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हवा में उड़ता जाए रे… ’अप’

यहाँ कुछ देर से लगा रहा हूँ. जैसा अब आपमें से बहुत लोग जानते हैं, यह लेख ’चकमक’ के बच्चों से मुख़ातिब है. ***** एक फ़िल्म थी पुरानी. नाम था मि. इंडिया. शायद देखी हो तुमने भी. मुझे बहुत पसंद है वो फ़िल्म. उसके कई मज़ेदार किस्सों में से एक मज़ेदार किस्सा
 
मिहिर
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कुछ कुछ होता है.. ज़्यादा गरमी ही होती है..

पता नहीं ऐसी गरमी में लोग पहाड़ कैसे चले जा रहे हैं. जबकि मैं इन पहाड़ सदृश दिनों को अधिक से अधिक फ़ि‍ल्‍मों के पुल से पारने की कोशिश कर रहा हूं. मगर परा कहां रहे है? 'गोन विद द विंड' में तो पहाड़ का एक दृश्‍य भी नहीं है, अलबत्‍ता आग के बहुत सारे हैं,
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तीन फ़ि‍ल्‍में..

ज़्यादा नहीं कहूंगा. बस यही कि अच्‍छी फ़ि‍ल्‍में देखना एक भरोसा देती हैं कि बदलते समय के भभ्‍भड़ में अभी भी सिनेमा की संभावनाओं का अंत नहीं हो गया है. यह बात तब और दिलचस्‍प लगती है जब यह भेद किसी फ़ि‍ल्‍मकार की पहली ही फ़ि‍ल्‍म में दिखे. इज़रायली 'जे
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मुख्‍यधारा से बाहर के असुविधाजनक टेढ़े रास्‍ते..

देख रहा हूं, लिंक्‍स लपेट रहा हूं: जिया झ्यांगके की चीनी दुनिया , कॉमिक आर्टिस्‍ट से सिनेमा में हाथ आजमा रहे एनकी बिलाल की फ्रेंच बंकर पैलेस हॉटेल , और कॉंन्‍सतांतिन लॉपुशांस्‍क्‍ी की रूसी द अग्‍ली स्‍वान्‍स ..
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दु:ख के रिसाव..

सामान्‍यतया, प्रकट तौर पर इतिहास हमेशा हमसे ज़रा दूर, कहीं बाहर चल रही परिघटना की तस्‍वीर बनी रहती है. वह अभागे लोग होते हैं जिनका जीवन सीधे उस भंवर की चपेट में आ जाए. क्‍लॉदिया ल्‍लोसा निर्देशित पेरु की फ़ि‍ल्‍म ' द मिल्‍क ऑव सॉरो ' कुछ ऐसे ही अभागे
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’सेल्समैन ऑफ़ दि ईयर’ के जयगान के बीच संशय का एकालाप

प्यारे बार्नस्टीन, तुम जानते तो हो कि इस मुल्क़ में गुलामी दरअसल कभी ख़्त्म ही नहीं हुई थी. उसे बस एक दूसरा नाम दे दिया गया था. मुलाज़िमत.” –’द असैसिनेशन ऑफ़ रिचर्ड निक्सन’ से उद्धृत. एक तसवीर जिसमें बैठे लोग वापस लौट जाते हैं. एक लैटर बॉ
 
मिहिर
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अंतर्लोक के झमेलों की कैसी तो फ़ि‍ल्‍में.. कैसे फ़ि‍ल्‍मकार..

झमेलाबझे (डिसफंक्‍शनल) परिवारों के दु:ख.. कैसे-कैसे दु:ख.. देखने लगो तो फिर क्‍या-क्‍या दिखने लगता है, कहां-कहां नहीं दिखता! घटक की ' मेघे ढाका तारा ' याद है? परिवारों के भीतर ' मुग़ले-आज़म ' होता है न ' हम आपके हैं कौन ', ज़्यादा कहानियां ' लिटिल मि
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खुद को समझायें बतायें क्‍या?..

भागाभागी में जीवन के कैसे दुर्योग हैं कि जिस दुनिया में आपका मन रमता है अब उसकी तक ज़रूरी नहीं खुद को ठीक-ठीक ख़बर रहे (वैसे मैं तो भागता भी कहां हूं? जो और जितना भागना है खुद से ही भागना है!). सिनेमा की रखता हूं फिर पता चलता है शायद नहीं रख सका हूं.
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जब हमारा घर तैयार होगा: बेला तार की दुनिया

की पैदाइश बेला तार हंगेरियन फ़ि‍ल्‍मकार हैं . भारत में तार की फ़ि‍ल्‍मों से लोगों की विशेष पहचान नहीं, और पहचान बनी भी है तो आमतौर पर सीधे अतिवादी धुरियों तक जाती है. ख़ास तौर पर उनके करियर की बाद की- डैमनैशन, सतानतांगो सी फ़ि‍ल्‍मों में फ़ॉर्म की जै