिस शहर के हम हिस्से हैं उसमें बनते हर ठोस रुप को हम सिर्फ हामी ही नहीं देते बल्कि खुद को उसमें अधूरा भी पाते हैं। तभी कुछ खोजने की चाह पैदा होती हैं, जिसमें कुछ लोग मिसिंग
 
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शहर जो है बहूरूपिया :

हर वक़्त शहर परिवर्तन में है। इसी में शहर के नक्शे बनते-बिगड़ते और बदलते हैं। मगर परिवर्तन और नक्शों का बदलना महज जगहों पर ही निर्धारित नहीं रहता है उसका संबध शहर से निकलते लोगों से बंधा होता है। हर रास्ता जब भी मुड़ता है तो उसमें एक मंजिल की अपेक्षा साथ
 
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तलाश के बाहर और अंदर :

तलाश क्या है? हम तलाश को लेकर खुद के जीवन को कैसे समझते हैं? अगर सीधे से शब्दों में कहा जाये तो - तलाश जो कभी खत्म नहीं होती। तलाशें अंतहीन होती है। तलाश भूख को बड़ाती भी है और उसे ज़िन्दा भी रखती है। मगर तलाश के आगे क्या है? मोटे अक्षरों मे कहे तो तलाश
 
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ज्ञानदत्त जी की पगली पोस्ट से पगलिया तक

मैने पाया है कि श्री ज्ञानदत्त पाण्डे जी की मानसिक हलचल  उनके लिए मानस में चाहे जो भी हलचल मचाती हो मगर उसका एक रुप दूसरे के मन में हलचल मचाने का हमेशा रहता ही है. कभी मुझे लगता है कि अगर वो ब्लॉग और रेल नौकरी की बजाय राजनीति में हाथ आजमाते तो आज
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नये - पुराने सवालों के बीच

हमारे बीच एक शख़्स आये। जो काफी दूर से आये थे। वे इस अपेक्षा से हमारे साथ दो दिन रहे कि वे अपने शहर जहाँ पर वे रहते हैं। वहाँ पर कई लोगों के साथ मिलकर उस इलाके के लिए हमेशा कुछ न कुछ सामुहिक कार्यक्रम करते हैं और उस सामुहिक कार्यक्रम में उनके साथ जुड़ने
 
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कोई शब्द नहीं है ...

प्रत्यक्षा नें एक पुरानी कविता की याद दिलाई तो ईकविता के झरोखे से जा कर वह कविता भी निकाली जिस की प्रतिक्रिया के रूप में यह कविता लिखी गई थी । प्रत्यक्षा की कविता पहले और फ़िर अपनी दे रहा हूँ : बात तुम से कहनें के लिये मैं खोलती हूँ शब्दों के पिटारे प
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एक संवाद बेजी के साथ .....

काफ़ी दिन से कुछ नया लिखना नहीं हो पाया । कल बेजी की कविता पढी तो कुछ लिखने का मन हुआ । बेजी की अनुमति से प्रस्तुत है पहले उस की कविता इस रंग में और फ़िर मेरी कुछ पँक्तियां इस रंग में : दूरी किसी वृत्त में दो बिंदु की तरह मिले.... पास पास मैं आगे थी...
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पूरे देश में श्रम कानून का उल्लंद्घन'

पूरे देश में श्रम कानून का उल्लंद्घन' दीपांकर मुखर्जी कीशुरुआती शिक्षा मथुरा में हुई। बनारस से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने देश के कई नामी गिरामी संस्थानों में काम किया। इसी दौरान वह ट्रेड यूनियन की राजनीति से जुड़ गए। सीपीएम के मजदूर
 
अमलेन्दु उपाध्याय
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