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वो देस मेरा अँखियों में बसता (प्रवास में देस की मधुर स्मृतियाँ } [गणतंत्र दिवस पर विशेष] - शशि पाधा

मत पूछो क्यों तन मन हँसतापगध्वनि में क्यों साज सा बजताअंग-अंग में थिरकन उठतीअधरों पे मृदु गीत सा सजतामैं अपने देस थी गई सखिवो देस मेरा अँखियों में बसता ।रचनाकार परिचय:-हिंदी और संस्कृत में स्नातकोत्तर शशि पाधा १९६८ में जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय की
 
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स्वागत है नव वर्ष - [कवितायें] - शशि पाधा/ आचार्य संजीव वर्मा "सलिल" / अम्बरीष श्रीवास्तव/ डॉ. वेद व्यथित

नव वर्ष अभिनन्दन में - शशि पाधादीप जलते रहें, जगमगाते रहेंजग के आँगन में खुशियों का मेला रहेफूल खिलते रहें, मुस्कुराते रहें |रसभीनी सी पुरवा बहे चहुँ ओरहो पूर्ण सभी की मनोकामनाहर द्वारे पे सत रंग रंगोली सजेहर रिश्ते में मंगल हो सद्भावनामन रंजित रहें, नैन
 
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अविरल क्रम [कविता] - शशि पाधा

रचनाकार परिचय:-हिंदी और संस्कृत में स्नातकोत्तर शशि पाधा १९६८ में जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय की सर्वश्रेष्ठ महिला स्नातक रहीं हैं। इसके अतिरिक्त सर्वश्रेष्ठ सितार वादन के लिये भी आप सम्मानित हो चुकीं हैं। २००२ में अमेरिका जाने से पूर्व आप भारत में एक
 
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