नहीं निगाह में मंजिल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यह ग़ज़ल मुझे बहुत प्रिय है।आबिदा परवीन के स्वर में इसे सुनना तो एक अलग ही किस्म का अनुभव होता है। कैसा अनुभव ? अब क्या बताया जाय ! ऐसा किया जाय कि इसे पढ़ा और सुना जाय ..बस्स... नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही।
नहीं विसाल मयस्सर
Apr 24 2010 07:42 PM



Shuffle








