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बरसात

घर से निकला ही था की बरसात हो गयी आज मौसम से अचानक यू मुलाकात हो गयी जाने कब दिखी वो और हम यूँ ही कब तक खड़े रहे पता भी नहीं चला की यहाँ कब रात हो गयी यूँ तो तेरे होठों से लगी वो बस बारिश की एक बूँद थी फिर जाने क्यों [...]
 
Shubhashish Pandey
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"दुनिया:दो शेर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

सफर करते हैं तो लगता है, दुनिया है बहुत फैली! मगर जब ग्लोब को देखा तो, दुनिया बहुत छोटी  है!बढ़ा जबसे चलन, मोबाइलों का देश में मेरे! सिमटकर आ गया, संसार सबकी जेब में अब तो!
 
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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१४११

एक बहुत ही अच्छा वीडियो देखने को मिला जो नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ इधर कुछ दिनों से मै और मेरी पत्नी "शेर बचाओ अभियान " के शेर के छोटे बच्चे वाले वीडियो को देखकर ,उस पर चर्चा करते रहते थे | उस निहायत प्यारे पिल्लै को देख कर हम हमारे घर पर रही उसकी मौसी
 
abhay lokre
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उल्लुओं का क्या होगा-हिन्दी हास्य कवितायें

क्रीम पाउडर से सजे चेहरे सौंदर्य का पर्याय बन गये हैं, भयानक चेहरे भी खूबसूरती की दौड़ में भागने के लिये बनठन गये हैं। ———– न राई थी, न पहाड़ था, न तिल था, न ताड़ था, फिर भी वह ख्वाब बेचकर सौदागरों ने पैसा कमाया। इसतर बड़े ठग ने छोटे
 
दीपक भारतदीप
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ऐसे लोग कम हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता

सभी को बताये रास्ते पर खुद चलें, ऐसे लोग कम हैं। दूसरे को सिखायें दांवपैंच, जो अजमाने में खुद बेदम हैं।। हवा के झौंके से कांपने लगता है पूरा उनका बदन, जमाने को डरपोक बतायें, अपनी बहादुरी के उनको वहम हैं।। दूसरों की रौशनी में चले हैं पूरी जिंदगी का
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मैं जनाज़ा हो चला.............................(बवाल)

दोस्त तेरी महफ़िलों से, जी मेरा,   ले भर गयामैं जनाज़ा हो चला, ऐलान कर दे,   मर गयाकाश, दिल के दर्द को, पहले बता देता कभी !आज तेरे सामने, ज़िंदा न होता मैं अभी ?? 
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दो ताजा शेर

तेरे इश्क के ज़ुनून में अजब काम किया है पहले तुझे आवाज़ दीं फ़िर खुद ही ज़वाब दिया है । --- छू लिया आ कर के तूने इस तरह मेरा वजूद साँस भी तेरी मुझे अब अपने जैसी ही लगे है ।
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दो पंक्तियाँ :

रजनी के लिये : तुम सिर्फ़ एक पँक्ति में कुछ इस तरह समाती हो स्वयं अगरबत्ती सी सुलगती हो मुझ को मह्काती हो ।
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अपने घर का बजट बनाने से क्या फायदा-हिंदी शायरी

गृहणी ने गृहस्वामी से कहा ''आज मैंने महिलाओं की एक किताब में पढा कि घर का खर्च भी बजट बनाकर करना चाहिए'' गृहस्वामी ने कहा ''बजट बनाने के लिए भी कागज़ और पेन चाहिए जो अपने बजट में नहीं आ सकतीं पड़ोस से उधार लेकर अख़बार और किताब जो तुम पढ़कर बढाती हो ज्ञ
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वह एक है, पर नाम अनेक-हिंदी शायरी

हमने पूछा दुनिया के मालिक का पता उन्होने ढोल बजाने वालों का घर बता दिया जो पहुंचे वहाँ सुना शोर तो हमने मालिक को भुला दिया वह है एक पर नाम अनेक डर था की कहीं हम लें नाम उनका कहीं और अधिक शोर न मच जाये अगर कहीं हमने भीड़ से अलग नाम लिया --------------
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स्वार्थों के होते मेहमान-हिंदी शायरी

चेहरे पर है दिखावटी मुस्कान नहीं होता नीयत का भान बदन पर हैं जगमगाते वस्त्र धारण किए दिल में काली नियत लिए भरोसे के लिए निकल रहे हैं शब्द जुबान से निरंतर विश्वास और धोखे का मालुम नहीं अन्तर मन की आंखों से पढोगे जब उनको उनके शब्दों के अर्थों का अर्थ स
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तब बदल जायेगा परिदृश्य-हिंदी शायरी

रात्रि के शीतल पलों में चन्द्रमा की हल्की रोशनी में देह पर धवल वस्त्र चारों और बिखर रही इत्र की खुशबू हाथों में गुलाब लिए प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए निकला है वह कितना सुन्दर लगता है दृश्य पर जब सूरज चमकेगा अपनी अग्नि से धरती को प्रज्जवलित करेगा अपनी
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दीवारों पर लिखे सत्य पढे नहीं है-हिंदी शायरी

रिश्तों में अब कोई दरार नही है क्योंकि अब लोगों के दिलों में अब उनके लिए कोई जगह बची नहीं है भाई और भाई के बीच अब कोई दीवार नहीं खड़ी नही रह सकती क्योंकि रिश्ता रह गया है जैसे हवा में लटकी तख्ती नफ़रत जैसी कोई बात नहीं है क्योंकि समय के कमी की वजह से क
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सिलसिला-ए-उल्फ़त

उनसे मेरी उल्फ़तों का सिलसिला, चल निकला -- चल निकला इश्क़ का सैलाब, शक्ले-अश्क लेकर, ढल निकला -- ढल निकला --बवाल ___________________________________ तो बवाल भाई फिर ये भी आज़मा लेतें हैं ....? _______________________ _______________________________
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किसी ने अल्लाह कह के मारा किसी ने राम कह के मारा

किसी ने अल्लाह कह के मारा किसी ने राम कह के मारा जो बच गए इससे उन्हें सद्दाम कह के मारा जो आये थे घर छोड़ शहर दो रोटी कमाने को “क्यों छिनने आये हो हमारा काम” कह के मारा कहते हैं जिससे बड़ी नहीं कोई और इबादत दुनिया में हाँ इसी इश्क करने की
 
Shubhashish Pandey
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दिल में .............(बवाल)

वाह, क्या दीवान तेरा, नूर सा फबता हुआ !जिसमें ख़ुद को पा रहा हूँ, तुझसे मैं कटता हुआ !!ख़ैर दिल की बात दिल तक ही, रखूंगा यार अब !और कर भी क्या सकूंगा, मोहरा हूँ पिटता हुआ !!--- बवाल
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सबब ................(बवाल)

मैं सब्रो-रंगे-सुकून में हूँ , मुझे संभालो मेरे सहारों सबब है इस इल्तिजा के पीछे, के चल बसा हूँ ओ मेरे यारों ---बवाल
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लिजिये आप सब की नजर दो शॆर

मै शाय्रर तो नही.... अजी मै कोई गीत नही गा रहा, ओर ना ही शॆर लिख रहा हुं, बस यह दो शॆर पढे, मन को भाये तो आप के सामने पॆश कर रहा हुं. मेरे से तो हिन्दी ही मुश्किल से लिखी जाती है, एक लाईन मै हजार गलतियां, तो फ़िर शॆर ओर कविता कहा से लिख पाऊगां, यह तो
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रचना गौड़ ’भारती’ की रचनाएं

हर बार ख्वाबों में दबे पांव चले आते हो हमने भी इस बार सपनों के ग़लीचे पर सूखी पत्तियों का बिछौना बिछाया है देखें फिर कैसे बे़आवाज़ आओगे
 
रचना गौड़ ’भारती’
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यादों को किसने रोका है

ताउम्र हमको इक यही अफसोस रहेगा कि हम न मुस्कुरा सके आपकी तरह। सुरों और गीतों का अंबार था लगा, पर हम न गुनगुना सके आपकी तरह। (मुझे अपने कुछ पुराने शेर याद आ गए, जो कॉलेज के अंतिम दिनों में लिखे गए थे। उसे मैंने अब यों पूरा किया है - आज भी बातें पुरानी
 
ज्ञानेश उपाध्याय (gyanesh upadhyay)
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