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राँझा राँझा

प्रायद्वीपीय भारत को पछाड़ती, दक्षिण से उत्तर की ओर भागती एक रेलगाड़ी में गुलज़ार द्वारा फ़िल्म ’रावण’ के लिए लिखा गीत ’राँझा राँझा’ सुनते हुए… बड़ा मज़ेदार किस्सा है… शुरुआती आलाप में कहीं गहरे महिला स्वर की गूँज है. और बहती हवाओं की सनसनाहट
 
मिहिर
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धान के देश में!

कुछ छुपा-छुपा सा कुछ झलक रहा सा ...सौन्दर्य एक ऐसी अनुभूति है जिसका अनुभव प्रत्येक व्यक्ति करता है। जहाँ हम प्राकृतिक सौन्दर्य से अभिभूत होते हैं वहीं नारी का सौन्दर्य हमें सदा ही आकर्षित करता है। ईश्वर ने नारी को सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति ही बनाकर भेजा
 
जी.के. अवधिया
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गजलों और गीतों सजा एलबम ''मेरी दीवानगी''

शायद ही आज कोई ऎसा व्यक्ति हो जो संगीत प्रेमी न हो । संगीत ही एक ऎसी अचूक दवा है जिसे सुनकर इंसान अपने दुख - दर्द सब भूल बैठता है । और तरोताजा हो जाता है । आज मैं अपनी पोस्ट के माध्यम से आप सबको हाल ही में बाजार में आई गजलों व गीतों से सजी एक एलबम की
 
shashisinghal
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सुरेश चिपलूनकर जी, मैं मानता हूँ कि इस्लाम में संगीत हराम है

अपने ब्लॉग महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर (Suresh Chiplunkar) जी ने एक लेख लिखा जो कि गुजरात के भरूच जिले में चल रहे एक रहत शिविर पर आधारित था. "अरे?!!!… मोदी के गुजरात में ऐसा भी होता है? ...... Gujrat Riots, Relief Camp and NGOs in India"जिस पर मेरा कमेंट्स
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आर डी बर्मन एवं गुलज़ार की जुगलबंदी

गुलज़ार साहब और पंचम दा, दोनों की अपनी एक शख्सियत है, एक किस्म की रूमानियत है, जो जुदा होने पर अलग है पर साथ होने पर कई झरोखे खोलती है. कई बार पता नहीं चलता लेकिन कुछ लोगो की मौजूदगी आपकी शअख्सियत को एक नई पहचान देती है, एक vibration जो आप से ऐसे
 
Anurag Geete
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पांडित्य

साम वाहिनीवर आज शिवकुमार शर्मांची मुलाखत सादर झाली. हल्ली वाटेल त्याला पंडित संबोधण्यात येते त्याचा शिवकुमारनी उल्लेख केलाच. या कलाकाराचे सादरीकरण गेली ३५-४० वर्षे ऐकतो आहे. अजूनही आपण अतृप्त आहोत आणि शिकतो आहोत हे त्यांनी आवर्जून सांगितले.शास्त्रीय
 
बहिर्जी नाईक
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ठण्डो रे ठण्डो, मेरा पहाड़ै की हव्वा ठण्डी – पाणि ठण्डो

पहाड़ और ठण्ड – दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक लगते हैं। पहाड़ शब्द सुनते ही ऐसा लगता है जैसे कहीं दूर से आती हुई किसी ठण्डे, निर्मल हवा के झौंके ने दिल-दिमाग को ठण्डा कर दिया हो। पहाड़ से जुडे इसी शीतलता के अहसास को नरेन्द्र नेगी जी ने इस बेहद सुन्दर
 
प्रबंधक
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संगीत के असाधारण ताल

जरा याद कीजिये फिल्म काला बाजार के गीत ‘अपनी तो हर आह एक तूफान है…..’ को। या फिल्म दोस्त के गीत ‘गाड़ी बुला रही है…..’ को। कुछ विशेषता नजर आती है इनमें? जी हाँ इन गानों में रेलगाड़ी की आवाज को ताल के रूप में इस्तेमाल
 
जी.के. अवधिया
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गायक जगजीत सिंह को ७०वीं वसंत की बधाई

शेरो शायरी में कहना हो मन की बात, दिल में जब भी उतरेगी प्यार और मोहब्बत के जज्बात, वफादारी की कसमें हो या नामुरादों-सी हालात, हर तरह के मन के लिए गजल रूपी पैयमाना जरूरी हो जाता है। ऐसे में, दिलकश, कशिश भरी आवाज कानों में बरवश ही गूंजने लगती है। आवाज उस
 
दीपक राजा
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मोहम्मद रफ़ी

मोहम्मद रफ़ी, जो कि रफी साहब के नाम विख्यात हैं, किसी परिचय के मुहताज नहीं हैं। हिंदी फिल्मों का शौक रखने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्‍ति होगा जो उनके नाम से परिचित नहीं हो। मोहम्मद रफ़ी साहब का जन्म कोटला सुल्तानसिंह (अमृतसर के पास) में 25 दिसंबर 1925 को
 
जी.के. अवधिया
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संगीत सफर

फिल्म संगीत जब शुरू हुआ, केवल गिने-चुने साज ही उपलब्ध थे साथ ही कई प्रकार की तकनीकी कठिनाइयाँ थीं। आपको शायद पता हो कि पुराने समय में माइक्रोफोन इतने कमजोर होते थे कि रेकार्डिंग के पहले कुछ समय तक उसे गरम करना पड़ता था। साज कम होने के कारण आवाज का महत्व
 
जी.के. अवधिया
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ना...ना... - ए. आर. रहमान चे ऒस्कर साठी निवडले गेलेले नवीन गाणे

ना...ना... - ए. आर. रहमान चे ऒस्कर साठी निवडले गेलेले नवीन गाणेए. आर रहमान याचे ’कपल्स रिट्रीट’ या हॊलीवूडच्या चित्रपटासाठी स्वरबद्ध केलेले ’ना...ना...’ गाणे ऒस्कर पारितोषिकासाठी नामांकीत झाले आहे. सलग दुसऱ्या वर्षी रहमानला ऒस्कर नामांकन मिळाले आहे.
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बड़ी बेसब्री से इंतजार किया करते थे हम बुधवार का

एक समय था जब हमें लगता था कि कैसे जल्दी से जल्दी बुधवार आ जाये और जब बुधवार आ जाता था तो फिर बेसब्री के साथ इंतजार हो जाता था रात्रि के आठ बजने का। हमारा खयाल है कि सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि आप को भी ऐसा लगता रहा होगा। हम बात कर रहे हैं अपने समय की
 
जी.के. अवधिया
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दधिचोर गोपीनाथ बिहारी की बोलो जै

शिशिर की कँपन का अभी अंत नहीं हुआ है किन्तु तिथि तो कह रही है वसन्त आ गया है। वसंतागम के साथ ही आजकल 'कबाड़ख़ाना' पर नज़ीर अकबराबादी का साहित्योत्सव चल रहा है। सच है कि जिसने नज़ीर को नहीं पढ़ा उसने कुछ नहीं पढ़ा। इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आइए कुछ पढ़ें और
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पत्रास कारण की - झेंडा मधले गाणे

पत्रास कारण की...चित्रपट: झेंडा (२०१०)दिग्दर्शक, संगीतकार आणि गायक: अवधूत गुप्तेगीत: गुरु ठाकूरह्या गाण्याचे शब्द फार चांगले आहेत...आणि चाल/ आवाज ही त्या आशयाला पूरक आहे...आता ते चित्रीत कसे केले आहे ते बघायची उत्सुकता आहे.पत्रास कारण की...Kaustubh's
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आयुष्य हे कांदे-पोहे

“सनई चौघडे” ह्या चित्रपटातील उत्कॄष्ट असे गाणे किंवा: थेट लिंक
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मध्यपूर्व और एडवर्ड सईद की संगीतदृष्टि- 7- समापन किश्त

आज बाजार में जिस तरह से सस्ते दामों पर संगीत उपलब्ध है उसका श्रोता पर बहुत कम असर होता है ,इसके अलावा श्रोता भी कमजोर होता है। वह आज ऐसी स्थिति में भी नहीं है कि अच्छे ढ़ंग से संगीत की प्रशंसा कर दे। आज के संगीत ने श्रोता को गूंगा बना दिया है। आज श्रोता
 
jagadishwar chaturvedi
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मध्यपूर्व और एडवर्ड सईद की संगीतदृष्टि -6-

सईद ने कहा आज संगीत उपभोक्तावाद और वस्तुकरण के द्वंद्व में फंस गया है। डेनियल ने इसके जबाव में कहा कि आज हम स्वर संगति को ही खो चुके हैं। जब आप स्वरसंगति को खोते हैं तो संगीत के भी किसी न किसी आयाम को खो देते हैं। यह काम बगैर सद्भाव के नहीं होता। संगीत
 
jagadishwar chaturvedi
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मध्यपूर्व और एडवर्ड सईद की संगीतदृष्टि -5-

डेनियल और सईद के बीच में चली बातचीत में नाटक ,ऑपेरा और कविता के पाठ के मूल्यांकन की समस्या भी उठी, इस पर सबसे पहले डेनियल ने कहा कथोपकथन वाले नाटक और ऑपेरा में अंतर है। इन दोनों के बुनियादी अंतर को कम करके नहीं देखना चाहिए। ऑपेरा बुनियादी तौर पर सांगीतिक
 
jagadishwar chaturvedi
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मध्यपूर्व और एडवर्ड सईद की संगीतदृष्टि -4-

सईद के अनुसार ऐसा व्यक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण होता है जो किसी न किसी रूप में यथास्थितिवाद को चुनौती दे। जब मैंने अपने संस्मरण लिखने का फैसला किया तो अनेक लोगों ने सुझाव दिया कि तुम पहले दूसरों के संस्मरण पढ़ लो इससे लिखने में आसानी रहेगी। मैंने भी सोचा कि
 
jagadishwar chaturvedi
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चीख और हुल्लड़ के बीच संगीत

विनोद भारद्वाज कुछ अरसे तक नवभारत टाइम्स में विभिन्न विषयों पर छोटे-छोटे मगर काफ़ी विचारोत्तेजक लेख लिखते रहे। आज पढ़ते हैं संगीत के बदलते स्वरूप पर उनके तात्कालिक विचार। यह छोटा सा आलेख तेरह साल पहले मार्च 1996 में छपा था मगर इसकी प्रासंगिकता आज बढ गई है।
 
महेन
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मध्यपूर्व और एडवर्ड सईद की संगीतदृष्टि -3-

बुध्दिजीवी और कलाकार के लिए मुख्य चीज है उसके आदर्श। वह उनके साथ कोई समझौता नहीं करना चाहता। सईद ने सवाल उठाया है क्या इन दोनों के बीच किसी भी किस्म का सेतु बनाया जा सकता है ? इनके बीच की खाई को पाटा जा सकता है ? डेनियल ने कहा हमें राजनीतिज्ञ और
 
jagadishwar chaturvedi
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मध्यपूर्व और एडवर्ड सईद की संगीतदृष्टि -2-

तकनीकी विकास के युग में आप अपनी 'टाइमनेस' के प्रति अनभिज्ञ होते हैं। क्योंकि आज तकनीक के जरिए प्रत्येक चीज का संरक्षण किया जा सकता है,पुनरावृत्ति की जा सकती है। सईद ने कहा मुझे लगता है साहित्य और चित्रकला में समय आगे नहीं जाता। आप उसके आसपास घूमते रहते
 
jagadishwar chaturvedi
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मध्यपूर्व और एडवर्ड सईद की संगीतदृष्टि -1-

एडवर्ड सईद को फिलीस्तीन जनता की आजादी की लड़ाई और संप्रभुता से जितना गहरा लगाव था उतना ही गहरा लगाव संगीत और साहित्य से भी था। सईद ने सन् 1986 से लगातार 'नेशन' पत्रिका में संगीत समीक्षाएं लिखीं, इसके अलावा उनके संगीत संबंधी विचारों को उनकी ही दो किताबों
 
jagadishwar chaturvedi
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माझ्या पॊडकास्ट वरील नवीन गाणी

माझ्या पॊडकास्ट वर काही नवीन गाणी अपलोड केली आहेत...नटरंग उभा...Kaustubh's podcastखेळ मांडला...Kaustubh's podcastआता वाजले की बारा...Kaustubh's podcastगज़ल: देखावे बघण्याचे वय निघून गेले Kaustubh's podcast~ कौस्तुभ
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राजमल सुराना संगीत समारोह

स्रुतिमंडलकी ओर से आयोजित राजमल सुराना संगीत समारोह रविवार को यहां महाराणा प्रताप सभागार में पंडित जसराज की प्रात: कालीन शास्त्रीय संगीत सभा से आरम्भ। इस मौके पर राज्य राज्यपाल एसके सिंह और उनकी श्रीमती मंजू सिंह भी उपस्थित थीं। राज्यपाल सिंह ने तीन
 
moomal
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दु:ख की छंटती बदलियां..

पीटूपी की मेहरबानी कि रहते-रहते फ़ि‍ल्‍मी नगीने हाथ लगते रहते हैं, और यह बात, शिद्दत से, भूलती नहीं कि हिंदी फ़ि‍ल्‍में क्‍यों और कैसे इतनी अझेल हैं. आज सुबह की अच्‍छी शुरुआत फ़ि‍निश निर्देशक आकि कॉउरिसमाकी की ‘ला विये दि बोहेम’ (1992) और ‘ड्रिफ्टिंग
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झेंडा - शीर्षकगीत

आत्ताच अवधूत गुप्ते दिग्दर्शित ’झेंडा’ या चित्रपटाचे शीर्षकगीत मिळाले... चित्रपटाचे प्रोमो YouTube वर आहेच...त्यावरून हा चित्रपट सरळसरळ शिवसेना आणि मनसे यावर आधारीत आहे असे वाटते. त्यामुळे प्रत्यक्ष चित्रपट कसा असेल याची उत्सुकता आहे (अर्थात जर तो
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इंटरनेट युग में संगीत का भवि‍ष्‍य

एक जमाना था जब संगीत देसी और लोकल था। आज संगीत ग्लोबल है।उपग्रह चैनलों और इंटरनेट पर उपलब्ध संगीत ग्लोबल है।आज संगीत के दर्शक और श्रोता जितने हैं।उतने कभी नहीं रहे।इंटरनेट संगीत ने अस्मिता , संस्कृति और उप - संस्कृति के नए रूपों को जन्म दिया है।ग्लोब
 
jagadishwar chaturvedi
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इंटरनेट से संगीत उद्योग की नींद हराम

इंटरनेट के नए कॉपीराइट कानून के प्रावधानों ने संगीत उद्योग की नीं द उड़ा दी है। नए कानून के मुताबि‍क अब कोई संगीतकार अपने साथ म्‍यूजि‍क कंपनी के द्वारा कि‍ए गए कि‍सी भी करार को कभी तोड़ सकता है और नया करार करने के लि‍ए मजबूर सकता है। उल्‍लेखनीय है सन
 
jagadishwar chaturvedi
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ओशियंस में गुलज़ार और विशाल की जुगलबन्दी

ओशियंस में गुलज़ार और विशाल भारद्वाज साथ थे. बात तो ’कमीने’ पर होनी थी लेकिन शुरुआत में कुछ बातें संगीत को लेकर भी हुईं. बातों से सब समझ आता है इसलिए हर बात के साथ उसे कहने वाले का नाम जोड़ना ज़रूरी नहीं लगता. सम्बोधन से ही सब साफ़ हो जाता है. वहीं ग
 
मिहिर
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“शंकर शैलेन्द्र को हिन्दी सिनेमा का सबसे बड़ा गीतकार कहा जा सकता है.” -गुलज़ार.

इस बार के ओशियंस में प्रस्तुत गुलज़ार साहब का पर्चा “हिन्दी सिनेमा में गीत लेखन (1930-1960)” बहुत ही डीटेल्ड था और उसमें तीस और चालीस के दशक में सिनेमा के गीतों से जुड़े एक-एक व्यक्ति का उल्लेख था. वे बार-बार गीतों की पंक्तियाँ उदाहरण के रूप में पेश कर
 
मिहिर
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माफ करो मेरे बाप, आगे जाओ...

इन दिनों दिल्ली का एक एफएम चैनल सारें बापों और अंकलों की छुट्टी कर रहा है। उसने साफ कह दिया है कि हमें बाप और अंकल टाइप के लिसनर्स नहीं चाहिए। इसलिए अगर आप पुराने टाइप के गाने सुनना चाहते हैं तो प्लीज़ हमें माफ कीजिए और कहीं और जाइए। ऐसा लगता है जैसे
 
नीरेंद्र नागर
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एक गायिका की ज़िन्दगी के बहाने भारतीय शास्त्रीय संगीत का वृत्तांत

टाइम्स ऑफ इण्डिया की पत्रकार नमिता देवीदयाल की पहली किताब द म्यूज़िक रूम: अ मेमोयर एक तरह से शिष्या की क़लम से लिखी अपने गुरु की जीवनी है. नमिता लगभग 20 वर्ष तक जयपुर घराने की सुविख्यात गायिका ढोंढुताई कुलकर्णी की शिष्या रही थीं. लेकिन असल में तो यह
 
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
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संगीत के इतिहास की सबसे अवसादजनक धुन

संगीत की कुछ समझ रखने वाले पाठक इस बात को बेहतर जानते हैं कि संगीत अंतःकरण को दिव्यता और आनंद से ओतप्रोत करता है, ह्रदय के तारों को झंकृत करता है तो कभी-कभी अपार विषाद भी उपजता है. संगीत के इतिहास में घोर विषाद को जन्म देनेवाली ऐसी ही एक धुन है ग्लूमी
 
निशांत
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संगीत का दिन और दिल का साज

आज विश्व संगीत दिवस है. मुझे नहीं पता कि ऐसे दिनों का क्या महत्व होता है लेकिन इतना $जरूर है कि मेरे लिए हर दिन संगीत का दिन, कविता का दिन हो यही चाहती हूं. कविता जिसमें $िजंदगी के सारे रंग हों, संगीत जिसमें जिं़दगी के सारे आरोह-अवरोह, मींड़, गम$क, म
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'मित्तर प्यारे नू'

जीवन में जरा सी विषम परिस्थिति आने पर हम लोगों का ईश्वर पर विश्वास डगमगाने लगता है। "हम ने तो किसी का कभी बुरा नहीं किया फिर भगवन हमारे साथ ये अन्याय क्यों कर रहा है? हमारा तो भगवान ने भी साथ छोड़ दिया !" इत्यादि इत्यादि प्रलाप हम करना शुरू कर देते है
 
Praney !
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