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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : बीबी मांग रही वाशिंग मशीन

दीपावली पर नया खरीदना एक परम्परा बन गयी है और जमाने की रफ्तार बड़ी तेजी से बदल रही है। पहले के जमाने में घर परिवार के अपने कायदे-कानून हुआ करते थे, मगर शहरीकरण तथा उपभोक्तावादी संस्कृति ने सब कायदे-कानूनों को ताक पर चढ़ा दिया है और रह गयी है एक नंगी भूख जो
 
Raviratlami
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वाह रे वाह

ग़ज़ल वहशी को इंसान पे तरजीह, वाह रे वाह आन को दें  ईमान पे तरजीह, वाह रे वाहमात्रा मोड़ के, कायदे तोड़ के, बोले गुरजीदीजो बहर को ज्ञान पे तरजीह, वाह रे वाहख़ुद तो ‘सुबहू’, ‘ईमां’, ‘सामां’ लिखके खिसके-‘नादां’ को ’नादान’ पे तरजीह, वाह रे वाहचार छूट जब
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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आर. के. भारद्वाज का व्यंग्य :

दाग अच्छे हैं............. आजकल टी.वी. पर एक विज्ञापन दिखाया जा रहा है, शायद एक डिटर्जेन्ट का है जिसमें एक स्लोगन दिया गया है कि ’’ दाग अच्छे हैं’’ । मैं उस विज्ञापन बनाने वाली कम्पनी, उसके क्रिएटिव निदेशक, स्क्रिप्ट राइटर को अपना साधुवाद प्रेषित करता है
 
Raviratlami
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तलाक आसान है मगर शादी मुश्किल...

किसी न किसी एक चीज को तो आसान होना ही था. या कहें कि करना ही था. ये क्या कि शादी मुश्किल और यदि एक बार फंस गए तो तलाक महा मुश्किल. अपने देश में शादी-ब्याह की मुश्किलों का ये हाल है कि पहले तो आप धर्म-जाति मिलाएँ, फिर कुण्डली मिलाएँ, फिर शिक्षा-दीक्षा,
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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : मानसून, मच्छर, मलेरिया और मैं

मानसून के तुरन्त बाद मैं बुखार से पीड़ित रहा। डाक्टरों ने शुरू में वाइरल बताया बाद में टाईफाइड का भ्रम रहा और निदान में मलेरिया पाया गया। शुरू में बुखार आते ही मैं नुक्कड़ वाले डाक्टर के पास चला गया। उनके पास डाक्टरी की सनद नहीं है, मगर भीड़ खूब पड़ती है।
 
Raviratlami
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....तो आएगी किस दिन क़यामत पता हो

ग़ज़ल क्यूं करते हैं मेहनत ये नीयत पता हो बीमारों की असली तबीयत पता होतुम्हे गर मेरे सच की जुर्रत पता होतो आएगी किस दिन क़यामत पता होपिता सर पे, पलकों पे माँ को रखेंगेबशत्र्ते कि उनकी वसीयत पता होक्या तोड़ोगे आईना, कुचलोगे चेहरा?करोगे भी क्या गर हक़ीकत पता
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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रूठने से बढती है सुंदरता

कोई भी क्रीम लगाने से आदमी गोरा नहीं होता सुंदर बनना है तो औरतों को रुठना आना चाहिए क्‍योंकि अपन के धर्मेंद्रजी कह कर गए हैं कोई हसीना जब रूठ जाती है तो और भी हसीन हो जाती है। इसलिए अब क्रीम की कंपनियां अपनी मार्केटिंग में इस फार्मूले का इस्‍तेमाल कर
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व्यंग्य - जनता की पेंशन सरकार की टेंसन

व्यंग्यजनता की पेंशन, सरकार का टेंशन वीरेन्द्र जैन वैसे तो जिन्दा लोग सरकारों के लिए हमेशा ही मुसीबत पैदा करते रहते हैं और प्रख्यात समाजवादी चिंतक रामनोहर लोहिया ने कहा भी है कि जिन्दा कौमें पॉच साल तक इन्तजार नहीं करतीं पर ये जिन्दा लोग भिन्न कारण से
 
वीरेन्द्र जैन
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क्या आपमें इस सड़ियल व्यंज़ल को पढ़ने की हिम्मत है?

हिम्मत एक रिलेटिव शब्द है. अफसर बाबू पर और बाबू चपरासी पर हिम्मत दिखाता है. बदले में चपरासी निरीह जनता पर हिम्मत दिखाता है और जनता को अपने काम के लिए अफसर से, बाबुओं से मिलने नहीं देता. टीचर छात्र पर हिम्मत दिखाता है, पर प्राइमरी और मिडिल तक. हाई स्कूल
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वृन्दावन त्रिपाठी ‘रत्नेश’ के व्यंग्य-मुक्तक : अथ पेट पुराण

कुछ लोगों का पेट जैसे तालाब होता है, इनका घर हर तरह से आबाद होता है, ऐसे लोग बेर के काँटे की तरह होते हैं इनकी संगत में अपना ही दामन बरबाद होता है.   कुछ लोगों के पेट बड़े विशाल होते हैं, ऐसे लोग गुरू घण्टाल होते हैं इनके पेट में पानी तक नहीं पचता
 
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पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का व्यंग्य : हमारी भी पूंछ

वैसे तो इस कमबख्त पूंछ पर कई नामी-गिरामी कलमकारों ने कई-कई बार कितना-कितना लिखा है मगर ये पूंछ है भी तो भारत-पाक सम्बंधों पर द्विपक्षीय वार्ताओं जैसी, जिस पर कोई कितना भी जी भरकर लिख लें कुछ न कुछ और लिखने की गुंजाइश रह ही जाती है। आज इस पर आपको यकीन
 
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नेता पर भारी जनता बेचारी

हम भारतीय जनता बेवजह अपनी हालत पर रोते हैं। नेताओं पर लांछन लगाने की आदत हमारी गई नहीं। हमारा यह आरोप भी निराधार ही होता है कि नेताओं के पास बेइंतहा दौलत है। यह इल्जाम भी हमारा बेकार होता है कि नेता जनता के पैसे पर अय्याशी करते हैं। घोटाला वगैरह करके चंद
 
चन्दन कुमार
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यशवन्त कोठारी का हास्य-व्यंग्य : प्रियतम प्रदर्शन प्रतियोगिता

मोहल्ले की महिलाओं ने अपने फालतू समय को काटने के लिए एक पत्नी इनर व्हील क्लब बना रखा है। इस व्हील में वे पैसा अपने पतियों का ही फूंकती थी। यह क्लब अक्सर किसी न किसी प्रकार की प्रदर्शनी का आयोजन करता रहता था। पापड़ प्रदर्शनी, मंगोड़ी प्रदर्शनी, साड़ी
 
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असली बुद्धिजीवी- नकली बुद्धिजीवी (ज़रा सी मसखरी)-- >>>दीपक 'मशाल'

बुद्धिजीवी!!! एक ऐसा शब्द जिससे मेरा तब पाला पड़ा जब उसका मतलब समझ में आने लगा था.. असल में है क्या कि मैंने ये महसूसयाया है कि
 
दीपक 'मशाल'
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बोले तो मुम्बई की घाई में व्यंग्य का झक्कास यज्ञ!

जन्म दिन पर विशेषआपको शीर्षक पढ़कर थोड़ी हैरत जरूर हुई होगी, लेकिन अनूठी मुम्बईया हिन्दी में 'खाली-पीली' व्यंग्य लेखन करने वाले श्री यज्ञ शर्मा पर लिखे इसे लेख के लिए मुझे यही मुफीद लगा.साल २००० का अगस्त का महीना. मुम्बई मेरे लिए बिल्कुल नया शहर था. मैंने
 
~जितेन्द्र दवे~
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तारीफ़ करने से पहले, जरा समझ तो लें?

आप तो, मियाँ, ख़्वामख़्वाह ही तारीफ़ें करते फिरते हैं. आइंदा से किसी के लिक्खे की तारीफ़ करने से पहले जरा सोच समझ लीजिए और “वाह! क्या लिखा है!”, “बढ़िया लिखा है!” जैसी टिप्पणी करने से पहले, तारीफ़ के ये दो शब्द कहने से पहले ये पूरा समझ लीजिए कि जो लिक्खा
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हे प्रभु!! ये कैसी दुनिया तेरी!

कमर का दर्द, वैसे तो अब काहे की कमर, कमरा ही कहो, हाय!! बैठने नहीं देता और ये छपास पीड़ा, लिखूँ और छापूँ, लेटने नहीं देती. कैसी मोह माया है ये प्रभु!! मैं गरीब इन दो दर्दों की द्वन्द के बीच जूझता अधलेटा सा - दोनों के साथ थोड़ा थोड़ा न्याय और थोड़ा थोड़ा
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दामोदर लाल जांगिड़ की हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल

  रुतबा भी सरकारी अजीमों शान सरकारी । मेरा कुछ भी नहीं छोड़कर पहचान सरकारी॥ बहुत बौना हूँ मैं अब भी यदि तुलना करुं तुमसे, बढ़ा पाया नहीं है कद मेरा सम्‍मान सरकारी। मेरी हर जीत होती हैं हमेशा हार से बदतर, पैदी मात खाऊं जो न हो मैदान सरकारी। किसी का
 
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विजय कुमार वर्मा की हास्य व्यंग्य कविताएँ : ३ x साढ़े तीन

हास्य कविता [१] दो करोड़ घूस  लेते धराये एम सी आई अध्यक्ष, पैसा लेकर मान्यता  प्रदान करने का था लक्ष्य गुणवत्ता  अब गौण हो गयी,मजबूत है मुद्रा-पक्ष युधिष्ठिर! अब क्या पूछेगा यक्ष ?    [२] मनरेगा मजदूर हैं बैठे तालाब खोदे
 
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पं.डी.के.शर्मा "वत्स" उर्फ ‘बनवारी लाल’ -तुमको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ?

  आदरणीय पंडित जी,प्रणाम अभी कुछ घंटे पहले ही फोन पर आपसे सोहाद्रपूर्ण तरीके से बतियाने के बाद आपकी ये ताज़ी पोस्ट   बुद्धिमानों का सम्मेलन और बनवारी लाल जी की मन की पीडा   अनायास ही पढ़ने को मिली …जान कर अच्छा लगा कि आप तो पूरे
 
राजीव तनेजा
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अशोक गौतम का व्यंग्य : श्री संतन की सेवा

वैसे पूछें तो सभी के पास होती हैं। क्‍या जानवर, क्‍या आदमी। क्‍या उच्‍च वर्ग, क्‍या मध्‍यम वर्ग। पर जो जानवरों से अपने को जरा सभ्‍य मानते हैं वे उसे सावधानी पूर्वक छुपाकर रखते हैं। चालाक कहीं के!! ये एक चालाकी ही तो है जो उन्‍हें और जानवर को एक दूसरे से
 
Raviratlami
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’हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग’।

हर दिन की तरह आज भी दौड़ते-भागते मेट्रो में कदम रखा तो भीड़ होने के बावजूद सीट कब्जाने में मैं कामयाब हो गया। बिना वक्त गंवाए मैं रोज की तरह किताब के काले अक्षरों में गुम हो गया। मैं पन्ने दर पन्ने पलट रहा था, और मेट्रो, स्टेशन दर स्टेशन भागी जा रही थी।
 
Nitish Raj
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हास-परिहास – 30 साल पहले और आज

~~~~~~~~~~~ 30 साल पहले - स्कूल बैग. आज - ऑफ़िस बैग. 30 साल पहले - नोटबुक आज - नेटबुक 30 साल पहले - हीरो रेंजर आज - हीरो होंडा 30 साल पहले - हाफ पैंट आज – लो-कट फुल पैंट 30 साल पहले – मिट्टी की गाड़ी से खेलना आज – मेटल की पेट्रोल चलित गाड़ी से खेलना 30
 
Raviratlami
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अथ ब्लॉगर जनगणना

आज हमारे गाँव में जनगणना का प्रथम चक्र प्रारम्भ हुआ। नए प्रावधान के अनुसार हम 4 प्राणियों को फॉर्म 2 में प्रवेश दे सदा सदा के लिए हमारी जड़ काट दी गई। मुझे आज दुहरा दु:ख है - जड़ से कट जाने का कम और गाँव जवार में राजपूतों की संख्या में 4 की कमी का अधिक ।
 
गिरिजेश राव
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यशस्वी ब्लॉगर भवः !!

आज दिल्ली में ब्लॉगर मीट हो चुकी है. तरह तरह के विचार रखे गये. ऐसे वक्त में किसी भी और विचार से ज्यादा जरुरी यह विचार हो जा रहा है कि जब लोग इस बारे में कल अखबार में पढ़ेंगे तो ब्लॉग खोलना चाहेंगे. इसी बात को मद्देनजर मैने यह बताता चलूँ कि आजकल जमाना बदल
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मोहरा, अफवाहें फैला कर....

ग़ज़लें1.मोहरा, अफवाहें फैला कर बात करे क्या आँख मिला करऔरत को माँ-बहिन कहेगालेकिन, थोड़ा आँख दबाकरपर्वत को राई कर देगाअपने तिल का ताड़ बना करवक्त है उसका, यारी कर लेयार मेरे कुछ तो समझा करख़ुदको ही कुछ समझ न आयाजब बाहर निकला समझा कर(‘सण्डे पोस्ट साहित्य
 
संजय ग्रोवर Sanjay Grover
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एलियंस समाज की तरफ से प्राप्त एक ई-मेल

मुझे एक ई-मेल मिला है। यह ई-मेल एलियंस समाज की तरफ से है। लगता है काफी मन से उन्होंने इस ई-मेल को लिखा है। बहुत मामूली से संशोधनों के बाद इस ई-मेल को मैं आप सबके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।प्रिय बंधुहमें धरती पर रह रहे मनुष्यों की हर पल की खोज-खबर रहती
 
अंशुमाली रस्तोगी
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व्यंग्य कविता- गोत्र तो नहीं मिलता

एक अगोत्र प्रेमी का शपथ पत्र वीरेन्द्र जैनप्रिये, तुम कितनी सुन्दर हो, तुम्हारा रंग, जैसे कि चाँदनी को मिल जाये ऊषा का संगऔर हमारा गोत्र भी नहीं मिलता तुम्हारा रूप जैसे कि तराशा हो तुम्हें किसी कुशल कलाकार ने और हमारा गोत्र भी नहीं मिलताद्वापर में जिन
 
वीरेन्द्र जैन
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व्यंग्य- न साधु की जात पूछो और न ज्ञान्

व्यंग्य न साधु की जाति पूछो और न ज्ञान वीरेन्द्र जैन यह कहना गलत है कि साधु की जाति नहीं होती। साधु की जाति तो होती है किंतु वह बताना नहीं चाहता। हमारे नीतिज्ञों ने कहा है- जाति न पूछो साधु की, पूछ लीज़िए ज्ञानये बातें अगर सही अर्थों में स्मझी जायें तो
 
वीरेन्द्र जैन
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देश तो साला जैसे सुबह का अख़बार हो गया

व्यंज़ल देश तो साला जैसे सुबह का अख़बार हो गया वो तो एक नॉवेल था कैसे अख़बार हो गया तमाम जनता ने लगा लिए हैं मुँह पे भोंपू मेरा शहर यारों कुछ ऐसे अख़बार हो गया दुश्वारियाँ मुझपे कुछ ऐसी गुजरीं कि मैं एक कॉलम सेंटीमीटर का अख़बार हो गया लोगों ने कर डाली
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व्यंग्य - प्लेटफार्म पर मौतें

व्यंग्य प्लेटफार्म पर मौत वीरेन्द्र जैन ---------------------------------------------------------- मैं आत्महत्या करने जा रहा हूँ कहाँ ? रेलवे स्टेशन पर पर सारी दुनिया में आत्महत्या करने के लिए लोग स्टेशन पर नहीं रेल की पटरियों पर जाते हैं। जाते होंगे, पर
 
वीरेन्द्र जैन
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परदेसी थारी ओल्यु घणी आव , पागल मन न कुण समझाव ईस्ट इंडिया कंपनी जी , आओ नी सा ....पधारो म्हारा और म्हारा पड़ोसिया का देस

परदेसी थारी ओल्यु घणी आव , पागल मन न कुण समझावईस्ट इंडिया कंपनी जी , आओ नी सा ....पधारो म्हारा और म्हारा पाड़ोसिया का देस क्यूंकि म्हाका माजना अस्या ही है ...(क्योंकि हम इसी लायक हैं )जो विष बीज थे बार गया अब फल फूलां से लद गा । आर देखो तो सही थांकी
 
वाणी गीत
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आतंकवादी की नाक खतरे में : अभिव्‍यक्ति में खोल रहे हैं राज : हमारे आपके सबके अविनाश वाचस्‍पति जी

........... आम हालातों में शौहर अपनी बीबी से तभी दुखी होते हैं जब वे उनसे घर के कार्य करवाने लगती हैं और बरतन मांजने के लिए कड़ाके की ठंड में भी गरम पानी की व्यवस्था नहीं करतीं। निःसंदेह इस स्थिति को दुखद माना जा सकता है तो क्‍या आजकल लादेन ऐसी ही विकट
 
पवन *चंदन*
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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : खोज पनघट की

कुछ दिन पहले मैं गांव गया । वहां पर मैंने पनघट की खोज की, मगर मैं पनघट तलाशने में असफल रहा। पनघट गांवों से नदारद वैसे ही हो गया, जैसे गधे के सिर से सींग हो गया है। अब वहाँ भी हैंडपंप है, पनघट की संस्कृति नष्ट हो गई है। कहां गया पनघट ? कोई तो बताये। सच
 
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अशोक गौतम का व्यंग्य : हिंदी लवरों को खुशखबरी

ये बात नहीं थी कि उनके पास स्वर्ग को पहुंचाने वाला पुत्र नहीं था। था तो सही पर सुपुत्र नहीं था। वह उन्हें अस्पताल ही नहीं ले जाता था तो उनको भी पता था कि स्वर्ग क्या ले जाएगा! चिता को अग्नि ही दे दे तो गनीमत। एक दिन वे बातों ही बातों में वचन ले मरे कि जब
 
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शरद तैलंग का व्यंग्य – देश प्रगति कर रहा है

मुझे बहुत दिनों बाद ये बात महसूस हुई कि अपना देश प्रगति कर रहा है। वैसे सुनता तो एक लम्बे समय से आ रहा था कि देश प्रगति कर रहा है परन्तु जब भी घर से बाहर क़दम रखता टूटी हुई सड़क और उसमें जगह जगह गन्दगी के ढेर देख कर विश्वास नहीं होता था कि वाकई ऐसा हो रहा
 
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किसने किसको कितना निचोड़ा?

इस दफा आईपीएल ने वाकई बहुतों को निचोड़ा. धोनी तो खुले आम स्वीकारते हैं कि आईपीएल में खेल खेल कर भारतीय खिलाड़ी पूरे निचुड़ गए हैं इसीलिए विश्वकप में उनकी हार हो गई. आइए, देखें कि आईपीएल ने और किनको कितना निचोड़ा – · सबसे पहले तो दर्शक निचुड़ा. बुद्धू
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बुलाकी शर्मा का व्यंग्य - पहला सुख : निरोगी काया

सुख कई प्रकार के होते हैं परंतु, पहला सुख निरोगी काया का माना जाता है। बीमार शरीर होता है तब सुख का नाम सुनते ही गुस्सा आने को होता है। हमारे शरीर को स्वस्थ रखकर हमें सुख के पालने आनंद लेने का उपकार करता है- डॉक्टर। तभी तो डॉक्टर को परमेश्वर का दूसरा
 
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...गर एलियंस धरती पर आते हैं तो

मुझे एलियंस के धरती पर आने का इंतजार है। मैं उनसे मिलना चाहता हूं। उनसे दूसरे ग्रह के अनुभवों को लेना व सुनना चाहता हूं। उन्हें करीब से देखना चाहता हूं कि वे कैसे लगते व दिखते हैं। उस एहसास को पाना चाहता हूं, जो उन्हें छुकर मिले।सच कहूं तो मैं श्रीमान
 
अंशुमाली रस्तोगी
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भ्रष्टाचारम सर्वत्रम

कार्यालये च विद्यालयेन्यायालये च रक्षालयेविधानालये च वाचनालयेगृहालये च फ़िल्मालयेचिकित्सालये च शौचालये मस्जिदे च मठालयेयत्रम-तत्रम उपस्थितमभ्रष्टाचारम सर्वत्रम.उद्योगे च व्यवसायेपर्यावरणे च भाषायेनिर्माणे च ठेकालयेदुग्धालये च विषालयेखेलम-कूदम और