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शर्म

(तभी वह चाहता है कि सभी बेशर्म हो जाएँ तो उसे शर्म करने की आवश्यकता न हो । और यह खेल अनवरत रूप से चल रहा है । चाहे आज किसी भी क्षेत्र में देख लें )। भारतीय संस्कृति-सभ्यता-समाज और व्यक्तिगत आचरण में शर्म का बहुत ही महत्त्व है। अब तो यह कहना चाहिए कि ;
 
शंकर फुलारा
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अभिमान

जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था तो उसी दौरान उसकी मुलाकात एक साधु से हुई थी । जब सिकंदर उसके पास पहुंचा तो वह धूप का आनंद ले रहा था । साधु की बातचीत से प्रभावित हो कर सिकंदर ने पूछा,''महाराज, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं?'' उसने कहा,''तुरंत यहां से
 
दिनेश शर्मा
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शर्म और प्रेम

साँस उखड़ती जाती है पलकें झुकती जाती हैं गाल सुर्ख़ हुए जाते हैं ऊँगलियाँ खेलती जाती हैं बालों की घुंघराली लटों से पैर क़ुरेदते जाते हैं ज़मीन को पर लबों की हिमाकत तो देखिए कहे चले जाते हैं अभी भी हमें उनकी परवाह नहीं!