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बहुत याद आएंगे सरोद के उस्ताद

अली अकबर खान चाहते  थे—राजस्थानी संगीत को मिले ऊंचाई सरोद आज ख़ामोश है। मन के तार छेड़ने वाले इस साज़ से आवाज़ आए भी तो कैसे...इसके बादशाह उस्ताद अली अकबर खान मौसिक़ी का संसार और ये फ़ानी दुनिया छोड़कर फ़ना हो गए हैं। अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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14 हसीनाएं, एक दीवाना... घुटने टेक रहा टाइगर

* बीवी  ने उतार कर रख दी शादी की अंगूठी* पति को जमकर पीटा, दांत तक तोड़ डाले* कार दुर्घटना को दिया अंजाम, पहुंचे अस्पताल* फिर सास को पड़ा दिल का दौरा...नहीं...ये किसी मध्यवर्गीय भारतीय पुरुष की दुख भरी कहानी नहीं है...। फिर कौन
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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सुकून के सुर...येसुदास

हज़ारों मील लंबे रास्ते, गांव, गलियारे, नुक्कड़, चौराहे, अलग-अलग लहजा, तरह-तरह की ज़ुबान...यही तो है अपना हिंदुस्तान...विविधता से भरपूर देश, यहां के लोग अलग, उनके संस्कार अलहदा, लेकिन कहीं का भी, किसी इलाक़े का बाशिंदा क्यों ना हो...जब वो चैन चाहता है,
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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व्यापार जगत का महारथी

कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" अर्थात कर्म करो और फल की इच्छा मत करो. यूँ तो हजारों लोग गीता के इस श्लोक क अर्थ जानते हैं लेकिन कुछ ही होते हैं जो इसे अपने जीवन में उतारते हैं. इन्हीं कुछ में से एक थे धीरुभाई अंबानी. एक ऐसा व्यक्तित्व जो आज किस
 
Disha
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गैरेज से शिखर तक

देश, 100 से ज्यादा कार्यालय, 30 हजार से ज्यादा कर्मचारी-अधिकारी और दुनिया भर के कंप्यूटर व्यवसायियों, उपभोक्ताओं का विश्वास..शिव नाडार अगर सबकी अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं, तो इसके केंद्र में उनकी मेहनत, योजना और सूझबूझ ही है। अगस्त 1976 में एक गैरेज
 
चण्डीदत्त शुक्ल
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साहित्य रत्न कवि मैथिलीशरण गुप्त

कवि मैथिलीशरण गुप्त के जन्म दिवस के अवसर पर(३अगस्त-१८८५-१९६४)भारतभूमि ने ऐसे-ऐसे रत्नों को जन्म दिया है जिनका डंका विश्व भर में बजता है. यह हमारा सौभाग्य है कि भारतवर्ष हमारी जन्मभूमि है. कला हो या साहित्य हर क्षेत्र में भारत अग्रणीय है. भारतभूमि के एक
 
Disha