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मानव 2

अपने भीतर के कल्‍मष कोअब तक मनुज नहीं धो पायाअपने व्‍यवहारों को उसनेनया मुखौटा है पहनायापाषाणी मानव के भीतर,अपनापन कुंटित प्रतिपल है.विद्या भूषण मिश्र -----
 
संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari
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सह + मत

पडी लकीर रेत पर जैसीआज हुई गति नैतिकता कीभीडतंत्र के संकल्‍पों मेंडूब गई मति मानवता की. विद्या भूषण मिश्र....
 
संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari
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आदमी

आज खुशामदखोर अहं के गरल उगलते हैंकरते हैं बाहर से सौदा भीतर बिकते हैंरिश्ते नाते हुए खोखले मुंह देखा व्यवहारउल्लू सीधा करने वालों की है आज कतारपल-पल डींग हॉंकते अपना यश दुहराते हैंचमचे स्वारथ के रस पीने शीश झुकाते हैंकिन्तु असंभव है खोटे सिक्कों का चल
 
संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari