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देगें ईंट का जवाब उनको गोलों से-------ललित शर्मा

काल के कपाल पर नित प्रहार करेंगे,हम  सिपाही है दुश्मन से नही डरेंगे ।देगें ईंट का जवाब उनको गोलों से, हम बर्फ़ के नहीं है जो आग से डरेंगे।जिनकी पीढियाँ करते आई युद्ध यहां,हमेशा कफ़न बांध कर वो ही लड़ेगें ।युद्ध का मैदान सजा छोड़ रहा अर्जुन,सोचता था मेरे
 
ललित शर्मा
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सुनिए एक अद्भुत गीत --सिंदुर ला खोजे वो-----------------ललित शर्मा

आज नवरात्र पर फ़िर एक गीत लेकर आया हुँ भाई दुकालु राम यादव जी का। आप सुने अद्भुत गीत है आनंद अवश्य आएगा।सिंदुर ला खोजे वो.......गीत-भाई दुकालु राम यादव जी से साभारप्रस्तुतकर्ताशिल्पकार
 
ललित शर्मा
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सुनिए--जस गीत "महामाया के दर्शन कर लो"--ललित शर्मा

नवरात्र पर्व पर आज सुनिए दुकालु राम यादव जी के द्वारा गाया गया जस गीत "महामाया के दर्शन कर लो"महामाया के दर्शन कर लोदुकालु राम यादव जी से साभारप्रस्तुतकर्ताशिल्पकार
 
ललित शर्मा
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नवरात्री मे माता का एक जसगीत-------ललित शर्मा

अभी नवरात्री मे माई के सेवा गीत गुंज रहे हैं तथा मेरी इच्छा है कि आपको सुनाए भी जाएं। इसके लिए मेरी कोशिश जारी है। सफ़लता मिलते ही सुनाने के व्यवस्था करुंगा। प्रस्तुत है माता का एक जसगीत (यश गीत)आबे आबे ओ मोर दाई आबे आबे ओ मोर दाई, हिरदे के गाँव मा तोर
 
ललित शर्मा
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लाल -गुलाल -अबीर के छाये हए हैं रंग-----चित्र होली के----------ललित शर्मा

कल होली का हुआ धमाल-हम तो सुबह से ही तैयार हो कर अपने दालान में बैठ चुके थे.........हमारे यहाँ परंपरा है कि लोग अपने से बड़े (पद, प्रतिष्ठा, उम्र और अजीज मित्र ) को पताशों के बने हुए मीठे हार पहनाते हैं........ बहुत ही अच्छी परंपरा है कि होली में कडुवाहट
 
ललित शर्मा
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चंदू घर के अन्दर ही नगाड़े पीटने लग गया है.! होली है-भाई होली है "ललित शर्मा "

परसों होली है, नंगाड़ों की मधुर ताल वातावरण कों होली मय कर रही है. कल शाम कों हमारे घर में नगाड़ों की आवाज सुनाई दी. तबियत नासाज होने के कारण मैं सोया हुआ था. देखा तो चंदू घर के अन्दर ही नगाड़े पीटने लग गया है. भाई होली है......बच्चों बूढों सभी के मन में
 
ललित शर्मा
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मोहन खेलै होरी------होली का रंग-चढ़ गई भंग..........ललित शर्मा ........

फागुन का मौसम है और होली अब कदम बढाते हुए दरवाजे तक पहुँच गई है. हमारे ग्रामांचल में कृष्ण और राधा के होली के फाग गए जाते हैं. गोपियों संग खेली कृष्ण की होली मशहूर है. होली के इर्द-गिर्द बैठ कर जब नगाड़ों की धुन के साथ ये फाग गाये जाते हैं वातावरण होलीमय
 
ललित शर्मा
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काहे को सताय,बाली उमर लरकैया--होली की तरंग (ललित शर्मा)

बस अब फ़ाग-राग और होली का धमाल-व्यंग्य के तीर और स्नेह का गुलाल, ब्लाग जगत मे भी उड़ना शुरु हो गया है। होली का रंग दिखने लगा हैं भंग के साथ---यही होली की रीत है--यही मानुस की प्रीत है----होली के फ़ाग गीतों मे अपुर्व श्रृंगार भरा है। प्रेम उमड़ने लगता
 
ललित शर्मा
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गज़ब कहर बरपा है महुए के मद का भाई........ जोगीरा सर र र र र र र हो..... जोगी जी (ललित शर्मा)

फ़ागुन का मौसम है बस अब मन के रंग-अबीर-गुलाल उड़ रहे हैं, दिलों पर भी मस्ती छाई और हम भी मस्ती मे हैं,  होली आने को जो है, अब उड़े रे रंग गुलाल। अभी से माहौल बन रहा हैं। प्रकृति ने भी अपने समस्त रंगो को धरा पर बिखेर दिया है। सभी झूमे जा रहे हैं, हम
 
ललित शर्मा
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ब्लाग जगत है तैयार-बह रही फ़ागुनी बयार (बिरहा फ़ाग)

बसंत ऋतू आ गई है, वातावरण में रौनक छा गई है-आभासी ब्लाग जगत भी इससे अछूता नहीं है. कहीं ढोल-नंगाड़े बज रहे हैं. कही आचारज जी काला मोबिल आईल लेकर तैयार हैं पोतने को. गिरिजेश भाई ब्लागर की अम्मा से गोइठा-गोइठी सकेल रहे हैं. बस यूँ मानिये की फागुन का स्वागत
 
ललित शर्मा
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कविता का स्वंयवर!!

नव वधु सी लजाती सकुचाती आईवह कविताबिना टिप्पणीबैरंग लिफ़ाफ़े सीलौट आईवह कविताकुछ दिन बादकविता का स्वंयवररचा गयाकर माल लिएरावण को वर आईवह कविताक्योंकिभरी सभा मेरावण ने धनुषखंडित किया अप्रीतम कोवर आई वह कविताआपकाशिल्पकार
 
ललित शर्मा
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नया मौसम आया है जरा सा तुम संवर जाओ

नया  मौसम  आया  है  जरा  सा तुम संवर जाओ जरा सा हम बदल जाएँ, जरा सा तुम बदल जाओ जमी  ने  ओढ़  ली  है  एक  नयी  चुनर  वासंती  गुजारिश है के  अब  जरा  सा  तुम&nbs
 
ललित शर्मा
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मैं परदेश फंसा हूँ आय ......

मैं  परदेश  फंसा  हूँ आय ................................. तोड़  के पिंजरा  एक  दिन, उड़ जाऊँ पंख फैलाय आ बैठा था एक डाली   पे,चन्द्र  किरण को ताके दिवस  हो  तो  मैं  उड़ जाऊँ,  ईत  उ
 
ललित शर्मा
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जंजीरों से बांधने वाली सभ्यता

मैं जंगली हूँ, सीधा सा,भोला सा सबसे डरने वाला अपनी छोटी सी दुनिया में बसने वाला,रहने वाला अपने जंगल को चाहने वाला एक मृग के पीछे चला आया रास्ता भटक गया, पकड़ लिया गया मुझे शहर में घेरकर जंजीरों से बंधा गया मुझे इनमे मेरा अपना कोई नही था सब पीछे जंगल