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नेताओं की कहानी, शायर ” अशोक ” की जुबानी !!!

आडवाणी जी मंदिर बनवाओगे कब तक हिन्दुओं को यूँ ही बहलाओगे कब तक देश की जनता इतनी नादां नहीं है तुम अपनी रोटी पकाओगे कब तक मनमोहन जी कुछ »
 
शायर " अशोक "
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तुमने समझा तो मगर शायर ही बस समझा मुझे...--->>> दीपक 'मशाल'

शायरतुमको खोने का वो डर था जिससे मैं डरता रहामेरे डर को देख तुमने कायर ही बस समझा मुझेजब भी अपना हाल-ए-दिल मैंने लफ़्ज़ों में कहातुमने समझा तो मगर शायर ही बस समझा मुझे... दीपक 'मशाल'छवि गूगल से
 
दीपक 'मशाल'
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दुनिया-ए-फ़ानी से बेलौस गुज़र गए नीरज कुमार

मैं सैनिकों के रानीखेत क्लब में पर्वतराज हिमालय की ओर मुंह किये नंदा देवी की मनोरम चोटी को अपलक निहार रहा था, जो मुझे मिस्र के किसी बच्चा पिरामिड की तरह लग रही थी. वह इतवार की फुरसतिया सुबह थी. 'कबाड़खाना' वाले अशोक भाई खुद को फुर्ती से भरकर मित्रों
 
विजयशंकर चतुर्वेदी
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सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र खून में तर

सहमा सहमा हर इक चेहरा मंज़र मंज़र खून में तर शहर से जंगल ही अच्छा है चल चिड़िया तू अपने घर तुम तो ख़त में लिख देती हो घर में जी घबराता है तुम क्या जानो क्या होता है हाल हमारा सरहद पर बेमोसम ही छा जाते हैं बादल तेरी यादों के बेमोसम ही हो जाती है बारिश दिल
 
JATINDER PARWAAZ
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