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डायरी में दर्ज एक शाम ...कुछ नहीं ...बस ...यूँ ही ....

हाथ में चाय की प्याली लिए सूरज को ढलते हुए देखना...अपनी छत से ही सही ....मुझे बहुत रूमानी -सा लगता है ...शाम के समय जब दूर क्षितिज में सूरज का सिन्दूरी गोला धीरे धीरे लुढ़कता अदृश्य धरती की ओर बढ़ता है आसमानी रूई के फाहों से बादलों के बीच रचती इस
 
वाणी गीत
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उस नीम के पेंड के पत्ते !

मैं अटक जाता हूँउस नीम के पेंड पे,जब भी कोई रंग हो,रौशनी होया फिर बसंत हो, बहार होआज भी होली पेशाम तक डोलते रहेंगे मेरी शाख पेउदासी के सफ़ेद रंग मेंसूखे हुएउस नीम के पेंड के पत्तेमैं अटक जाता हूँउस नीम के पेंड पेजो कभी गुलमोहर था
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बारिश में भींगती शाम

भरी दोपहर में घर लौटकरदेखाकि तुम कहीं औरमुझसे दूर, बहुत दूरबारिश में भींगती शाम लग रही होमैंने अक्सर सोंचा हैकि तुम बारिश में भींगती शाम हीं होया उसके लिएमेराभरी दोपहरी में होना जरूरी हैऔर तबमेरी आँखें मुस्का गयी हैं ये जान कर किदरअसल मेरी सोंच हीं
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बिखरे सितारे...! १४)... जहाँ औरभी थे..

पूजा की माँ ने क्या कहा पूजा से?...अब आगे पढ़ें...) पूजा अपने आपको हज़ार कामों में व्यस्त रखती...उस समय वो रसोई साफ़ कर रही थी..माँ तभी शहर से लौटी थीं...चुपचाप पूजा के पीछे आके खड़ी हो गयीं.... आहट हुई तो पूजा ने मुड के देखा...माँ बोलीं, " क्या तुझे '
 
kshama
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बरखा रानी....!

बरखा रानी ! आओ ना, आ जाओना, इतना भी तरसाओ ना, ...के इंतज़ार है एक 'शम्म' को तुम्हारा...के इंतज़ार है, इस क़ुदरत के हर पौधे, हर बूटेको, तुम्हारा... के तुमबिन सरजन हार कौन है इनका?के तुमबिन पालन हार कौन है इनका?" चंद रोज़ पूर्व, अपने "बागवानी" ब्लॉग पे क
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