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चेतना के आधार के रूप में श्रम

हे मानवश्रेष्ठों,पिछली बार हमने मनुष्य और पशुओं के बीच विभाजक रेखा को, उनके मानस के तात्विक अंतरों को समझने की कोशिश की थी। इस बार हम, मानव चेतना के आधार के रूप में श्रम की महत्वपूर्णता और उपयोगिता पर विचार करेंगे।चलिए चर्चा को आगे बढाते हैं। यह ध्यान
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दिन भर व्यस्त रहा, लगता है कुछ दिन ऐसे ही चलेगा

आज हड़ताल समाप्ति के दूसरे दिन मैं अदालत सही समय पर तो नहीं, लेकिन साढ़े ग्यारह बजे पहुँच गया था। कार को पार्क करने के लिए स्थान भी मिल गया। लेकिन अदालत में निराशा ही हाथ लगी। एक अदालत में एक ही प्रकृति के ग्यारह मुकदमे लंबित थे। अस्थाई निषेधाक्षा के लिए
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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ह़ड़ताल समाप्ति के बाद का पहला दिन

रात को सोचा था  'अब हड़ताल खत्म हो गई है, कल बिलकुल समय पर अदालत के लिए निकलना होगा'। पत्नी शोभा ने पूछा था -कल कितने बजे अदालत के लिए निकलना है? तो मैं ने बताया था -यही कोई साढ़े दस बजे। शोभा ने चेताया दस बजे की सोचोगे तब साढ़े दस घर से
 
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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'श्रम के घंटे और मनुष्‍य का अवकाश'

'श्रम के घंटे और मनुष्‍य का अवकाश' शीर्षक से यह निबंध करीब चार साल पहले 'कथन' पत्रिका में प्रका‍शित हुआ था और इसके कुछ अंश भी इधर-उधर आये थे। पिछली पोस्‍टों में दिए गए धर्म विषयक आलेख को जिस उत्‍साह और रुचि से पढ़ा गया, उससे मुझे आशा है कि इस निबंधात्‍मक
 
कुमार अम्‍बुज
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