नमाज़
तेरे लबों की जुम्बिशों का शिकार हूं ,तेरी ज़ुबां की साजिशों से तार तार हूं।कश्ती तेरी जवानी की फ़िर डगमगा रही,जर्जर बुढापे मे भी मैं तेरा किनार हूंतेरा हवाओं का मकां,मेरी चराग़ों सी तहज़ीब फ़िर भी मिलने को बेकरार हूं।इज़्ज़त तुमहारे कारवां की सब ही करते
May 23 2010 06:57 AM



Shuffle







