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जीते रहो!!!

हे! सहोदर! तुम वही ना जो रहे उसी उदर में जिसमें कि मै  उसी पदार्थ से पोषित जिससे कि मै,  फिर क्यों नहीं कोमल भावनाएं तुम्हारी जैसे कि मेरी, फिर क्यों कठोर शब्द तेरे क्यों नहीं मेरे, क्यों मैं पल पल आहत तेरे बोलों से
 
वेदिका
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हे ! भारत भू के धन्य देव ...

भाल भभूत हे! भस्मीभूत हे! शिखर चन्द्र, हें! तपस तंद्र हे! बाम अंग में शैल सुता करुनानिधान, तू योगरताहे! हरे! पितु गणेश बालक हे! दुःख हर्ता तुम जग पालकहे! सिद्धयोग हे! महारथी हे! दानवीर हे! सती-पतिहे! विषपायी हे! अविनाशी वर देते अतुल, खुद वनवासी इतना ही
 
वेदिका
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कोई आया सा है ...

हुयी है दस्तक   दिलो- दिमाग में देख लूँ बाहर    कोई आया सा  है हर पहर   ये साथ कोई चल रहा  कौन है जैसे     मिरा साया सा है छूटने पीछे लगे         
 
वेदिका
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"मौन "

कोलाहल  में बैठी   मौन ,बस निःशब्द लखे तस्वीर बंद हथेली किसे दिखाए ,जाने कौन लिखे तकदीर " क्या सच में ये मै ही हूँ " ,खुद से पूछ , बहाती नीर कोई पूछता चुप हो जाती ,नहीं   बताती  अपनी पीर कुछ पन्नों को गीत
 
Vedika