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सवाल….

सवाल…. जाने कितने सवाल ….. अचानक ही पुरानी यादों में बहते जाते, और एक के बाद एक यादों में खोते जाते… फिर आ खड़े होते वही सवाल…. उसने ऐसा क्यों किया … अब वो कैसा होगा … क्या वो खुश होगा … क्या उसकी ज़िन्दगी में सब
 
Shubhashish Pandey
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कितना वो पानी में है

ख़ुल्द में कब वो मज़ा जो दुनिया-ए-फ़ानी में हैहोश क्या जाने कि क्या-क्या है जो नादानी में हैहौसलों का, हिम्मतों का इम्तेहाँ है ज़िन्दगीजो मज़ा मुश्क़िल में है, वो ख़ाक़ आसानी में हैजो सदा मँझधार से, लौटा भँवर को जीतकर;साहिलों पर बहस अब तक, कितना वो पानी में
 
हिमान्शु मोहन
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लोग पत्थर उठाए फिरते हैं!

लोग पत्थर उठाए फिरते हैंऔर हम सर उठाए फिरते हैंदुश्मनों से गिला भला कैसादोस्त ख़ंजर उठाए फिरते हैंजब कहे बादबाँ* - "चलो", चल दें!हम भी लंगर उठाए फिरते हैंग़ैर पे उँगली उठे या न उठे-हम पे अक्सर उठाए फिरते हैंआस्माँ तू उठा उन्हें जो तुझे-रोज़ सर पर उठाए फिरते
 
हिमान्शु मोहन
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जगहंसाई-हिन्दी शायरी (jaghasai-hindi shayari)

किसी की दौलत और शौहरत देखकरक्यों अपना दिल जला रहे हो,अपने चिराग खुद जलाओदूसरों की रौशनी देखकरअपनी आंखें क्यों गला रहे हो।कह दिये किसी ने अपशब्दभूल जाने में ही भलाई है,रोकर सभी को दर्द बयान करनेव्यर्थ में ही जंगहंसाई है,बोलने वाले को जलने दोअपनी आग मेंतुम
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इश्क, एसोसिएशन और विज्ञापन-हास्य कविता (ishq,association and vigyapan)

छद्म नाम बताकर,पराया फोटो लगाकर,आशिक और माशुका नेअपनी इश्क की कहानी रचाई,हुई दोनों की पहली मीट जो उनकी पहली और आखिरी मुलाकात का संदेश लाई।माशुका गरजते बोली‘हद हो गयी गयी इंटरनेट पर धोखे की,कंप्यूटर की लोग इज्जत इतनी करते जितनी कागज के खोखे की,अब मैं एक
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धूप में जवानी थोड़ा पक गयी है-हास्य कविता (dhoop men javani thoda pak gayi hai-hindi hasya kavita)

अंतर्जाल पर रोज मिलते थेप्यार भरे शब्द एक दूसरे के लिये लिखते थे,बहुत दिन बाद आशिक और माशुका कोआपस में मिलने की बात दिमाग में आई,एक तारीख चुनकर अपनी मीट होटल में सजाई।आशिक पहले पहुंचकर टेबल पर बैठ गयामाशुका थोड़ी देर बाद आई।दोनों ने देखा एक दूसरे कोतब एक
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बरसात

घर से निकला ही था की बरसात हो गयी आज मौसम से अचानक यू मुलाकात हो गयी जाने कब दिखी वो और हम यूँ ही कब तक खड़े रहे पता भी नहीं चला की यहाँ कब रात हो गयी यूँ तो तेरे होठों से लगी वो बस बारिश की एक बूँद थी फिर जाने क्यों [...]
 
Shubhashish Pandey
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ज़माना हुआ

हमको रूठे-मने ज़माना हुआउनसे बिछड़े-मिले ज़माना हुआगर्द आईनों पे, शर्मिन्दा हम सर झुके ही झुके ज़माना हुआअच्छे-अच्छों की नीयतें देखींअपनी बिगड़े हुए ज़माना हुआक़िस्से जारी हैं-रात बाक़ी हैज़िक्र उसका* किए ज़माना हुआहमको अत्फ़ाल* दे रहे हैं सलाहचुपके सुनते हमें
 
हिमान्शु मोहन
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सम्मेलन-हिन्दी व्यंग्य कविता (sammelan-hindi vyangya kavita)

सम्मेलन मेंकुछ रूठे इस उम्मीद में गये किकोई उन्हें मना लेगाकुछ टूटे दिलों ने आसरा किया किकोई उन्हें फिर बना लेगा,मगर वहां जमी महफिल मेंसभी चीख रहे थेगुर्राने के नये नये तरीके सीख रहे थे,सद्भाव के नाम संघर्ष दिखने लगा। सभी ने अपनी अपनी कही,दूसरे की सलाह
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बरसों बाद

ग़ज़ल कहते बना है बरसों बाददर्द से सामना है बरसों बादआज फिर ख़ंजरों का जलसा हैएक सीना तना है बरसों बादभेड़िए सहमे हैं, कोई वारिसशेरनी ने जना है बरसों बादआमना-सामना है बरसों बादमामला फिर ठना है बरसों बाददोनों मिलना तो चाहते हैं मगरबीच में फिर अना है बरसों
 
हिमान्शु मोहन
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एक रुबाई

चार दिन की ज़िन्दगी में उम्र भर के वायदेपीढ़ियों की दुश्मनी के ख़ानदानी क़ायदेदिल की दौलत बाँट कर तू जीत ले सारा जहाँवर्ना गिनता रह टके औ कौड़ियों के फ़ायदेhttp://kas-me.blogspot.com
 
हिमान्शु मोहन
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मुफ़्लिस के अंदाज़े-बयाँ में, अपना वज्हे-तरब दे्खा है

ये पोस्ट संगम-तीरे पर हो चुकी थी। उसके बाद मैंने दोबारा इस ब्लॉग को शुरू करने का मन बनाया, क्योंकि दोस्त यहाँ लगातार आ रहे थे, और तभी मुफ़्लिस साहब ने पूछ भी लिया कि कब ये ग़ज़ल पोस्ट होगी। ज़ाहिर है कि उन्होंने संगम-तीरे नहीं देखा था। सो उनकी बात पर मैं इसे
 
हिमान्शु मोहन
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चन्द अशआर जो तन्हा रहे

ये मेरे वो शे'र और रुबाई हैं जिन्हें कभी कहीं पुर्ज़ों पे लिख के भूला, जब मिले तो टुकड़ों को इकट्ठा करते-करते जो कुछ बचा वो आप को नज़राने के तौर पर सौंपता हूँ। ये मेरे दीवान में भी इसी शक्ल में शामिल होंगे, सिवाय उन अशआर के जिन्हें थोड़ा फेर-बदल के साथ ग़ज़ल
 
हिमान्शु मोहन
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वो कहते है अश्क पीना मुमकिन नहीं

वो कहते है अश्क पीना मुमकिन नहीं दुनिया में ,हम तो कम्बखत जिन्दा है उसी से ।वो कहते है की हमें भुला दिया गया बुरे वक़्त की तरह ,हमें तो याद कुछ नहीं सिवा उनके ।वो कहते है की हम बदनाम हो चुके हर गली में ,हम तो कब से तरसते थे इस नाम को।वो कहते है की हमारी
 
राजेन्द्र मीणा 'नटखट'
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चन्द और पसन्दीदा अशआर

आप सब ने जो पसन्द किया पिछ्ली बार दूसरों का क़लाम, तो आज ख़ाली बैठा था - याददाश्त के सहारे पेश हैं चन्द और मेरे पसंदीदा अशआर - अशआर ही तो ज़ेहन में गूँजे हैं रात-दिनऔर मुझमें नयी जान सी फूँके हैं रात-दिन-'मोहन' यूँ उम्र हमने काटी, दीवाना जैसे कोईपत्थर हवा
 
हिमान्शु मोहन
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तुम हो न सके मेरे !

जिनकी हमें तलाश थी,वो इस तरह मिले,उनसे हुआ जो सामना ,हसरत से ना मिले।ख़्वाब-ओ-ख़याल क्या थे ,मिलने से उनके पहले,फूलों को थे तलाशते ,काँटे मुझे मिले।कल तक रहे जो हमदम, मेरे जनम-जनम के,जनम-जनम की बात क्या,दो पल भी ना मिले।इस ज़िन्दगी में क्या बचा,तनहाइयों
 
संतोष त्रिवेदी ♣ SANTOSH TRIVEDI
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हमने आँगन में दाने डाले हैं.

हमने आँगन में दाने डाले हैं।कबूतर आकर खाने वाले हैं।भोर की लाली छा गयी देखोपंछी अब चहचहाने वाले हैं।मस्जिदों में अज़ान , मंदिरों मेंघंटे अब टनटनाने वाले हैं।न्यूज़ चैनल पे आज फिर कोई,खबर बुरी दिखाने वाले हैं।आज तो घूमने जाना था मगर,घर में मेहमान आने वाले
 
घनश्याम मौर्य
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मेरी ख़ुश्बू

ज़र्रा-ज़र्रा मेरी ख़ुश्बू से रहेगा आबादमैं लख़्त-लख़्त हवाओं में बिखर जाऊँगाज़र्रा-ज़र्रा   मेरी   ख़ुश्बू   से    रहेगा   आबादमैं लख़्त-लख़्त हवाओं में बिखर जाऊँगाhttp://kas-me.blogspot.com
 
हिमान्शु मोहन
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अच्छा लगा

फ़ेसबुक पर किसी प्रशंसक ने पिछले दिनों कहा कि -" विभागीय बातों - रेल से हट कर कुछ देखकर - अच्छा लगा"। बस जनाब, हम अपने शुकराने में जोश में आ गए और उनके कमेण्ट के जवाब में कुछ शे'र अर्ज़ कर दिए वहीं के वहीं। आज ख्याल आया कि क्यों न वो शेर आप सबकी नज़्र किए
 
हिमान्शु मोहन
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हर काम का दाम-व्यंग्य कविता (word and prize-hindi satire poem)

लोहे के सामान में जान फूंकने वालापेट्रोल मंहगाऔर आदमी को जिंदगी देने वालापानी बहुत सस्ता है।बहाते हैं लोग पानी मु्फ्त का मानकरपर पैट्रोल की कदर करते महंगा जानकरबिना दाम लिये भलाई करने सेखुद के दिल को तसल्ली जरूर हो जाती हैपर जमाने में कद्र पाने के लियेहर
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सबसे बड़ा हमदर्द-हास्य कविता (Hamdard-hasya kavita)

लोगों के जल संकट से हमदर्दी जताने के लिये उन्होंनेपूरा एक दिन सड़क परअनशन कर बिताया।भले ही तंबू को चारों तरफ से ढंककरगर्मी से बचने के लिये ऐसी भी लगवाया,समय अच्छा बीते इसलिये टीवी भी चलवाया,चेलों ने मजे लेकर नारे लगायेउनको लोगों का सबसे बड़ा हमदर्द
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ग़ज़ल

आज आल्मारी साफ़ करते समय एक पुर्ज़े पर लिखी हुई अपनी एक पुरानी रचना (2007 की) पड़ी मिली। सोचा कि आप को ही पेश कर दूँ-न दीन और न  ईमान रहादिल बुतों पे सदा क़ुर्बान रहावो जिसने हम पे लगाई तोहमतसुना फिर बरसों परेशान रहादो घड़ी के सुकून की
 
हिमान्शु मोहन
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लायक बच्चे पैदा करने का नारा-व्यंग्य चिंतन और हास्य कविता (woman and child-hindi article and comic poem)

यह एक अजीब बहस है। इस पर केवल हंसा ही जा सकता है जब कोई धर्म गुरु नारियों से कहता है कि ‘उन्हें तो लायक बच्चे पैदा करना चाहिये।’आखिर उनके कहने का क्या मतलब है कि अगर कोई इंसान नालायकी या शैतानियत पर उतारू हो तो उसकी जननी को जिम्मेदार माना जाना चाहिये।
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तुम्हारे जज़्बात-हिन्दी शायरी (tumhar jazbat-hindi shayri)

अपने जज़्बातों को दिल में रखोबाहर निकले तोतूफान आ जायेगा।हर बाजार में बैठा हैं सौदागरजो करता है व्यापार जज़्बातों कावही तुम्हारी ख्वाहिशों से हीतुमसे तुम्हारा सौदा कर जायेगा।यहां हर कदम पर सोच का लुटेरा खड़ा हैदेख कर ख्याल तुम्हारेख्वाब लूट जायेगा।इनसे भी
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अपना अपना दाव-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (apna apna daav-hindi satire poem)

अंधों की तरह रेवड़ियां बांटने काचलन अब आंख वालों में भी हो गया है।कहीं पुजते दौलतमंदकहीं सजते ऊंचे ओहदे वालेकहीं जमते बाजुओं में दम वालेतो कहीं उनके चाटुकार चमकते हैंलोगों के हैं अपने अपने दावउजले नकाब पहनने पर हैं आमदा क्योंकि चरित्र सभी का खो गया
 
दीपक भारतदीप
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सफेद कागज-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (white paper-hindi satire poem)

सिर उठाकर आसमान में देखा तो लगाजैसे हम उसे ढो रहे हैं,जमीन पर गड़ायी आंख तो लगा किहम उसे अपने पांव तले रौंद रहे हैं।ठोकर खाकर गिरे जब जमीन पर मुंह के बल न आसमान गिरान जमीन कांपीतब हुआ अहसास कि हम कोई फरिश्ते नहींबस एक आम इंसान हैजो इस दुनियां को बस भोग
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चरित्र की कालिख-होली पर हिन्दी लघुकथा तथा हंसिकायें (chartra par kalikh-hindi short story and comic poem on happy holi)

वह दो नंबर की कमाई के कारण बदनाम हो गये थे। तमाम तरह की जांचें चल रही थी। अखबार में बहुत सारी बातें अक्सर उनके बारे में छपती रहती हैं। इस बार होली पर लोग उनके घर पर पहुुंचे। लोगों का क्या है? वह तो जिसके पास भी दौलत होती है उसके बारे में यही कहते हैं कि
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चाटुकारिता का फन-व्यंग्य कविता (chatukarita ka fun-hindi vyangya kavita)

बाजार के खेल में चालाकियों के हुनर में माहिर खिलाड़ीआजकल फरिश्ते कहलाते हैं।अब होनहार घुड़सवार होने का प्रमाणदौड़ में जीत से नहीं मिलता,दर्शकों की तालियों से अबकिसी का दिल नहीं खिलता,दौलतमंदों के इशारे परअपनी चालाकी से हार जीत तय करने के फन में माहिरकलाकार
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होली या दिवाली-आलेख और व्यंग्य क्षणिकायें (holi ho ya diwali-hindi article and satire poem)

होली हमारे देश का एक परंपरागत त्यौहार है जो उल्लास से मनाया जाता रहा है। यह अलग बात है कि इसे मनाने का ढंग अब लोगों का अलग अलग हो गया है। कोई रंग खेलने मित्रों के घर पर जाता है तो कोई घर पर ही बैठकर खापीकर मनोरंजन करते हुए समय बिताता है। इसका मुख्य कारण
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उम्मीद-ए-सहर

फैज़ याने एशिया का नेरूदा या नेरूदा याने लैटिन अमरीका का फैंज! सर्वहारा के सुर्ख लाल झंडे पर चमकते दो प्यारे सितारे। फैज़ और नेरूदा की रचनाये देशकाल से निकलकर अपने फन के दायरे में पुरी दुनिया को समा लेती हैं। दोनो ने कलम के साथ-साथ अपने कर्म से भी ताउम्र
 
परेश टोकेकर 'कबीरा'
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उल्लुओं का क्या होगा-हिन्दी हास्य कवितायें

क्रीम पाउडर से सजे चेहरे सौंदर्य का पर्याय बन गये हैं, भयानक चेहरे भी खूबसूरती की दौड़ में भागने के लिये बनठन गये हैं। ———– न राई थी, न पहाड़ था, न तिल था, न ताड़ था, फिर भी वह ख्वाब बेचकर सौदागरों ने पैसा कमाया। इसतर बड़े ठग ने छोटे
 
दीपक भारतदीप
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ऐसे लोग कम हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता

सभी को बताये रास्ते पर खुद चलें, ऐसे लोग कम हैं। दूसरे को सिखायें दांवपैंच, जो अजमाने में खुद बेदम हैं।। हवा के झौंके से कांपने लगता है पूरा उनका बदन, जमाने को डरपोक बतायें, अपनी बहादुरी के उनको वहम हैं।। दूसरों की रौशनी में चले हैं पूरी जिंदगी का
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आधी हमदर्दी-हिन्दी हास्य कविता (hamdardi-hindi hasya kavita)

एक आदमी  ने रुंआसा होकरअपने दोस्त को बताया‘यार, लुटा हुआ महसूस कर रहा हूंजब से वह फिल्म देखकर आया,बहुत शोर मचा थामैं भी उसके जाल में फंसा थानायक ने ऐसा वैसा कोई  दिया था बयान,विरोधियों ने अपने तीर लिये तान,पता नहीं फिल्म कैसे बीच में आ गयीमुफ्त
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सच बोलने पर इनाम नहीं होता-हिन्दी व्यंग्य शायरी (sach bolen par inam-hindi vyangya shayri)

इंसान की हर अदा पर मिलते हैंपर सच बोलने पर कोई इनाम नहीं होता।कितना भी हो जाये कोई अमीर,पीछा नहीं छोड़ता उसका जमीर,कैसे दे सकते हैं इनाम, उस शख्स कोबोलता है हमेशा सच जो,खड़ी है दौलत की इमारत उनकी झूठ परचाटुकारों को लेते हैं, अपनी बाहों में भरक्योंकि सच
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अब वैसी नहीं रही मधुशाला-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (madhu shala-hindi comic poem)

बात हो गयी पुरानी, नहीं लगती अब दिल को सुहानी,कि मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारेकराते आपस में बैर जबकि मिलाती है मधुशाला।अब तो मंदिर, मस्जिद और गुरुदारों कीजंगों के लिये योजनायें बनाने के लिये सजती है मधुशाला।पीने वाले भले हीएकता के नारे लगाते होंजमाने के
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मुस्कराहट और आंसु-हिन्दी व्यंग्य कविता (muskrahat aur ansu-hindi vyangya kavita)

हादसे हों या खुशी के मौकेबाजार के सौदागरों के हाथलड्डू ही आते हैं,क्योंकि कफन हो या लिबासवही से लोग लाते हैं।चीजों के साथ जज़्बात भीकहीं मोल मिलते तोकहीं किराये परइसलिये कृत्रिम मुस्कराहट बेचने वालेआंसु भी बेचते नज़र आते हैं। कवि लेखक एंव संपादक-दीपक
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श्लीलता और अश्लीलता का भेद-हिन्दी हास्य कविता (hindi hasya kavita on fasion)

समाज के ठेकेदार सेउसके दोस्त ने पूछा‘यार, तुम वैलंटाईन डे परप्यार की आजादी की जंग लड़ते हो,जो आधा शरीर ढके वस्त्र पहनेउनके साथ देने का दंभ भरते हो,क्यों नहीं वस्त्रहीन घूमने पर लगीरोक ही खत्म करवा देते,श्लीलता और अश्लीलता का भेद मिटा लेते।’प्रश्न सुनकर
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इंसाफ का दरबार-हिन्दी व्यंग्य कविता (insaf ka darbar-hindi comic poem)

होते हथियार में तो हम भीअमन के पहरेदारों की तरहअपनी अदायें दिखाते।लूट की दौलत होती तो ईमानदारों की सूची मेंअपना नाम लिखाते।इस जमाने में भलमानसियत केमायने अब पहले जैसे नहीं रहे,लुटेरों और हमलावरों को हर इंसान सलाम कहे,बेकसूरों का खून बहाने की ताकत जिनमें
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इंसानी दिल-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं (heart of man-hindi satire poem)

मतलब के लिए इंसानअपना दिल इस तरह बदल जातेकि आखें होती तोबेपैंदी के लोटे भी देखकर शर्माते।जुबान होती तोएक दूसरे पर इंसान होने का शक जताते।----------नब्बे फीसदी सांपजहरीले नहीं होतेयह विशेषज्ञ ने बताया।तब से इंसानों की सांप सेतुलना करना बंद कर दिया
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महानायक-हिन्दी व्यंग्य कविता (great actor-hindi comic poem)

पर्दे पर अभिनय करते हुएकई लोग महानायक हो जाते हैं,जमीन पर कभी नहीं पड़ते उनके पांवकभी खेतिहर तो कभी मजदूरी का करते अभिनयगरीब के हमदर्द की भूमिका मेंबटोरते हुए तालियांकिसान प्रेमी होने का दिखावा करते  पर देखा न होता कभी गांव,फिर भी आम इंसानों की आखों
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