डायरी में दर्ज एक शाम ...कुछ नहीं ...बस ...यूँ ही ....
हाथ में चाय की प्याली लिए सूरज को ढलते हुए देखना...अपनी छत से ही सही ....मुझे बहुत रूमानी -सा लगता है ...शाम के समय जब दूर क्षितिज में सूरज का सिन्दूरी गोला धीरे धीरे लुढ़कता अदृश्य धरती की ओर बढ़ता है आसमानी रूई के फाहों से बादलों के बीच रचती इस
May 01 2010 08:01 AM



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