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भोजपुरी के कथाकार प.कामता नाथ दूबे चल बसनी

वरिष्ट भोजपुरी लेखक प.कामता नाथ दूबे के काल्ह 11 जून के स्वर्गवास हो गइल. उहां के गोपालगंज जिला के भरकुइया बरौली गांव के रहे वाला रहीं. 81 साल के उमिर में उहां के भोजपुरी आ हिंदी में कई गो नाटक आ कहानी लिखले रहनी. 1998 में नेहिया लगवनी सइया से फिलिम के
 
bhojpuriyababukahin
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शमशेर की याद में: यह विवशता

एक जिद्दी धुन ने याद दिलाया कि आज शमशेर की पुण्यतिथि है। आजकल हालात है ये हैं कि हर तरफ से केवल बुरी खबर आ रही है। मिरचपुर,हरियाणा,कोडरमा,देवबंद,इलाहाबाद,दिल्ली हर तरफ से ऐसी खबरें आ रही हैं कि भारत बर्बरता के युग में लौट रहा है। इतिहास स्वयं को
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कितना इनाम रखे है सरकार हम पर -- कुछ याद आया?

कल रात आदतन टी0वी0 खोलकर समाचार चैनल पर निगाह डालनी शुरू की तो समाचार से रूबरू हुए कि मैकमोहन नहीं रहे। एक पल को शायद साथ में चित्र नहीं आया होता तो पहचान का संकट हमारे सामने खड़ा हो जाता किन्तु चित्र ने पहचान कायम रखी।(चित्र गूगल छवियों से साभार)तुरन्त
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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आज कार्ल मार्क्स का जन्मदिन है

आज कार्ल मार्क्स का जन्मदिन है। (मार्क्स का परिचय देने की कोई जरूरत नहीं लगती!) मार्क्स का जन्मदिन ऐसा जन्मदिन है जिसे सत्ता वर्ग हमेशा ही भूलाना चाहता है। इसलिए कम ही उम्मीद है कि मुख्यधारा का कोई बड़ा अखबार या चैनल उसके बारे में कुछ बताए-सुनाएगा। एक ऐसा
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विंदा हुए विदा...

भारतीय भाषाओं में ऐसे कवि कम ही हुए हैं, जिन्हे अखिल भारतीय स्तर पर साहित्य और आम जनता के बीच खासी लोकप्रियता हासिल हो। विंदा करंदीकर ऐसे ही विरल रचनाकार थे, जिन्हें मराठी के अलावा हिंदी, अंग्रेजी और समस्त भारतीय भाषाओं में बेहद सम्मान मिला। विंदा के इस
 
प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi
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मख्मूर साहब के बिना

उर्दू के मशहूर शाइर मख्‍मूर सईदी साहब का पिछले दिनों यानी 2 मार्च, 2010 को जयपुर में निधन हो गया। 31 दिसंबर, 1934 को टोंक में जन्‍मे मख्मूर साहब ने उर्दू शायरी में राजस्थान का परचम इस बुलंदी के साथ फहराया कि इस रेगिस्तानी सरजमीं की तमाम रंगतें उनकी शायरी
 
प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi
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सिपाही मेरे

सिपाही मेरे !  तुम  फ्रंट पर तो रंग है, फागुन है, सावन है।बर्फीला मौसम लगातार वहाँ यहाँ विविधता मनभावन है।याद आते होंगे इस समय सरसो और टेसू के फूलकिसी के जूड़े में सजे बेला फूलखीझ आती जो होगी बहलाती होगी कठिन नौकरी।क्या उठती
 
गिरिजेश राव
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वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेन्द्र अवस्थी जी नहीं रहे

मध्य प्रदेश के गढ़ा जबलपुर मे २५ जनवरी १९३० को जन्में श्री राजेन्द्र अवस्थी वर्तमान मे` ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ’ के जनरल सेक्रेटरी थे । नवभारत,सारिका ,नंदन,साप्ताहिक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी के आप संपादक भी रहे हैं। आपकी चर्चित कृतियों में `सूरज
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हम अब भी गा रहे हैं

भारतभूषण तिवारी “मैं लोगों के लिए गाऊं यह चुनाव मेरा नहीं था. बल्कि इस काम के लिए ज़िन्दगी ने मुझे चुना." अर्जेंटीना की महान लोकगायिका मर्सिडीज़ सोसा ने कुछ दिनों पहले यह बात एक इंटरव्यू में कही थी. अमेरिका की आवाज़' कही जाने वाली मर्सिडीज़ सोसा ने अ
 
रंगनाथ सिंह
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मालवा के दुलारे को नमन :

क्या वे सचिन के 17000 रन पूरे करने के लिये प्रतीक्षा कर रहे थे? वीरेन्द्र जैन् शायद उन्हें सचिन के 17000 रन पूरे होने की प्रतीक्षा थी। अपने पिछले जन्मदिन पर लिखे कागद कारे में उन्होंने आगामी मृत्यु को सूंघ लेने के साफ साफ संकेत दे दिये थे। वे ऐसे इकल
 
वीरेन्द्र जैन
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लिख सकूँ तो -

नईम : 01 अप्रैल 1935 - 09 अप्रेल 2009 पिछले दिनों नवगीत के शीर्ष ह्स्ताक्षर नईम हमारे बीच नहीं रहे. हालांकि वे अपने नवगीतों के माध्यम से हमारे बीच हमेशा रहेंगे. तत्सम में इस बार प्रभु जोशी के आत्मीय आलेख के साथ नईम जी का एक नवगीत.... ________________
 
प्रदीप कांत
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बीकानेर में उदास हैं रिक्शे, तांगे, ठेले वाले...

जन कवि हरीश भादाणी का 2 अक्‍टूबर, 2009 को निधन हो गया। मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि। हरीश भादाणी जनकवि थे, यह तो सभी जानते हैं। क्या दूसरा भी कोई जनकवि है? शायद होगा, लेकिन मुझे नहीं पता। मैंने तो अपने जीवन में एक ही जनकवि देखा है-हरीश भादाणी। जो ठे
 
ish madhu talwar
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हरीश भादाणी – एक फकीरी जीवन

वो मेरे दादाजी की उम्र के थे, लेकिन मैं उन्हें बाकी दोस्तों की तरह हमेशा भाई साहब ही कहता था। वो भी भाई ही मानते थे, बात-बात में कुछ याद आने पर कहते थे, ‘प्रेमचंद तुम्हारी भाभी कहती है..’ और वे इस तरह पीढियों का अंतराल सिरे से खत्म कर देते थे। मैंने
 
प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi
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जनकवि हरीश भादाणी नहीं रहे

हिंदी और राजस्‍थानी के सुप्रसिद्ध जनकवि हरीश भादाणी जी का आज तड़के बीकानेर में निधन हो गया। 11 जून, 1933 को जन्‍मे हरीश भादाणी जी की लोकप्रियता इतनी जबर्दस्‍त थी कि हजारों लोगों को उनके गीत कंठस्‍थ हैं और विभिन्‍न जनांदलनों में बरसों से गाये जा रहे ह
 
प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi
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स्किपी की याद में....

लोग कहते हैं वो नहीं थी किसी इंसान से कम, पर वो इंसानों से ज़्यादा वफादार थी गोया लबों पर नहीं थी उसके कुदरती हंसी, फिर भी हमारे लिये खुशियों का भंडार थी उसके बालों पर रोज फिरते थे स्नेह के हाथ, शायद इसीलिये वो इतनी चमकदार थी आंखों में उसकी रहते थे ह
 
भूपेश पंत आज़ाद