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अच्छे विचार : बुरे विचार

“मुझे कोई मार्ग नहीं सूझ रहा है. मैं हर समय उन चीज़ों के बारे में सोचता रहता हूँ जिनका निषेध किया गया है. मेरे मन में उन वस्तुओं को प्राप्त करने की इच्छा होती रहती है जो वर्जित हैं. मैं उन कार्यों को करने की योजनायें बनाते रहता हूँ जिन्हें करना मेरे
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दुःख का निवारण : पूजा पाठ

मेरी आज अपने एक सहयोगी से बात हो रही थी। वह इधर काफी समय से परेशान हैं। शारीरिक व्याधियां सता रही हैं। चोट चपेट लग रही है। कहने लगे की मृत्युंजय जाप कराना है। इसके लिए पैसा उधार लिया है। मैंने कहा तुम थोड़ी तनख्वाह पाते हो। कैसे करोगे यह सब। जो अपने
 
kandpals
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बिना भाव का रावण

यह महज़ इत्तेफाक हो सकता है कि अपने कैर्रिएर के दस साल पूरे होने के ठीक दस दिन पहले अभिषेक बच्चन की फिल्म रावण रिलीज़ होने जा रही है । अभिषेक बच्चन की पहली फिल्म रिफ्यूजी ३० जून २००० को रिलीज़ हुई थी। रावण उनकी ४२ वीं फिल्म है। पर दस साल में ४२ फ़िल्में
 
kandpals
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सिर्फ़ एक साल में भारत दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है, ये मुंगेरी लाल का सपना नहीं, सच है

बहुत हो गया विलाप और रुदन, बहुत हो गया गिला - शिकवा, बहुत दे दी गईं गालियाँ नेताओं को, कोई लाभ नहीं हुआ इस देश का और देशवासियों का । इसलिए अब कुछ और ठोस काम करनाज़रूरी हो गया है ।लगभग एक वर्ष हो गया है मुझे हिन्दी ब्लोगिंग में........इस दौरानकोई 1500 से
 
AlbelaKhatri.com
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एक सेकंड जो ज़िन्दगी बदल दे

पार्थो घोष की इस शुक्रवार रिलीज़ हो रही फिल्म एक सेकंड जो ज़िन्दगी बदल दे का केवल लेखा जोखा रखने के लिहाज़ से ही महत्व है। ये फिल्म उन पार्थो घोष की फिल्म है, जिन्होंने अग्निसाक्षी, १०० डेज युगपुरुष जैसी फ़िल्में दी हैं। यह फिल्म जैकी श्रोफ और मनीषा
 
kandpals
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शोपेनहावर के अनमोल विचार

शोपेनहावर के अनमोल विचार • विश्वास और प्रेम में एक बात समान है; दोनों में से कोई भी जबरदस्ती पैदा नहीं किया जा सकता । • उपयोगी कलाओं की जननी है आवश्यकता, ललित कलाओं की जननी है विलासिता । पहली पैदा हुई बुद्धि से और दूसरी प्रतिभा से । • कोई भी अपने सिवाय
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गुलामों की भाषा-हिन्दी लेख (gulam bhasha-hindi lekh

आजकल के बाज़ार और प्रचार का खेल देखकर लगता है कि कहीं न कहीं वह समाज को नियंत्रित करने के प्रयास निरंतर करता है। बुजुर्ग लोग कहते हैं कि ‘पीछे देख आगे बढ़’। हम पिछला इतिहास देखते हैं तो आगे का भविष्य लिखना मुश्किल होता है और वर्तमान में उसको देखकर आगे बढ़ते
 
दीपक भारतदीप
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फहरा दो पताका विश्व पटल पर..........( ये हवा कुछ बहकी बहकी है )....एक विचार

ब्लोगिंग के दौरान बहुत अच्छे लोगों से जुडाव हुआ .....एक दूसरे की विचारधारा को जानने समझने में आधुनिक तकनीकी ने सहयोग दिया ...केवल दिल्ली ही नहीं वरन विदेशों में रहने वालो लोगों से नजदीकियां बनी .....आमतौर पर बाहर बसे भारतियों छवि मेरे जेहन में खास अच्छी
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पुराने गीतों की उम्र कितनी है?

दर्द भरे गीतों, जिन्हे आज की पीढ़ी कुछ हिकारत और बहुत कुछ अजनबीपन से देखती है, की भारतीय फ़िल्मों में समृद्ध परंपरा रही है। गानों की एक पीढ़ी बहुत कुछ अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी की नौटंकियों से प्रभावित रही है या यह कहना ज़्यादा सही होगा कि मुम्बईया फ़िल्में
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जेल से नीरू के लिए माँ की सौगात !!!

पता नही किसने मदर्स डे बनाया था जिन्होने भी बनाया होगा उसने कभी सपने में भी नही सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आयेगा जब कोई माँ अपनी बेटी की हत्या के जुल्म में जेल जायेगी।कल जब मदर्स डे के दिन निरुपमा की माँ पेय रोल पर जेल से बाहर आ रही थी तो, मैं यही सोच
 
रजनीश के झा (Rajneesh K Jha)
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Delirium and realization

कभी खुद को घेर कर किसी तन्हा कोने में ले जाकर, बाजू कस कर पकड़ कर ज़ोरदार जिरह कर लेनी चाहिये. आप सबसे झूठ बोल सकते हैं लेकिन खुद से नहीं. इसलिये जब आप खुद से सवाल करना शुरु करते हैं तो जवाब इतनी इमानदारी भरे मिलते हैं कि सुनने के लिये दिल कड़ा करना पड़ता
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मैं आज पुरुषों के मन की बात जानना चाह रही हूँ

मैं कल एक कार्यक्रम में भाग लेने छोटी-सादड़ी गयी थी। मेरे साथ हमारे पड़ोसी और सहकर्मी हमारे मित्र भी थे। वे अपने परिवार की निगाह में थोड़े अडियल माने जाते हैं, लेकिन उनके परिवार से ज्‍यादा वे स्‍वयं को अडियल स्‍वीकार करते हैं। शाम को जब कभी एकत्र बैठते हैं
 
ajit gupta
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पोएट्री ऑफ़ विटनेस : कैरोलिन फोर्शे

साक्ष्य (विटनेस) की कविता पाठक को रूबरू कराती है उसकी व्याख्या से जुड़ी एक दिलचस्प समस्या से. हम अभ्यस्त हैं अपेक्षाकृत सरल श्रेणियों के: फ़र्क करते हैं "वैयक्तिक" और "राजनीतिक" कविताओं में; पहली श्रेणी से भान होता है प्रेम और भावनात्मक क्षति के गीतों
 
भारत भूषण तिवारी
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गोरा गोरा बांका छोरा

मुझे हर जगह से सलाह मिल रही थी की ,काली दाल,चाय,चना सब बंद कर दो/बस  गिरी (सुखा नारियल ), दूध ,केसर,पनीर,दही  बस यहे ही खाना बाकि सब तुम्हारे और आने वाले बच्चे के लिए ख़राब है बहुत ख़राब है / में तो ख़ुशी के कारण पागल थी मेरी
 
Ritu
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मानववाद का ही एक अंग है नारीवाद

मानववाद का ही एक अंग है नारीवाद राजकिशोर मानववाद का ठीक-ठीक अर्थ क्या है, मैं नहीं जानता। इसे ले कर मानववाद की धाराओं के बीच भी मतभेद है। इसलिए मानववाद को इस रूप में परिभा।षित करना उपयोगी और निरापद, दोनों जान पड़ता है कि मनुष्यता ने जो कुछ भी
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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मराठी माणसाला काय येतं ???

मंडळी, हा विरोप आपल्या सगळ्यांना आला असेल - आपणही अनेकांना धाडला असेलच. तरीही मला ब्लॉगवर टाकायचा मोह आवरलाच नाही. या सगळ्या व अशा अनेकांनी आपल्याला सार्थ अभिमान वाटावा असेच उत्तूंग कार्य केले आहे. अनेक महत्वाची नावे यात नसली तरी ती मनात आहेतच. अशी महान
 
भानस
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पंद्रह साल से क्या होगा

पंद्रह साल से क्या होगा संसद में अल्पसंख्यकों के अलावा और किसी प्रकार का आरक्षण नहीं होना चाहिए, यह मानते हुए भी मेरी समझ में नहीं आता कि स्त्रियों के लिए आरक्षण के जिस विधेयक पर इतना शोर बरपा हुआ है, उसकी अवधि सिर्फ पंद्रह साल क्यों है। मजे की बात यह है
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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जीवनातली सूत्रं.

“हळू हळू उन्हं कमी व्हायला लागली.अंगावर सावली पडल्यावर थंडी वाजायला लागली.विषय इकडेच थांबवलेला बरा असं माझ्या मनात आलं.” वसंत ऋतू येत आहे ह्याची चाहूल लागली.अलीकडे न दिसणारे पक्षी दिसायला लागले आहेत.मलबरी झाडाला आता पून्हा पालवी फुटायला लागली
 
shrikrishnasamant
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अंधा कर देने वाली चकाचौंध

अमेरिका से आर्किटेक्चर का कोर्स कर भारत आया लड़का शादी कर रहा था और दुर्भाग्य से हम साग्रह आमंत्रित थे... छुट्टी की शाम को शहर से 20 किमी दूर शादी का वैन्यू था और जाना जरूरी... मन-बेमन था लेकिन पहुँचे। आधा किमी दूर गाड़ी पार्क कर पैदल ही विवाह-स्थल पर
 
डॉ. अमिता नीरव
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दिल दे दिया है, जान भी देंगे, सब्जी नहीं लायेंगे सनम

अमृत साधनाअभी मैं टैक्सी में बैठकर आ रही थी, टैक्सी ड्राइवर ने रेडियो मिर्ची चला रखा था। दोपहर का वक्त था इसलिए पुराने गाने बज रहे थे। यह गाना सुना: "दिल दे दिया है, जान भी देंगे, दगा नहीं देंगेे सनम।' मुझे हंसी आ गई। यह गाना कम से कम तीस साल पुराना
 
राजेंद्र त्‍यागी
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“चार पंक्तियों का राष्ट्रवादः टैगोर और कोरिया और पाँच अन्य दृश्य” -गिरिराज किराडू

कवि-अनुवादक गिरिराज किराडू के ब्लॉग "सारी दुनिया रंगा" से साभार। १ब्रिटेन के आधिपत्य वाले गयाना में उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में चीनी मजदूरों के बंधुआ शोषण के लिए कुख्यात कंपनी बुकर मैकोनेल (अब बुकर कैश एंड कैरी) द्वारा १९६८ में स्थापित (गयाना 1966
 
शिरीष कुमार मौर्य
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विचारों की उल्टी मैं नहीं करूंगी

आपका लेख विचारपरक होगा या...? हां, हां, बिल्कुल विचारपरक ही होगा। हम बाजारू लेख नहीं लिखते। लिख ही नहीं सकते.....। एक्सक्यूज मी! सबसे पहले कन्फेशन... कि मैंने उन दोनों कॉलीग्स की ये बातें सुनीं, जो नहीं सुननी चाहिए थीं, क्योंकि इसे बैड मैनर्स कहते हैं।
 
नमिता जोशी
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पब्लिक तो बच्चा है जी!

आप उत्तर भारतीय हैं तो फ़क़त इसबात पर ख़ुश हो सकते हैं कि कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी उनकी हिमायत में आ गए हैं। मराठी बनाम उत्तर भारतीयों के खूनी खेल में अबतक तमाशबीन बनी कांग्रेस ने चुप्पी तब टूटी जब शिवसेना के कागजी शेरों ने गांधी परिवार पर
 
संजीव
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घर में ही पराजित होती हिंदी

हिंदी को राष्ट्रभाषा मानने वालों का मुगालता पिछले दिनों टूट गया। गुजरात हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान हिंदी की संवैधानिक स्थिति भी स्पष्ट की। चीफ जस्टिस एस.जे. मुखोपाध्याय की बेंच ने डिब्बाबंद सामान पर हिंदी में ब्यौरा लिखे जाने को लेकर दायर
 
संजीव
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क्या है हम ....?

रविवार की छुट्टी....हाथ पसारे खड़ा खुला-खुला सा दिन... लिहाफ का भला लगने वाला गुनगुनापन...मीठी सरसराती वासंती बयार...खिड़की से उड़कर अंदर आते धूप के कतरे....मखमली-सा अहसास...उन्माद के तूफान के गुज़र जाने के बाद की शांति...पार्श्व में गुलाम अली का
 
डॉ. अमिता नीरव
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परीक्षा में कदाचार के लिए जिम्मेवार कौन

मैं अपने पिछले पोस्ट में परीक्षा में कदाचार का जिक्र किया है। विचारनीय है कि परीक्षा व मूल्यांकन में कदाचार के लिए जिम्मेवार कौन है? मैं जोर देकर कहता हूँ कि परीक्षा में कदाचार के लिए जिम्मेवार और कोई नहीं बल्कि परीक्षार्थी के अभिभावक रहते है। जी हां
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ऐसे शिक्षक क्या पढ़ायेंगे?

जैसा कि पिछले पोस्ट में मैंने लिखा कि किस प्रकार आरक्षण नीति के कारण अयोग्य को महत्त्वपूर्ण कार्य दे दियाजाता है और इस कारण देश विकास के राह पर न चलकर पतन की ओर जाता है। योग्य व्यक्ति को दरकिनार कर अयोग्य व्यक्ति को कार्य सौंपना व्यक्ति के प्रतिभा के साथ
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अपनी ढपली अपना राग

शादी से मज़ेदार  कोई लेख  हो ही नहीं सकता इतना मसालेदार होती है यह शादी हर उम्र के लोगो के लिए सदियों तक याद रखने के लिए साथ ही उसमे शामिल लोगो के लिए भी और जिनकी शादी होती है वो तो कभी भूल ही नहीं पाते . अलग  अलग  लोग
 
Ritu
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क्यों न करूँ मैं गणतंत्र दिवस का बहिष्कार

गणतंत्र दिवस है आया सोचने पर हमने है विचारा है नहीं यहाँ बच्चों को पढने का अधिकार है नहीं बच्चों को खेलने का अधिकार बच्चे करते हैं होटल में काम बेचते हैं रेल पर नशा तमाम देखने वाला नहीं है कोई उसे फिर हमने देश को गणतंत्र माना कैसे गणतंत्र दिवस है आया
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पे रु चा पा पै

असं वाटतं पूर्वी कधी ऐकलेली एक गोष्ट, समोर एका कागदावर असावी, आणी पटकन ती उचलून वाचता यावी. जेव्हा कोण काही सांगत असतं, तेव्हा आपण कधी लक्ष देत नाही. मनाच्या मागच्या काळ्या खोलीत बंद करून ठेवून टाकतो. वीस-एक वर्षा नंतर, असच एका कुठल्या बुधवार-दुपारच्या
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महंगाई क्यों .....

अब सभी महंगाई-महंगाई चिल्ला रहे हैं , एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं | समझिये महंगाई कामूल कारण क्या है---हम और आप--१.अति सुखाभिलाषीजीवन- छुद्र विचार युक्त जीवन शेली --हम सब को ब्रांडेड कपडे, जूते, खाना पीना चाहिए और विदेशी भी , टी वी, मोबाइल,कार ,
 
Dr. shyam gupta
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लेखन का नया फैशन

आजकल लेखन में नया फैशन है अपने जीवन की कहानियों और किस्से  को संसस्मरण के बजाये नोवेल बोलना . अपने जीवन की अन्तरंग बातें और उनसे सीख को एक धागे में
 
Ritu
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क्या आप सफल अभिभावक हैं?

हालाँकि यह सवाल पूछने या जवाब बताने का मेरा कोई हक नही बनता, मै खुद को अभी ३ साल से बडा नही मानती, कारण कि कई बार मेरा भाई जो कि अभी ५ साल का है, ऐसी बातें बोलता है, जिन्हे सुनकर खुद को लगेगा कि इसके आगे तो अपनी सोच की कोई हैसियत ही नही है! कई बार मे
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अच्छा क्या है? बुरा क्या है?

काफी दिनो से एक ही तरह के सवाल जवाब चल रहे हैं आजकल, मुझे लग रहा है कि बच्चे(भाई-बहन) बडे हो रहे हैं, खासकर मेरा भाई जो कि क्लास १ मे पढ रहा है, रोज आकर कोई एक विषय पर बात होती है, पूरे कहानी मे एक ही सवाल उठता है कि "अच्छा किसे कहते हैं, बूराई की पर
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एक घर बिना ख्वावों. ख्वाहिशों और ख्यालों का

ये घर है विश्वाश का. ये घर है प्रेम और वलिदान का. ये घर है क्षमा और दया का. ये घर है भाईचारगी और सौहार्द्र का. ये घर है त्याग औरतपस्या का. ये घर है. यहाँ आपका वागत है. लेकिन एक अनुरोध यहाँ कुछ लेकर कृपया न आयें. यहाँ इस घर में नफरत की कोई गुजाईश नहीं
 
Arun Kumar Jha
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बाजार व्यवस्था में छटपटता इनसान

इनसान अपनी ही बनाई व्यवस्था में छटपटा रहा है। विकास की चाह में खुद को बाजार के हवाले करने वाला आदमी आज बाजार की चाल से जार-जार रो रहा है। वित्तीय कंपनियां दिवालियां हो रही हैं और शेयर बाजार फर्श पर लोट रहा है। एक ही दिन में कराे़डों-अरबों का वारा-न्य
 
ओमप्रकाश तिवारी
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सिपाही क्यों नहीं लिख सकता कविता ?

भाग- कई बार लगता है कि उन लोगों की कोई नोटिस नहीं लेना चाहिए जो ये नहीं समझते कि वे कह क्या रहें है ? कर क्या रहे हैं ? क्यों कह रहे हैं ? क्यों कर रहे हैं । उनके ऐसे करने का क्या अंजाम हो सकता है । ऐसे लोगों को कई बार मन और मनीषा दोनों ही नकार देती
 
जयप्रकाश मानस
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सूड

“होणारे न चुके जरी तया ब्रम्हदेव येई आडवा.” ऍम्सटरडम मधून निघालेली फ्लाईट डिट्रॉइट्ला उतरण्यापुर्वी ते विमान पेटवून लोकांना मारण्याचा कट असफल झाला.ही आजची ताजी आणि बहुचर्चीत बातमी प्रो.देसायांच्या नजरेतून सुटली नव्हती. तेवीस वर्षाच्या
 
shrikrishnasamant
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