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शब्दों का षडयंत्र

कभी-कभी ये शब्द मेरे, मुझसे बेईमानी करते है| ख़ुद को इधर उधर करके, कुछ अनचाहा सा गढ़ते है | भाव का होता है आभाव, रस अलंकार से लड़ते है | कभी कभी पन्ने मेरे , कुछ चितकबरे से दिखते हैं | पहले मैं यही समझता था, मैं जादूगर हूँ शब्दों का | पर उलझाकर ये मुझ
 
Tapashwani Anand