पसंद करें
0
नापसंद करें

गोरख जागा, मुंछदर जागा और मुंछदर भागा

यह किस्सा गोरख जागा, मुंछदर जागा  और  मुंछदर भागा तक पहुँचाया, और  धीरे धीरे ऎसे अड़चन आन पड़ी और ऎसी बान बनी  कि हिरदय में एक छिन को लगता रानी केतकी की पूरी कहानी मेरे पन्नों पर... पूरा पढ़ें
पसंद करें
0
नापसंद करें

जो कभी हुआ करता, अपना इन्डिया

यद्यपि इन सँकलित चित्रों का ब्लागपोस्ट से कोई सरोकार नहीं है, फिर भी इन्हें एक स्थान पर सँजो रखने की गरज़ से बटोरा है । यदि हमारी अपनी पीढ़ी को यह चित्र विचित्र किन्तु सत्य लग सकते हैं, तो आने वाले कई... पूरा पढ़ें
पसंद करें
0
नापसंद करें

इनकी डायरी में कैद उनकी वर्दियाँ

बहुचर्चित शशि हत्याकाण्ड की गूँज कुछ थम सी गयी है ।  पर  मक़तूल  के  रिश्तेदार, कातिल   और पैरोकार तो इसे अपने अपने ढँग से जी ही रहे हैं !  इस  हत्याकाण्ड ... पूरा पढ़ें
पसंद करें
0
नापसंद करें

जारी है.. रानी केतकी की कहानी

अब तक की कहानी ( यहाँ देखें ) कहानी के जीवन का उभार और बोलचाल की दुलहिन का सिंगार किसी देश में किसी राजा के घर एक बेटा था । उसे उसके माँ-बाप और सब घर के लोग कुंवर उदैभान करके पुकारते थे । सचमुच... पूरा पढ़ें
पसंद करें
0
नापसंद करें
पसंद करें
0
नापसंद करें

चूल्हे भाड में जाय यह चाहत - चाह के हाथों किसी को सुख नहीं

मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच .. उधर  हमको नींद सताती थी, और की सुनिये । अब तक जो पढ़ा सो यह था कि मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ के एक छींटा पानी का मिलना था कि छीटों... पूरा पढ़ें
पसंद करें
0
नापसंद करें

मज़बूत होता जाता रिश्ता

" शारीरिक जीवन के इस कैदखाने में आने से पहले हम कहाँ थे और क्या थे ? " " ये समझदार, सँज्ञाशील और शरीर में  बेचैन रहने वाली आत्मायें हमारे शरीर में आने से पहले कहाँ थीं और क्या... पूरा पढ़ें
पसंद करें
0
नापसंद करें

दीपावली की शुभकामनाओं पर सवार माई लक्ष्मी

दीपावली की शुभकामनाओं का आना आरम्भ हो चुका है  । मेरे मन के किसी कोने में ठँसे हुये उलट  चरित  को  यह  क्यों  लगता  करता  है  कि  ऎसे  रस्मी... पूरा पढ़ें
पसंद करें
0
नापसंद करें

ब्लागपोस्ट की पहेली ?

पिछले हफ़्ते, मैंने ( अपनी समझ के अनुसार ) एक  अच्छी पोस्ट सहेजी,  और लिंक व लेखक का नाम न देकर इसे पहेली का रूप दे दिया । यह एक तरह से ख़ुराफ़ात ही कहा जायेगा । लोगों ने सोचा होगा, एक ... पूरा पढ़ें
पसंद करें
0
नापसंद करें

फुल्ली फालतू चैनल का कवर स्टोरी: घासी राम की भैँस

सबसे पहले -  श्री राजशेखर रेड्डी हमारे बीच न रहे । यहाँ कोई भी शरीर स्थायी परमिट लेकर नहीं आता है, तो उसके न रहने का शोक क्यों ? जिस तरह से उनको विदा होना पड़ा, वह वाकई दुःखद है । किसी भी... पूरा पढ़ें
पसंद करें
0
नापसंद करें

सुकुल पाकड़ के बहाने ईँशा अल्लाह - रानी केतकी की कहानी

प्रसँगतः यह सूत्रपात : मेरे  सह-कर्मचारी  अवधेश द्विवेदी  का  रविवार  को  सुबह सुबह  फोन   आया कि, " सर  मैं  अभी  नहीं  आ ... पूरा पढ़ें
पसंद करें
1
नापसंद करें

पुस्तक समीक्षा : सार्थक संवाद के लिए

के.एन. गोविन्दाचार्य ने स्पष्ट रूप से कहा है, ''वर्तमान व्यवस्था में बदलाव के सभी समर्थक साथियों को अपने-अपने विचारों को प्रकट करने के लिए आमंत्रित करने में यह पुस्तिका निमित्त बने, यही इसके प्रकाशन के पीछे मुख्य उद्देश्य है।'' इस दृष्टि से यदि देखा जाए
पसंद करें
0
नापसंद करें

जो कभी हुआ करता, अपना इन्डिया

यद्यपि इन सँकलित चित्रों का ब्लागपोस्ट से कोई सरोकार नहीं है, फिर भी इन्हें एक स्थान पर सँजो रखने की गरज़ से बटोरा है । यदि हमारी अपनी पीढ़ी को यह चित्र विचित्र किन्तु सत्य लग सकते हैं, तो आने वाले कई दशकों के बाद इन्हें देखना रोमाचँक कम लोमहर्षक अधिक
 
डा. अमर कुमार
पसंद करें
0
नापसंद करें

जो कभी हुआ करता, अपना इन्डिया

यद्यपि इन सँकलित चित्रों का ब्लागपोस्ट से कोई सरोकार नहीं है, फिर भी इन्हें एक स्थान पर सँजो रखने की गरज़ से बटोरा है । यदि हमारी अपनी पीढ़ी को यह चित्र विचित्र किन्तु सत्य लग सकते हैं, तो आने वाले कई दशकों के बाद इन्हें देखना रोमाचँक कम लोमहर्षक अधिक
 
डा. अमर कुमार
पसंद करें
0
नापसंद करें

पुस्तक समीक्षा : समानता की समीक्षा

लेखक ने समान अवसर आयोग की संदेहास्पद स्थिति का वर्णन करते हुए कहा है, 'समान अवसर ' का उपयोग एक छलावा मात्र है। इसमें समूह पहचान को आधार बनाया गया हैं। व्यवस्था या समाज में भेदभाव होना कोई अनोखी बात नहीं है। उसका निदान होना चाहिए।
पसंद करें
0
नापसंद करें

जो कभी हुआ करता, अपना इन्डिया

यद्यपि इन सँकलित चित्रों का ब्लागपोस्ट से कोई सरोकार नहीं है, फिर भी इन्हें एक स्थान पर सँजो रखने की गरज़ से बटोरा है । यदि हमारी अपनी पीढ़ी को यह चित्र विचित्र किन्तु सत्य लग सकते हैं, तो आने वाले कई दशकों के बाद इन्हें देखना रोमाचँक कम लोमहर्षक अधिक
 
डा. अमर कुमार
पसंद करें
1
नापसंद करें

पंडित या सर

पंडित मदन मोहन मालवीय ने प्रस्ताव को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए जवाब दिया कि पंडित की उपाधि उनके कुल खानदान की विरासत है। इसे त्यागकर वे अपने पूर्वजों का अपमान करेंगे। इसलिए मैं डाक्टर की बजाय पंडित कहलाना ही अधिक पसंद करूंगा।