अपने भीतर के कल्मष कोअब तक मनुज नहीं धो पायाअपने व्यवहारों को उसनेनया मुखौटा है पहनायापाषाणी मानव के भीतर,अपनापन कुंटित प्रतिपल है.विद्या भूषण मिश्र -----
आज खुशामदखोर अहं के गरल उगलते हैंकरते हैं बाहर से सौदा भीतर बिकते हैंरिश्ते नाते हुए खोखले मुंह देखा व्यवहारउल्लू सीधा करने वालों की है आज कतारपल-पल डींग हॉंकते अपना यश दुहराते हैंचमचे स्वारथ के रस पीने शीश झुकाते हैंकिन्तु असंभव है खोटे सिक्कों का चल