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तुम कैसे अमर हो जाते हो?? (~जयंत)

बर्फीली चोटियों पर तुम,क्यों अपना शरीर गलाते हो? जम जाता है जहाँ समय भी,क्यों अपना रक्त बहाते हो?तपती मरूभूमि में तुम,क्यों अपना बदन झुलसाते हो?जल जाता है जहाँ लौह भी,तुम कैसे साहस बचाते हो?पथरीले उत्तंग पहाड़ों पर तुम,क्यों अपने घुटने छिलवाते हो?पनप ना
 
Jayant Chaudhary
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पहाड़

एक पहाड़, एक चट्टान, एक विरानगी, क्या-क्या कहते है उसे| अनगिनत नामों से उसे पुकारें| वो जो रास्ते मे खड़ा है, पत्थरों का ढ़ेर बना है| सिने मे उसके, दफन हैं, कई जख्म जैसे| कभी पड़े खून के छीटें, कभी चलीं तलवारें, समय की मार उसे मिली, मिली उसे, निगाहों क
 
मेनका
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भगत सिंह (नाटक - नवीनतम - भाग २) ~जयंत

द्रश्य २ : ( चंद्रशेखर और सुखदेव बैठे हैं ... पीछे से भगत , दत्त और राजगुरु आते हैं ) भ : साथियों , आपका परिचय करा दूँ। ( इशारे के साथ ) आप हैं राजगुरु , बटुकेश्वर दत्त , सुखदेव , और आप हैं चंद्रशेखर आजाद। दा : मित्रों , आप सब को पता होगा की आज की सभ
 
Jayant Chaudhary
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भगत सिंह (नाटक - नवीनतम) ~ जयंत

भूमिका: मैं हूँ बटुकेश्वर दत्त ... मैंने वही हूँ जिसने भारत की आज़ादी के लिए भगत सिंघ , चंद्रशेखर आजाद , राजगुरु और सुखदेव जैसे वीरों और देश - प्रेमियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर फिरंगिओं से लड़ाई की थी॥ एक दिन हमने पंजाब असेम्बली में धमाका कर ब्रिता
 
Jayant Chaudhary
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