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एक सीमा तक करें शैतानियाँ, ना किसी का दिल दुखाना चाहिए।

धीरे-धीरे यह कार्यक्रम संपन्नता की ओर अग्रसर है श्री राम नरेश त्रिपाठी की बाल कविता के बाद सुप्रसिद्ध गीत-गज़लकार श्री रोहिताश्व अस्थाना की एक बाल कविता फूल बनकर मुस्कराना चाहिए की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-
 
रवीन्द्र प्रभात
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रश्मि प्रभा जी बता रही हैं कि ध्यान क्या है ?

आपका पुन: स्वागत है परिकल्पना पर मैं ललित शर्मा !आज जो बातें मैं इस मंच से बताने जा रहा हूँ उसे सुनकर चौंक जायेंगे आप !जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ अल्पना देशपांडे जी का जिनकी कलाकृतियों की प्रस्तुति  विगत दिनों ब्लोगोत्सव प़र आप सभी ने देखी
 
रवीन्द्र प्रभात
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टेंशन लेने का नहीं जी , देने का ....... शशि सिंघल

 आज की भागादौर भरी जिन्दगी में मनुष्य के लिए टेंशन एक अनिवार्य हिस्सा बनती जा रही , घर हो या दफ्तर या फिर कहीं भी जहा आप अपनी भागीदारी सुनिश्चित करते हैं टेंशन आपका पीछा नहीं छोड़ता ....कार्यक्रम संपन्नता की ओर अग्रसर हो उससे पहले आईये इस विषय पर
 
रवीन्द्र प्रभात
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आत्मा और पैसा : एक दृष्टिकोण

और अब मैं आपको सुखदेव नारायण की इस कविता से आज के कार्यक्रम की संपन्नता की घोषणा करने जा रही हूँ ...किन्तु उससे पहले आपको बता दूं कि आज श्रीमती अल्पना देशपांडे ब्लोगोत्सव पर अपनी कलाकृतियों को प्रदर्शित करने जा रही हैं . वहां आपको मैं ले चलूंगी लेकिन
 
रवीन्द्र प्रभात
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बाल विज्ञान कथा और चिट्ठाकारों की विशेष परिचर्चा

आज का कार्यक्रम संपान्नता की ओर अग्रसर है...विगत कई दिनों से बच्चों के लिए उत्सव में कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं हो पाया, इसलिए आज  मैं केवल बच्चों के कार्यक्रम को लेकर आया हूँ , ताकि हमारे उत्सव के समग्र कार्यक्रम का संतुलन बना रहे ! आज बारहवें दिन
 
रवीन्द्र प्रभात
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समय की गतिशील धुरी पर परिकल्पना ने त्रिकाल दर्शन करवा दिए :सरस्वती प्रसाद

आशीर्वचन के दो शब्द सुना है --- श्यामल आकाश की सौरभमई मिट्टी पर ही कल्पना के कुसुम खिलते हैं, कोई अज्ञात प्रेरणा मन की बाहें  थामकर चाँद सितारों के गाँव से आगे परीलोक में पहुंचती है . पर यह उत्सवी परिकल्पना ! समय की गतिशील धुरी पर इसने तो
 
रवीन्द्र प्रभात
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किसी उपनिषद की तरह है यह परिकल्पना : इमरोज़

आशीर्वचन के दो शब्द  अपने आप को गीत गाने दो अपने आप को सुनने दोहम काफी हैं अपना आप गाने के लिए और अपना आप सुनने के लिए किसी उपनिषद की तरह है यह परिकल्पना हर दिन सुनता हूँ इसके बारे में हो सकता है सागर की गहराई को किसी दिन नाप लिया जायेपर इस
 
रवीन्द्र प्रभात
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ब्लोगोत्सव-२०१० : बहुत कठिन है डगर पनघट की.....

कुछ ही दिन पूर्व एक विद्वान् लेखक का शोधपूर्ण तकनीकी लेख पढ़ा. “बहुत कठिन है डगर पनघट की”. इस लेख में पाँच तकनीकी बाधाओं का उल्लेख करते हुए यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया था कि इन समस्याओं का हल निकाले बिना हिंदी को इंटरनेट पर लाने के अब तक के तमाम
 
रवीन्द्र प्रभात
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ब्लोगोत्सव-२०१० : आज का कार्यक्रम उत्सवी स्वर के साथ संपन्न

विविधता में एकता को प्रतिष्ठापित करने के उद्देश्य से इस उत्सव की परिकल्पना की गयी थी. आशाओं के अनुरूप हिंदी चिट्ठाकारों ने इसका समर्थन ही नहीं किया, अपितु इसकी सफलता की कामना भी की. परिणाम आपके सामने है . प्रत्येक ने एकरूपता की नहीं , अपितु एकता की कामना
 
रवीन्द्र प्रभात