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कोलकाता कोलकाता ही रहे तो गनीमत है!

शहर और उसके लोगअरुण माहेश्वरीपश्चिम बंगाल के हाल के नगरपालिका चुनाव में कितनी भी राजनीतिक उत्तेजना क्यों न रही हो, इनके दौरान बहसों और बातों के कुछ ऐसे पहलू देखने को मिलें, जिन पर इस स्तंभ के पाठकों से कुछ दिलचस्प चर्चा की जा सकती है। मसलन्, ममता बनर्जी
 
अशोक कुमार पाण्डेय
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नए जमाने में पुरानी सोच वाले गुरु और शिष्य के संवाद का एक लघु अंश

आज आभासी संसार और वास्तविक वातावरण में टहलते हुए दो नए जन मिले। देखने से गुरु शिष्य लगते थे। विपरीत दिशाओं से आते हुए जब हम लोग पास हुए तो उनकी बातचीत के कुछ अंश कानों में पड़े। अच्छे लगे , सोचा आप सबको भी बता दूँ। उनके पीछे पीछे नहीं जा पाया। उनकी निजता
 
गिरिजेश राव
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शहर के भीतर शहर की खोज

शहर की आंखें कैसी होती है, शहर के पांव कहां-कहां पहुंचते हैं..इस तरह की कई सवाल हैं जो शहर को समझने के दौरान हमारे-आपके सामने खड़े हो जाते हैं। इसी बीच जब यह पता चलता है कि शहर के भीतर कई शहर होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे आदमी के भीतर हजारों आदमी, तब आप
 
गिरीन्द्र नाथ झा
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बचकाना सा एक सपना

मेरा एक सपना हैकि मैं दिल्ली कीरिंग रोड कोदेख सकूँ रात कोकैसी लगती हैंबंद दुकानें और रेस्टोरेंटखाली सड़केंबिना ट्रैफिक की,बैठ जाऊँ मैंसड़क के डिवाइडर परऔर लिखूँएक कविता,मेरा यह सपनाबचकाना लग सकता हैपर इसे पूरा होने मेंलग सकते हैं वर्षोंजब एक अकेली
 
mukti
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शहरीकरण का बोझ नहीं सह पाएगा धरती का पर्यावरण

चाहे शहरी चकाचौंध का आकर्षण हो या रोटी कमाने की मजबूरी लेकिन सच यह है कि दुनिया की करीब आधी आबादी शहरों में बसने लगी है। वातावरण में हर साल कार्बन डाईआक्साइड के रूप में घुलने वाले जहर की 80 फीसदी मात्रा इन्हीं लोगों की वजह से है। विशेषज्ञ बार-बार चेत
 
पर्यानाद
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शहर

आँगन छुटा, गलियां छुटी छुटे सब संग - साथ हम से हुयी थी क्या खता हम हुए बेगाने अपने शहर मे और शहर ने हमें काफिर बना डाला ग़मों से दूर तक रिश्ता न था हम बसा रहे थे अपनी दुनिया अमन वालों ने ही जला डाली दुनिया लुट डाली हया और आँखे हमारी शहर ने हमें काफिर
 
Dhiraj Shah
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अपना हीं घर वह तो नहीं

  गमगीन है हर आदमी क्यों खो गया सुख चैन । क्यों रोकता कोई नहीं इस जंग को तूफान को । क्यों बह रहा है नालियों में खून मेरे अपनो का । शाख  पर जो स्वप्न थे क्यों झड़ गया वह पर्ण है । क्यों हो रहा नंगा यहाँ सब कैसी मची हुरदंग है । जो चले थे हम जलाने
 
चंदन कुमार झा
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कंक्रीट के जंगल

जल रहा है शहरआज अपनो सेलोगो ने जला डालेअपने अपने आँगनजहाँ कभी आँगन मे गुजती थीचिडियों का कलरवआज गूंजती हैकेवल सुनी हवाएंकभी आँगन मे पड़ते थे झूलेझूलो पर चहचहाती हँसीआज गूंजती हैसुनी आवाजेजल रहा है शहरआज अपनो सेलोगो ने जला डालेअपने अपने आँगन
 
धीरज शाह
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शहर बदल गया

बस स्टैंड के सामने झोपड़ी नहीं फ्लैट दिखने लगे, खाली पड़े मैदान में रातों-रात उग आया मॉल, कूचा अमीर सिंह, चोर गली, गली संगतराशान, के नाम पर रिक्शा वाले तो दूर दुकान वाले भी होने लगे हैरान, लेकिन कभी नहीं लगा कि शहर बदल गया। अपने ही स्कूल की इमारत में
 
mediajantantra
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सल्मडॉग मिलेनियर: बॉलीवुड मसाले का फ़िरंगी तड़का. बोले तो ’जय हो!’

स्ल्मडॉग मिलिनेयर देखते हुए मुझे दो उपन्यास बार-बार याद आते रहे. एक सुकेतु मेहता का गल्पेतर गल्प ’मैक्सिमम सिटी: बाँबे लॉस्ट एंड फ़ाउन्ड’ और दूसरा ग्रेगरी डेविड रॉबर्टस का बेस्टसेलर ’शान्ताराम’. हाल-फ़िलहाल इस बहस में ना पड़ते हुए कि स्लमडॉग क्या भारत