पसंद करें
3
नापसंद करें

नहीं निगाह में मंजिल

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यह ग़ज़ल मुझे बहुत प्रिय है।आबिदा परवीन के स्वर में इसे सुनना तो एक अलग ही किस्म का अनुभव होता है। कैसा अनुभव ? अब क्या बताया जाय ! ऐसा किया जाय कि इसे पढ़ा और सुना जाय ..बस्स... नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही। नहीं विसाल मयस्सर
पसंद करें
0
नापसंद करें

जोगीड़ा सारा रारा ...

लीं साहेब 'सुरु' हो गयल फ़गुआ ...गाईं , बजाईं चाहे खाली सुनीं आ राग ताल पर माथा धूनीं ॥फगुआ त ह..यह होली गीत या फगुआ भोजपुरी इलाके में कई रूपों में ( कुछ शब्दों के हेरफेर के साथ ) मिलता है लेकिन इसमें उल्लास और मस्ती सब जगह एक जैसी ही पाई जाती है। आज