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भूमकालः साथियों के साथ एक सफर

हाशिया पर हमने आउटलुक में प्रकाशित अरुंधति राय की चर्चित रिपोर्ट का अभिषेक श्रीवास्तव द्वारा हिंदी में संक्षिप्त अनुवाद पोस्ट किया था. इस रिपोर्ट ने देश और दुनिया में माओवाद और सामाजिक रूपांतरण में हिंसा के उपयोग पर एक नई बहस को जन्म दिया था. इस विवाद
 
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विद्रोहों के केंद्र में कुछ रातें और कुछ दिनः जन मिर्डल व गौतम नवलखा

बस्तर और माओवादी प्रभाव वाले इलाकों के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के बारे में एक और रिपोर्ट आई है. स्वीडेन के लेखक जन मिर्डल और मानवाधिकार कार्यकर्ता तथा ईपीडब्ल्यू के सलाहकार संपादक गौतम नवलखा हाल ही में उन इलाकों से लौटे हैं. उन्होंने
 
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पढ़िए अरुंधति कोः बंदूक की नली से निकलता ग्राम स्वराज

अरुंधति राय, दंडकारण्य से लौटकरअनुवादः अभिषेक श्रीवास्तवदंतेवाड़ा को समझाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह एक विरोधाभास है। भारत के हृदय में बसा हुआ राज्यों की सीमा पर एक शहर। यही युद्ध का केन्द्र है। आज यह सिर के बल खड़ा है। भीतर से यह पूरी तरह उघड़ा पड़ा है।
 
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शोकगीत नहीं, उल्लास का उत्सवः पढ़िए अरुंधति को

आनेवाले दशकों में शायद इसे एक क्लासिक की तरह पढ़ा जाएगा. इन बेहद खतरनाक- और उतने ही शानदार- दिनों के बारे में एक विस्तृत लेखाजोखा. पिछले एक दशक से अरुंधति के लेखन में शोकगीतात्मक स्वर बना हुआ था, पहली बार वे इससे बाहर आई हैं और पहली बार उनकी किसी रचना
 
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छत्तीसगढ़ कहत हे, जियन दे हमनला

यह छत्तीसगढ़ की आवाज है, जो सारे देश की जनता का प्रतिनिधित्व करती है. साम्राज्यवाद के चमकदार स्टूडियो में बैठ कर भनभनानेवाली मक्खियों, आक्रामक, बदतमीज और उज्जड टीवी पत्रकारों और उनके मालिकों का देश नहीं, भूखे और वंचित लोगों का देश. यह आवाज सुनिए. इसे
 
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...तो हम कभी नहीं ठिठकेंगे

देश अपने गणतंत्र के 60 वें वर्ष में अपने ही नागरिकों के खिलाफ छेड़े गए दर्जन भर से अधिक युद्धों, लगभग एक अघोषित आपातकाल, लाखों किसानी आत्महत्याओं और एक अदद इरोम शर्मीला के साथ दाखिल हो रहा ही. इरोम ने अपने अनशन के दस वर्षों में इस लोकतंत्र का
 
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