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कैसी ये ख़ामोशी ?

आजकल खामोश क्यों?कलम तेरी,क्या जज्बा संघर्ष काकुछ डिगने लगा है?या फिरअपनी लड़ाई मेंबढ़ते कदमों के नीचेबिछाए गए कुछ काँटों की चुभनडराने लगी है.कुछ इस तरह रखो कदमचरमरा के पिस जाएँ,कांटे क्या लोहे की सलाखें भीजज्बों के आगेमुड़कर बिछ जायेंगी.कटाक्ष,
 
रेखा श्रीवास्तव