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शब्द शब्द मुका

शब्द तयार आहेत हीच एक मोठी अडचण आहे. कारण शब्दांचे आपले आपले स्वभाव आहेत, ज्याचे-त्याचे अर्थ आहेत. ते फार तोकडे पडतात. काही लिहायचं असेल, मन भरून आलं असेल तरीदेखील शब्द दगा देऊन जातात. आता पहा मला या पोस्ट मधून काहीच सांगायचं नाही - अगदी काहीही नाही. मग
 
यशवंत कुलकर्णी
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पसीने की धारा-हिन्दी व्यंग्य कवितायें

कभी मेरे बहते हुए पसीने पर तुम तरस न खाना, यह मेरे इरादे पूरे करने के लिये बह रहा है मीठे जल की तरह, इसकी बदबू तुम्हें तब सुगंध लगेगी जब मकसद समझ जाओगे। सिमट रहा है ज़माना वातानुकुलित कमरे में सूरज की तपती गर्मी से लड़ने पर जिंदगी थक कर आराम से सो जाती,
 
दीपक भारतदीप
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ज़माने में जंग की आग लगाकर-हिन्दी शायरी

बंदूक के सहारे ज़माने में बदलाव लाने की कोशिश हथियारों के सौदागरों के दलाल की चाल लगती है, खून बहाकर तरक्की के रास्ते चलने का ख्याल डाकुओं जैसा लगता है, दुनियां के जिंदा रहने के लिये कुछ मूर्तियों का टूटना जरूरी है शैतानों का ख्याल लगता है दरअसल जिनकी रूह
 
दीपक भारतदीप
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घेटो शब्द का प्रयोग जितने बार हुआ, हर बार प्रयोग करने का मन्तव्य अलग-अलग था

साठ साल की उमर हो गई है पर मेरा दुर्भाग्य कि पहले एक ब्लोग में आने से पहले घेटो शब्द से मेरा कभी परिचय नहीं हो पाया था। चलिये अब हो गया, आखिर कुछ नया सीखने-जानने के लिये उम्र की कोई सीमा थोड़े ही होती है। पहली बार जब इस शब्द को पढ़ा तो लगा कि घेटो ने तो
 
जी.के. अवधिया
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पोस्ट बनता है रचनाओं से और रचनाएँ बनती हैं शब्दों से

हम सभी अपने ब्लॉग के लिये पोस्ट लिखते हैं। पोस्ट याने कि लेख शब्दों से बनते हैं। याने कि हर दिन हम शब्दों से खेलते हैं। पर यदि हमसे कोई यह पूछ दे कि "आखिर ये शब्द होता क्या है?" तो हममें से बहुत लोग शायद सिर खुजाने लग जायेंगे। ऐसा नहीं है कि हम नहीं
 
जी.के. अवधिया
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....... शब्द - प्रयोग पर आपकी क्या राय है , अनुरोध है कि बताएं ---

आज पोस्ट के रूप में मैं एक टिप्पणी को रख रहा हूँ , जिसे अभी-अभी श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की 'मानसिक-हलचल' पर करके आ रहा हूँ ...          बात शब्द-प्रयोग को लेकर है , आप लोगों की राय अपेक्षित है ---पूरी टिप्पणी यूँ है
 
अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
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आज बड़े कमीने लग रहे हो ! ! ! !

कमीना’.....‘कमीने’.... चौंक गये आप? जी हाँ चौंकना स्वाभाविक है क्योंकि हमारे समाज में ये शब्द एक गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अभी शायद (शायद की जरूरत है?) ऐसी स्थिति आई नहीं है कि इस शब्द को भद्रजनों की भाषा-शैली में शामिल किया जाये। गाली त
 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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शब्द

शब्द एक दिवस येतो आणि काही वेगळेच शब्द देउन जातो.का ती रागावते? का वापरते ती ते शब्द?का इतक्या छोट्या गोष्टी इतक्या महत्वाच्या ठरतात.तीचा आनंद म्हणजे तरी नक्की काय आहे?मलाही का त्याचे इतके महत्व? मी तरी का असे शब्द बोलण्यात घेतो?कारण शब्द... शब्द हेच
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काही गोष्ठी

काही गोष्ठी सगळ्यांना सांगता येत नाहीत. शब्द कमी पडतात म्हणुन नाही, त्यांना कितपत कळेल म्हणुन. तुम्च्या कडे शब्दांचा भंडार असेल, पण त्यांची समजण्याची क्षमता? ती कशी मोजाल?
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चारोळ्या

बरेच दिवस झाले, येथे काही लिहीले नाही. कारण साधं-सोपं अाहे, पण थोडं विचित्र. मॅक घेतल्या पासुन मराठीत लिहीणं अवघड झाले अाहे. एका ब्रौझर मध्ये अक्षरं व्यवस्थीत दिसत नाहीत, तर दुसऱ्यात व्यवस्थीत लिहीता येत नाहीत. वर आणि स्पेलचेक नाही. बोंबला! ह्या चार ओळी
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स्वप्न बघा

स्वप्न बघा, पण ती खरी होण्याची अट ठेवू नका
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तू अशी जवळी रहा

काही दिवसा पासून हे चित्र, न बघता, सतत दिसत आहे. एकटेपणा नेहमीच वाईट नसतो – कधीतरी स्वतःच्या विचारांना सुद्धा बोलू द्यावं. कधीतरी त्यांचं सुद्धा ऐकावं. पण कधी-कधी – त्यांचा कलकलाट सहन होत नाही. ट्रेंट कंट्री पार्क, लंडन. २७ एप्रिल, २००६