वो देस मेरा अँखियों में बसता (प्रवास में देस की मधुर स्मृतियाँ } [गणतंत्र दिवस पर विशेष] - शशि पाधा
मत पूछो क्यों तन मन हँसतापगध्वनि में क्यों साज सा बजताअंग-अंग में थिरकन उठतीअधरों पे मृदु गीत सा सजतामैं अपने देस थी गई सखिवो देस मेरा अँखियों में बसता ।रचनाकार परिचय:-हिंदी और संस्कृत में स्नातकोत्तर शशि पाधा १९६८ में जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय की
Jan 26 2010 05:04 AM



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