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जब जेब कट जाती है

धोखा शैलेंद्र की एक कविता यह जो चमक-दमक है जिससे आंखें जुड़ाती हैं हकीकत से कहीं दूर ले जाती हैं भटकाती हैं अफसोस! समझ में ये बात तब आती है जब जेब कट जाती है। क्या आपने कथा संसार में समीर लाल की कहानी 'आखिर बेटा हूं तेरा' पढ़ी? अगर नहीं तो क्लिक आखिर
 
Satyendra Prasad Srivastava
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कसूर

शैलेंद्र की एक कविता उनका कोई कसूर नहीं था उन्हें कुछ भी नहीं हथियाना था कब्जियाना था फिर भी फिर भी जंगल में आग लगी और जल गए आशियाने उनके भी अपनी दुनिया में ही खोए रहने की आदती थी उनकी और उनकी हर जगह खलल डालने की। अपने ही देश में से साभार
 
Satyendra Prasad Srivastava