जब जेब कट जाती है
धोखा शैलेंद्र की एक कविता यह जो चमक-दमक है जिससे आंखें जुड़ाती हैं हकीकत से कहीं दूर ले जाती हैं भटकाती हैं अफसोस! समझ में ये बात तब आती है जब जेब कट जाती है। क्या आपने कथा संसार में समीर लाल की कहानी 'आखिर बेटा हूं तेरा' पढ़ी? अगर नहीं तो क्लिक आखिर
Dec 29 2009 11:40 AM



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